Wednesday, October 17, 2018

चामुंडा माता, पवन चोटिला शिखर, सुरेंद्रनगर

Sunday, October 14, 2018

माता के इस मंदिर में लाल मिर्च से होता है हवन, होती है हर मुराद पूरी

माता के इस मंदिर में लाल मिर्च से होता है हवन, होती है हर मुराद पूरी


हिंदू धर्म में मां दुर्गा के 51 शक्तिपीठ हैं लेकिन इनके अलावा कुछ ऐसे मंदिर भी हैं जो अपने दिव्य चमत्कारों के लिए प्रसिद्ध हैं। छत्तीसगढ़ राज्य का डोंगरगढ़ मंदिर भी कुछ ऐसा ही है। मां बमलेश्वररी मंदिर तक पहुंचने के लिए भक्तों को हज़ार से भी ज्यादा सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हैं। नवरात्रि में यहां पर काफी श्रद्धालु आते हैं। 

नर्तकी और संगीतकार की प्रेम कहानी

ऐसी मान्यता है कि इस जिले के राजा कामसेन को संगीत और कला बहुत पसंद थी। उनके दरबार में कामकंदला नाम की एक बहुत ही सुंदर और अपनी कला में निपुण नर्तकी थी। उसके साथ जुगत बैठाने वाला एक संगीतकार था जिसका नाम माधवानल था। साथ काम करते-करते दोनों के बीच प्रेम हो गया था और जब राजा को ये बात पता चली तो उसने माधवानल को राज्य से बाहर निकलवा दिया।

तब माधवानल उज्जैन के राजा विक्रमादित्यय की शरण में पहुंच गए। उसने राजा विक्रमादित्या से कामकंदला से मिलने के लिए मदद मांगी। राजा विक्रमादित्यप ने राजा कामसेन को संदेश भेजा कि वो दोनों प्रेमियों को मिलने की अनुमित दें। कामसेन के इनकार करने पर दोनों राजाओं के बीच युद्ध छिड़ गया। दोनों ही राजा वीर योद्धा थे। एक महाकाल का भक्त था तो दूसरा मां विमका कां दोनों के बीच युद्ध होते देख महाकाल और मां विमला भी अपने भक्तों की मदद करने लगीं।

मिलन का हुआ फैसला

ऐसा कहा जाता है कि युद्ध को भयंकर रूप लेते देख दोनों राजाओं के ईष्टो देवताओं ने कामकंदला और माधवानल का मिलन करवा दिया। इसके बाद राजा विक्रमादित्य ने मां विमलेश्वरी से पहाड़ी में प्रतिष्ठित होने का निवेदन किया। बस तभी से यहां पर मां बमलेश्वंरी मंदिर स्थित है और मां स्थानीय लोगों की अधिष्ठात्री देवी हैं।

हवन की अनूठी विधि

मां बमलेश्वीरी मंदिर में हवन की विधि भी बहुत अनूठी है। यहां पर हवन सामग्री में लाल मिर्च का प्रयोग किया जाता है। किवदंती है कि लाल मिर्च शत्रुओं का नाश करती है इसलिए यहां पर हवन सामग्री में लाल मिर्च का प्रयोग किया जाता है ताकि हवन करवाने वाले व्यक्ति के सभी शत्रुओं का नाश हो जाए। अगर आप भी किसी मनोकामना की पूर्ति चाहते हैं तो देवी मां के इस मंदिर में जरूर आएं। कहा जाता है कि इस मंदिर में आने वाले भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं और यहां आने वाले भक्तों के सारे कष्ट दूर हो जाते हैं

साभार: नवभारत समाचार पत्र, नागपुर 

Thursday, October 11, 2018

BIJASAN DEVI - विंध्याचल पर्वत पर विराजी हैं यह देवी, सबके लिए करती हैं न्याय

Navratri 2018: विंध्याचल पर्वत पर विराजी हैं यह देवी, सबके लिए करती हैं न्याय
मध्यप्रदेश बिजासन देवी धाम को आज कौन नहीं जानता। कई लोगों की कुलदेवी होने के साथ देश-विदेश में रहने वाले लोगों की आस्था का भी केंद्र है। लोग माता के इस पवित्र स्थान को सलकनपुर देवी धाम के नाम से भी जानते हैं।
नर्मदा नदी के तट से महज 11 किलोमीटर दूर स्थित विंध्याचल पर्वत श्रंखला के अंतिम छोर पर माता स्वयं प्रकट हुई थी। यह स्थान जमीन से एक हजार फीट ऊंचाई पर है। भक्तों कहते हैं कि माता ने पूरे मध्यप्रदे की भलाई के लिए एक हजार फीट की ऊंचाई पर अपना सिंहासन बनाया है, माता वहीं बैठकर दुनियाभर में फैले भक्तों की मनोकामना पूरी कर देती हैं।
salkanpur
मंदिर तक पहुंचने के लिए तीन रास्ते

पहला रास्ता

इस मंदिर पर पहुंचने के लिए भक्तों को 1400 सीढ़ियों का कठिन रास्ता पार करना पड़ता है। रास्ते में ही प्रसाद और फूलों की दुकानें भी लगी रहती है।

दूसरा रास्ता

मंदिर तक पहुंचने के लिए सरकार ने सड़क मार्ग भी बना दिया है। यहां खुद के वाहन से जाया जा सकता है। इसके लिए पहाड को काटकर तीन किलोमीटर लंबा घुमावदार रास्ता बनाया गया है।

तीसरा रास्ता

पहाड़ी पर चढ़ाई के लिए तीसरा रास्ता रोब-वे है। यह स्थान भी सीढ़ियों के पास ही है। जो लोग सीढ़ी से नहीं जा सकते, उनके लिए रोब-वे सुलभ साधन है। उड़नखटोले पर बैठते ही 8-10 मिनट में माता के दरबार में पहुंचा जा सकता है।

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रास्ते में लोग करते हैं सेवा

विजयासन देवी धाम के प्रति श्रद्धा ही है कि भोपाल तरफ से जाने वाले मार्ग पर औबेदुल्लागंज में और हरदा तरफ से आने वाले लोगों के लिए रेहटी में लोग श्रद्धालुओं की मदद करते हैं। इनमें अन्य धर्म संप्रदाय के लोग भी शिरकत करते हैं। यहां स्टाल लगाकर श्रद्धालुओं को फलाहार, फल, चाय, पानी का निःशुल्क बंदोबस्त करते हैं।

सबकी कुलदेवी है विजासन देवी
कई कुटुंब परिवार ऐसे हैं जिन्हें अपनी कुलदेवी के बारे में जानकारी नहीं हैं। उन सभी की कुलदेवी विजासन देवी हैं। विजासन देवी को विन्ध्यवासिनी देवी भी कहा जाता है। क्योंकि विंध्याचल पर्वत की देवी है।

भक्तों के शरीर में आ जाती है ऊर्जा

यहां के पुजारी बताते हैं कि यहां आने वाला चाहे मंत्री हो या निर्धन व्यक्ति, सभी पर मां की असीम कृपा बरसती है। विजयासन देवी धाम के परिसर में आते ही भक्त अपना शरीर ऊर्जा और शक्ति से भरा हुआ महसूस करते हैं। इसीलिए कहा जाता है कि यहां आने वाला कोई भी दर्शनार्थी खाली हाथ नहीं जाता।

मां पार्वती का अवतार

शास्त्रों में बताया गया है कि मां विजयासन देवी माता पार्वती का ही अवतार हैं, जिन्होंने देवताओं के आग्रह पर रक्तबीज नामक राक्षस का वध कर सृष्टि की रक्षा की थी।

सूनी गोद भरती हैं देवी

माता कन्याओं को मनचाहा जीवनसाथी का आशीर्वाद देती हैं। भक्तों की सूनी गोद भी भर देती हैं। भक्तों की ही श्रद्धा है कि इस देवीधाम का महत्व किसी शक्तिपीठ से कम नहीं हैं। इस क्षेत्र के ज्यादातर लोग विजयासन देवी को कुलदेवी के रूप में भी पूजते हैं।

यह प्रतिमा है स्वयं-भू

पुजारी बताते हैं कि मां विजयासन देवी की प्रतिमा स्वयं-भू है। यह प्रतिमा माता पार्वती की है, जो वात्सल्य भाव से अपनी गोद में भगवान गणेश को लेकर बैठी है। इस भव्य मंदिर में महालक्ष्मी, महासरस्वती और भैरव की प्रतिमाएं भी स्थापित हैं। भक्त कहते हैं कि एक मंदिर में कई देवी-देवताओं का आशीर्वाद पाने का सभी को सौभाग्य मिलता है।

बाघ भी करता है परिक्रमा

माना जाता है कि विजयासन देवी का मंदिर जिस पहाड़ी पर है वह क्षेत्र रातापानी के जंगल से जुड़ा हुआ है। इसलिए मंदिर तक बाघ का विचरण होता रहता है। भक्तों की आस्था है कि माता का यह वाहन माता के दर्शन करने मंदिर के आसपास आता रहता है। कुछ ग्रामीण बताते हैं कि कई बरसों पहले जब यहां मंदिर का निर्माण नहीं हुआ था तो बाघ मंदिर के पास ही एक गुफा में रहता था। धीरे-धीरे भक्तों की आस्था बढ़ती गई और आज विजयासन देवी धाम देश में जाना-माना तीर्थ बन गया।

साभार: पत्रिका समाचार पत्र 

HARSIDDH MATA - चमत्कारों की देवीः काशी में चरण, उज्जैन में सिर और भोपाल में होती है धड़ की पूजा


 शारदीय नवरात्र के मौके पर हर दिन आपको बताएगा प्रदेश के अनोखे मंदिरों के बारे में...। पहली कड़ी में आपके ले चलते हैं भोपाल जिले की बैरसिया तहसील, जहां विराजमान हैं हरसिद्धि माता...।

भोपाल। बैरसिया तहसील मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल से 35 किलोमीटर दूर है। यहां के तरावली गांव में माता का अद्भुत स्थान हैं। हरसिद्धि माता के दरबार में जो भी अर्जी लगाता है वो जरूर पूरी हो जाती है। खास बात यह है कि इस मंदिर में सीधे नहीं उलटे फेरे लगाए जाते हैं। मान्यता है कि यहां उलटे फेरे लगाने वालों के बिगड़े काम भी बन जाते हैं।


तरावली स्थित मां हरसिद्धि धाम में वैसे तो सामान्य रूप से सीधी परिक्रमा ही करते हैं लेकिन कुछ श्रद्धालु मां से खास मनोकामना के लिए उलटी परिक्रमा कर अर्जी लगा जाते हैं, बाद में जब मनोकामना पूरी हो जाती है तब सीधी परिक्रमा कर माता को धन्यवाद देने जरूर आते हैं।

कई भक्तों को दिया संतान का आशीर्वाद
मान्यता है कि जिन भक्तों को कोई भी संतान नहीं होती है। वह महिलाएं मंदिर के पीछे नदी में स्नान करने के बाद मां की आराधना करती है। इसके बाद उनकी मनोकामना पूरी हो जाती है।

खप्पर से होती है पूजा

तरावली स्थित मां हरसिद्धि के प्रति लोगों की अगाध श्रद्धा है। यहां माता के धड़ की पूजा होती है, क्योंकि मां के चरण काशी में है और शीश उज्जैन में। इससे जितना महत्व काशी और उज्जैन का है उतना ही महत्व इस तरावली मंदिर का भी है। यहां आज भी मां के दरबार में आरती खप्पर से की जाती है।

राजा विक्रमादित्य लाए थे मूर्ति

तरावली के मंहत मोहन गिरी बताते हैं कि वर्षों पूर्व जब राजा विक्रमादित्य उज्जैन के शासक हुआ करते थे। उस समय विक्रमादित्य काशी गए थे। यहां पर उन्होंनें मां की आराधना कर उन्हें उज्जैन चलने के लिए तैयार किया था। इस पर मां ने कहा था कि एक तो वह उनके चरणों को यहां पर छोड़कर चलेंगी। इसके अलावा जहां सबेरा हो जाएगा। वह वहीं विराजमान हो जाएंगी। इसी दौरान जब वह काशी से चले तो तरावली स्थित जंगल में सुबह हो गई। इससे मां शर्त के अनुसार तरावली में ही विराजमान हो गईं। इसके बाद विक्रमादित्य ने लंबे समय तक तरावली में मां की आराधना की। फिर से जब मां प्रसन्न हुई तो वह केवल शीश को साथ चलने पर तैयार हुई। इससे मां के चरण काशी में है, धड़ तरावली में है और शीश उज्जैन में है। उस समय विक्रमादित्य को स्नान करने के लिए जल की आवश्यकता थी। तब मां ने अपने हाथ से जलधारा दी थी। इससे वाह्य नदी का उद्गम भी तरावली के गांव से ही हुआ है और उसी समय से नदी का नाम वाह्य नदी रखा गया है।

यह भी है मान्यता

-मान्यता है कि दो हजार वर्ष पूर्व काशी नरेश गुजरात की पावागढ़ माता के दर्शन करने गए थे। 
-वे अपने साथ मां दुर्गा की एक मूर्ति लेकर आए और मूर्ति की स्थापना की और सेवा करने लगे।
-उनकी सेवा से प्रसन्न होकर देवी मां काशी नरेश को प्रतिदिन सवा मन सोना देती थीं।
-जिसे वो जनता में बांट दिया करते थे। 
-यह बात उज्जैन तक फैली तो वहां की जनता काशी के लिए पलायन करने लगी। 
-उस समय उज्जैन के राजा विक्रमादित्य थे। जनता के पलायन से चिंतित विक्रमादित्य बेताल के साथ काशी पहुंचे। 
-वहां उन्होंने बेताल की मदद से काशी नरेश को गहरी निद्रा में लीन कर स्वयं मां की पूजा करने लगे।
-तब माता ने प्रसन्न होकर उन्हें भी सवा मन सोना दिया।
-विक्रमादित्य ने वह सोना काशी नरेश को लौटाने की पेशकश की। 
-लेकिन काशी नरेश ने विक्रमादित्य को पहचान लिया और कहा कि तुम क्या चाहते हो। 
-तब विक्रमादित्य ने मां को अपने साथ ले जाने का अनुरोध किया। काशी नरेश के न मानने पर विक्रमादित्य ने 12 वर्ष तक वहीं रहकर तपस्या की। 
-मां के प्रसन्न होने पर उन्होंने दो वरदान मांगे, पहला वह अस्त्र, जिससे मृत व्यक्ति फिर से जीवित हो जाए और दूसरा अपने साथ उज्जैन चलने का। 
-तब माता ने कहा कि वे साथ चलेंगी, लेकिन जहां तारे छिप जाएंगे, वहीं रुक जाएंगी। 
-लेकिन उज्जैन पहुंचने सेे पहले तारे अस्त हो गए। इस तरह जहां पर तारे अस्त हुए मां वहीं पर ठहर गईं। इस तरह वह स्थान तरावली के नाम से प्रसिद्ध हुआ।
-तब विक्रमादित्य ने दोबारा 12 वर्ष तक कड़ी तपस्या की और अपनी बलि मां को चढ़ा दी, लेकिन मां ने विक्रमादित्य को जीवित कर दिया। 
-यही क्रम तीन बार चला और राजा विक्रमादित्य अपनी जिद पर अड़े रहे। 
-ऐसे में तब चौथी बार मां ने अपनी बलि चढ़ाकर सिर विक्रमादित्य को दे दिया और कहा कि इसे उज्जैन में स्थापित करो। 
-तभी से मां के तीनों अंश यानी चरण काशी में अन्नपूर्णा के रूप में, धड़ तरावली में और सिर उज्जैन में हरसिद्धी माता के रूप में पूजे जाते हैं।
साभार: पत्रिका न्यूज़ पेपर 

KANKALI MATA MANDIR - यहां देवी मां की घूमती हुई गर्दन देखने पहुंचते हैं भक्त



भोपाल। मां काली के विभिन्न आकर्षक रूपों से हमारा परिचय है लेकिन भोपाल से सटे रायसेन में एक ऐसा मंदिर है जहां मां काली की मूर्ति एक बार स्वयं अपनी गर्दन सीधी करती है। इस मौके पर माता के दर्शनों के लिए भक्तों का तांता लगा होता है। मान्यता है कि जिस भी भक्त को माता की सीधी गर्दन देखने का मौका मिलता है उसके सारे बिगड़े काम बन जाते हैं।

नवरात्र में होती है विशेष पूजा

राजधानी से महज 15 किमी दूर रायसेन जिले के गुदावल गांव में मां काली का प्रचीन मंदिर है। यहां मां काली की 20 भुजाओं वाली प्रतिमा के साथ भगवान ब्रम्हा, विष्णु और महेश की प्रतिमाए विराजमान है। आमतौर पर यहां पूरे साल माता के भक्तों की भीड़ लगी रहती है, लेकिन नवरात्र ंके बाद वियजदशमी पर श्रद्धालुओं का तांता लगता है। चैत्र नवरात्र में रामनवमी के दिन विशाल भंडारा आयोजित किया जाता है।

सूनी गोद भरती है मां

बताया जाता है कि इस दिन माता की लगभग 45 डिग्री झुगी गदरन कुछ पलों के लिए सीधी होती है जिसे देखने के लिए दूर-दूर से लोग आते हैं। मंदिर के महंत मंगल दास त्यागी बताते हैं कि मंदिर से जुड़ी अलग- अलग मान्यताएं हैं। कहा जाता है कि जिन माता-बहनों की गोद सूनी होती है, वह श्रृद्धाभाव से यहां उल्टे हाथ लगाती हैं उनकी मान्यता अवश्य पूरी होती है।

अनोखी है प्राकृतिक छटा

कंकाली मंदिर रायसेन रोड पर स्थित बिलखिरिया गांव से कुछ ही दूरी पर जंगल के बीच बना हुआ है। मंदिर के चारो लगे हरे-भरे पेड़ पौधे यहां सबसे बड़ा आकर्षण है।

साभार: राजस्थान पत्रिका