Friday, September 7, 2012

MAA MUNDESHWARI DEVI - माँ मुंडेश्वरी देवी



शक्तिपीठ कामाख्या देवी, वैष्णो देवी, मैहर देवी, शारदा देवी, विंध्यवासिनी देवी और ज्वाला देवी की तरह प्रतिष्ठित मुण्डेश्वरी धाम भभुआ से 10 किलोमीटर पश्चिम-दक्षिण स्थित पंवरा पहाड़ी पर स्थित हैं। मंदिर परिसर में विद्यमान शिलालेखों से इसकी ऐतिहासिकता प्रमाणित होती है। 1838 से 1904 ई. के बीच कई ब्रिटिश विद्वान व पर्यटक यहां आए। प्रसिद्ध इतिहासकार फ्रांसिस बुकनन भी यहां आ चुके हैं। मंदिर का एक शिलालेख कोलकाता के भारतीय संग्रहालय में है। पुरातत्वविदों के अनुसार यह शिलालेख 349 ई.से 636 ई के बीच का है। मंदिर की नक्काशी व मूर्तियां उत्तर गुप्तकालीन हैं। शिलालेख के अनुसार यह मंदिर महाराजा उदय सेन के शासनकाल में निर्मित है। इसका निर्माण काल 635-636 ई. बताया जाता है। पंचमुखी शिवलिंग इस मंदिर में पंचमुखी शिवलिंग स्थापित है, जो अत्यंत दुर्लभ है। दुर्गा का वैष्णवी रूप ही मां मुण्डेश्वरी के रूप में यहां प्रतिस्थापित है। मुण्डेश्वरी की प्रतिमा वाराही देवी की प्रतिमा है, क्योंकि इनका वाहन महिष है। मुण्डेश्वरी मंदिर अष्टकोणीय है। मुख्य द्वार दक्षिण की ओर है। मंदिर में शारदीय और चैत्र नवरात्र के अवसर पर श्रद्धालु दुर्गा सप्तशती का पाठ करते हैं। वर्ष में दो बार माघ और चैत्र में यहां यज्ञ होता है। नहीं होती जीव हिंसा मुण्डेश्वरी धाम की सबसे बड़ी और विलक्षण विशेषता है कि यहां पशु बलि की सात्विक परंपरा है। यहां बलि में बकरा चढ़ाया जाता है, लेकिन उसका जीवन नहीं लिया जाता। माता की चरणों में बकरे को रख कर पुजारी मंत्र पढ़ कर अक्षत-पुष्प डालते हैं। इसके बाद बकरा श्रद्धालु को वापस दे दिया जाता है। पशुबलि की यह सात्विक परंपरा अन्यत्र नहीं है।



भूकंप से हुई क्षति पुरातत्वविदों का मानना है कि इस इलाके में कभी भूकंप का भयंकर झटका लगा होगा, जिसके कारण पहाड़ी के मलबे के अंदर गणेश और शिव सहित अनेक देवी-देवताओं की मूर्तियां दब गई। खुदाई के दौरान ये मिलती रही हैं। यहां खुदाई के क्रम में मंदिरों के समूह भी मिले हैं। बिहार राज्य धार्मिक न्यास परिषद के अध्यक्ष आचार्य किशोर कुणाल का मानना है कि इस मंदिर को किसी आक्रमणकारी ने तोड़ा नहीं है, बल्कि प्राकृतिक आपदा तूफान-वर्षा, आंधी-पानी से इसका प्राकृतिक क्षरण हुआ है। पहाड़ी पर मूर्तियों के भग्नावशेष आज भी विद्यमान हैं। 1968 में पुरातत्व विभाग ने यहां की 97 दुर्लभ मूर्तियों को सुरक्षा की दृष्टि से पटना संग्रहालय में रखवा दिया। तीन मूर्तियां कोलकाता संग्रहालय में हैं। पहाड़ी के शिखर पर स्थित मुण्डेश्वरी मंदिर तक पहुंचने के लिए 1978-79 में सीढ़ी का निर्माण किया गया। वर्तमान में इसका तेजी से विकास हो रहा है और दूर-दूर से श्रद्धालु व पर्यटक यहां आते हैं। मंदिर को 2007 में बिहार राज्य धार्मिक न्यास परिषद ने अधिग्रहित कर लिया था। इसके प्रयास से ढाई एकड़ जमीन पर्यटन विभाग को सौंपी गई। धर्मशाला और यज्ञशाला का निर्माण कराया गया। आधुनिकतम कैफेटेरिया का निर्माण जारी है। श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए वैष्णो देवी और राजगीर की तर्ज पर यहां रोप-वे बनाने का कार्य चल रहा है। मोहनियां और बेतरी गांव के पास भव्य मुण्डेश्वरी प्रवेश द्वार बनाया गया है। यहां पर अतिथिगृह भी बना है। मंदिर का ध्वस्त गुंबद बनाने की भी कोशिशें भारतीय पुरातत्व विभाग की ओर से हो रही हैं। पुरातत्व विभाग के पास उस काल के गुंबद का नक्शा उपलब्ध है। इस साल बिहार सरकार के सूचना एवं जनसंपर्क विभाग के कैलेंडर में माता मुण्डेश्वरी मंदिर का चित्र पहली बार शामिल किया गया है। 

साभार : दैनिक जागरण,

8 comments:

  1. माता के मंदिर के विषय में बहुत बढ़िया जानकारी पूर्ण आलेख आभार ...

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  2. बहुत उंदर चित्र और विवरण सांझा करने के लिए आभार

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  3. jai ho mata mundesri ki, jai mata mundesri ki, jai mata mundesri ki

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  5. mai mundeshwari trustNovember 11, 2014 at 4:56 PM

    "जय माता दी"
    आप का हमारे संस्था मे स्वागत है. हमारा संस्था समाज सेवा का काम करता है.
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