Thursday, November 28, 2013

MATA KUNAL PATHRI DHAM - माता कुनाल पत्थरी धाम

जगदम्बे का अद्भुत दर्शन-माता कुनाल पत्थरी धाम


हिमाचल प्रदेश की भूमि के कण- कण में देवी-देवताओं का वास है। इसी कारण यह धरती देव भूमि कहलाती है। यहां के लोग भी शांत व धार्मिक प्रवृत्ति के हैं। प्रकृति से यहां के लोगों की निकटता उनके प्रभु के समीप होने का भी बोध करवाती है। यही कारण है कि यहां के पग पग पर कोई ना कोई आस्था तीर्थ विद्यमान है। सदियों से यह आस्था पुंज हिंदू धर्म की ज्योति को चहूं दिशाओं में फैला रहे हैं। इसी श्रृंखला  में हिमालय की धौलाधार पर्वतमाला का विशेष महत्व है। इस पर्वतमाला के अंचल में हमारे अनेक प्रमुख देवी देवता अनेक रूपों में विराजमान हैं। माता दुर्गा के तो सबसे प्रसिद्घ शक्तिपीठ इस क्षेत्र की विशेष पहचान है। मां चिन्तापूर्णी, मां ज्वाला, श्री वज्रेश्वरी देवी, माता बगुलामुखी, महामाया चामुंडा देवी के अतिरिक्त भगवती के अनेक रूपों में इस क्षेत्र में दर्शन होते हैं। यदि यह कहा जाए कि मातेश्वरी ने अपनी कृपा इस भूमि पर जम कर बरसाई है तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी।

माता अंबे का ही एक रूप इस क्षेत्र में माता कुनाल पत्थरी के नाम से विख्यात है। स्थानीय लोगों में मां कुनाल पत्थरी के प्रति विशेष श्रद्घा है। माता का यह धाम धर्मशाला नगर के समीप विद्यमान है। शहर के हो-हल्ले से दूर भरपूर प्राकृतिक सौंदर्य के मध्य यह देवीपीठ स्थापित है। यंहा  आकर मन को भरपूर शांति की अनुभूति होती है। मुख्य रूप से यह मंदिर माता कपालेश्वरी देवी को समर्पित है। जनश्रुतियों के अनुसार इस धाम का संबंध माता सती की 51 शक्तिपीठों से जोड़ा जाता है। यह माना जाता है कि इस स्थान पर माता सती का कपाल गिरा था। कपाल अर्थात् खोपड़ी का ऊ पर का भाग। इस तथ्य की पुष्टि करता है यंहा  एक शिला पर स्थापित कपाल के आकार का पत्थर का कुंड जो वर्षा के जल से भरा रहता है। मंदिर के गर्भगृह में सतह से लगभग तीन फुट की ऊंचाई पर यह कुंड एक विशाल शिला पर प्राकृतिक अवस्था में  टिका हुआ है। इस शिला की माता कपालेश्वरी की पिंडी के रूप में पूजा होती है। कुंड के ठीक ऊपर गर्भगृह की छत में खुला स्थान रखा गया है जंहा  से वर्षा का जल इस कुंड में टपकता रहता है। वास्तव में यह पत्थर का कुंड एक बड़ी परात जैसा प्रतीत होता है। परात वह बर्तन होता है जो आटा गूंथने के काम आता है। परात को स्थानीय भाषा कांगड़ी में कुनाल कह कर पुकारा जाता है। यही कारण है कि स्थानीय लोग पत्थर की इस परात रूपी आकृति के कारण माता को कुनाल पत्थरी नाम से उच्चारित करते हैं। माता का ऐसा स्वरूप अन्यत्र कहीं देखने को नहीं मिलता।

माता के इस कुंड का जल विशेष प्रभाव वाला माना जाता है। यह जल कभी सूखता या खराब नहीं होता। न ही इस जल में कोई कीड़ा या जाला उत्पन्न होता है। यह देखने में आया है कि लंबे समय तक वर्षा न होने के उपरांत भी इस कुंड का जल समाप्त नहीं होता। किसी भी प्रकार के रोग विशेष तौर पर पत्थरी इत्यादि के इलाज में इस कुंड के जल को रोगी व्यक्ति को पिलाया जाता है। दूर दूर से लोग इस जल को प्राप्त करने के लिए यहां आते हैं। मंदिर का प्रांगण काफी विस्तृत क्षेत्र में फैला हुआ है। यहां राम दरबार के अतिरिक्त भगवान शिव शंकर को समर्पित एक शिवालय भी है। मंदिर में बाहर से आने वाले यात्रियों के लिए धर्मशाला की भी व्यवस्था है। इस पूरे क्षेत्र में विशेष रूप से चाय की पैदावार की जाती है। धर्मशाला नगर से इस मंदिर की दूरी लगभग पांच किलोमीटर है। शहीद स्मारक रोड से इस मंदिर तक आने का मार्ग निकलता है। यह पूरा रास्ता चाय के बागानों के बीच से होकर जाता है। जो यंहा  के सौंदर्य को चार चांद लगा देते हैं। धर्मशाला से पैदल चल कर यंहा  आने का अपना ही आनंद है। पहले इस स्थान पर छोटा सा मंदिर हुआ करता था। अधिकतर ग्वाले यंहा  आया करते थे। परन्तु समय के साथ-साथ माता के नाम की प्रसिद्घि दूर तक फैली। लोग अपनी मनचाही मुरादें माता के आशीर्वाद से पाने लगे। इस प्रकार मंदिर का आकार भी बढ़ता गया। मंदिर के वर्तमान स्वरूप का निर्माण 1965 के आसपास हुआ। जिसमें समय के अनुसार अन्य निर्माण भी जुड़ते चले गए। मंदिर का प्रबन्ध स्थानीय मंदिर कमेटी द्वारा कुशलतापूर्वक चलाया जा रहा है। माता को सकोह, सराह, नगरोटा क्षेत्रों सहित कांगड़ा व धर्मशाला के कई गाँव  में कुलदेवी के रूप में मान्यता प्राप्त है। यंहा  के परिवार अपने हर शुभ कार्य में माता के दरबार में माथा टेकने अवश्य आते हैं। नवरात्रों विशेष रूप से चैत्र मास में यहां मेले का आयोजन होता है। जिसमें दूर-दूर से लोग माता के दर्शन हेतु यंहा  आते हैं। उस समय यंहा  की छटा निराली होती है। सामान्य दिनों में निर्जन व शांत रहने वाला यह क्षेत्र श्रद्घालुओं की चहल पहल व रौनक से गुलजार हो उठता है। पूरे वातावरण में माता कुनाल पत्थरी के जयकारे गूंजने लगते हैं। 

साभार: पाञ्चजन्य, लेखक श्री  अभिनव 

Saturday, November 16, 2013

सिद्धिविनायक मंदिर



पर्यटन और आस्था का प्रतीक सिद्धिविनायक मंदिर

कोई भी शुभ काम शुरू करने से पहले भगवान गणेश की पूजा जरूर की जाती है। इस तरह की स्थिति को हम 'श्रीगणेश' के नाम से भी जानते हैं। मुंबई के प्रभादेवी में स्थित श्री सिद्धिविनायक मंदिर देश में स्थित सबसे पूजनीय मंदिरों में से एक है। यह मंदिर भगवान गणेश को समर्पित है। भक्त जब भी किसी नए काम की शुरुआत करता है तो इस मंदिर के दर्शन जरूर करता है। हर साल यहां लाखों श्रद्धालु और पर्यटक आते हैं और भगवान गणेश की पूजा करते हैं।

पौराणिक कथा

मान्यता है कि जब सृष्टि की रचना करते समय भगवान विष्णु को नींद आ गई, तब भगवान विष्णु के कानों से दो दैत्य मधु व कैटभ बाहर आ गए। ये दोनों दैत्यों बाहर आते ही उत्पात मचाने लगे और देवताओं को परेशान करने लगे। दैत्यों के आंतक से मुक्ति पाने हेतु देवताओं ने श्रीविष्णु की शरण ली। तब विष्णु शयन से जागे और दैत्यों को मारने की कोशिश की लेकिन वह इस कार्य में असफल रहे। तब भगवान विष्णु ने श्री गणेश का आह्वान किया, जिससे गणेश जी प्रसन्न हुए और दैत्यों का संहार हुआ। इस कार्य के उपरांत भगवान विष्णु ने पर्वत के शिखर पर मंदिर का निर्माण किया तथा भगवान गणेश की मूर्ति स्थापित की। तभी से यह स्थल 'सिद्धटेक' नाम से जाना जाता है।

सिद्धिविनायक मंदिर का इतिहास

मुंबई स्थित सिद्धिविनायक मंदिर का निर्माण 19 नवंबर, 1801 को लक्ष्मण विट्ठु और देउबाई पाटिल ने किया था। निर्माण के बाद भी समय-समय पर इस मंदिर को एक नया रूप दिया गया। महाराष्ट्र सरकार ने इस मंदिर के भव्य निर्माण के लिए जमीन प्रदान की जिस पर पांच मंजिला मंदिर का निर्माण किया गया।

सिद्धिविनायक मंदिर



सिद्धिविनायक मंदिर के अंदर एक छोटे मंडपम में भगवान गणेश के सिद्धिविनायक रूप की प्रतिमा प्रतिष्ठापित की गई है। मंदिर में लकड़ी के दरवाजों पर अष्टविनायक को प्रतिबिंबित किया गया है। जबकि मंदिर के अंदर की छतें सोने के लेप से सुसज्जित की गई हैं। सिद्धिविनायक मंदिर की गिनती अमीर मंदिरों में की जाती है। इस मंदिर से करोड़ों रुपए की आय होती है।

सिद्धिविनायक मंदिर का महत्व

सिद्धिविनायक मंदिर उन गणेश मंदिरों में से एक है, जहां केवल हिन्दू ही नहीं, बल्कि हर धर्म और जाति के लोग दर्शन और पूजा-अर्चना के लिए आते हैं। कहते हैं कि सिद्धि विनायक की महिमा अपरंपार है, वे भक्तों की मनोकामना को तुरंत पूरा करते हैं। मान्यता है कि ऐसे गणपति बहुत ही जल्दी प्रसन्न होते हैं और उतनी ही जल्दी कुपित भी होते हैं।

सिद्धिविनायक मंदिर भगवान गणेश के लोकप्रिय मंदिरों में से एक है। यहां पूरे साल भक्तों की भीड़ उमड़ती है। देश-विदेश से श्रद्धालु और पर्यटक भगवान गणेश के दर्शन के लिए यहां आते हैं। वैसे अगर आप भी सिद्धिविनायक मंदिर जा रहे हैं तो आप महालक्ष्मी मंदिर, चौपाटी और जूहू बीच, गेटवे ऑफ इंडिया, माउंट मेरी चर्च जाना न भूलें। यह सारे लोकप्रिय स्थल सिद्धिविनायक मंदिर से कुछ ही किलोमीटर के अंदर स्थित हैं। ट्रेन और वायु मार्ग से आप आसानी से मुंबई पहुंचकर न केवल सिद्धिविनायक मंदिर के दर्शन कर पाएंगे बल्कि अन्य उपरोक्त पर्यटक स्थल से रूबरू हो पाएंगे।

साभार: दैनिक जागरण 

Friday, October 4, 2013

VISHALAKSHI MANDIR KASHI - काशी विशालाक्षी मंदिर


माँ विशालाक्षी देवी ( चित्र साभार: KALIBHAKTI.COM)

काशी विशालाक्षी मंदिर हिन्दू धर्म के प्रसिद्ध 51 शक्तिपीठों में से एक है। यह मंदिर उत्तर प्रदेश के प्राचीन नगर काशी (वाराणसी) में काशी विश्वनाथ मंदिर से कुछ ही दूरी पर स्थित है। ऐसी मान्यता है कि यह यह शक्तिपीठ मां दुर्गा की शक्ति का प्रतीक है। हर साल लाखों श्रद्धालु इस शक्तिपीठ के दर्शन करने के लिए आते हैं। यहां आने वाले हिंदू श्रद्धालु विशालाक्षी को 'मणिकर्णी' के नाम से भी जानते हैं।

पौराणिक कथा

हिन्दुओं की मान्यता के अनुसार यहां देवी सती के दाहिने कान के कुंडल गिरे थे। यहां पर भक्त शुरू से ही देवी मां के रूप में विशालाक्षी तथा भगवान शिव के रूप में काल भैरव की पूजा करते आ रहे हैं। दुर्गा पूजा के समय विशालाक्षी मंदिर में भक्तों की भीड़ देखते ही बनती है। इस दौरान यहां भक्त दिन-रात मां दुर्गा की आराधना करते हैं।

काशी विश्वनाथ मंदिर

हिंदू धर्म में काशी विश्वनाथ का अत्यधिक महत्व है। कहते हैं काशी तीनों लोकों में न्यारी नगरी है, जो भगवान शिव के त्रिशूल पर विराजती है। मान्यता है कि जिस जगह ज्योतिर्लिंग स्थापित है वह जगह लोप नहीं होता और जस का तस बना रहता है। कहा जाता है कि जो श्रद्धालु इस नगरी में आकर भगवान शिव का पूजन और दर्शन करता है उसको समस्त पापों से मुक्ति मिलती है।

काशी विशालाक्षी मंदिर के पास और दूसरे स्मारक भी हैं जिन्हें आप देख सकते हैं जैसे काल भैरव मंदिर, पर्यटक स्थल ओम शांति योग निकेतन, शिव म्यूजिकल हाउस आदि।

कैसे पहुंचें

उत्तर भारत में स्थापित काशी विशालाक्षी मंदिर के दर्शन करने के लिए आपको सबसे पहले वाराणसी शहर में आना होगा। इसके लिए यातायात की अच्छी व्यवस्था की गई है। आप या तो हवाई यात्रा करके वाराणसी पहुंच सकते हैं या फिर रेल और सड़क के जरिए पवित्र काशी नगरी जा सकते हैं।

साभार: दैनिक जागरण 

Wednesday, October 2, 2013

पाकिस्तान के पांच पवित्र मन्दिर

पाकिस्तान में अनेक मन्दिर हैं,जो आज बहुत ही खस्ता हाल में हैं। पाकिस्तान सरकार ने कई बार कहा है कि सनातन धर्म से जुड़े कुछ ऐतिहासिक स्थलों और मन्दिरों को ठीक कराकर पर्यटन की दृष्टि से उन्हें विकसित किया जाएगा। पर अब तक कुछ नहीं हुआ है। इस बार आप पाकिस्तान के पांच बड़े मन्दिरों का महत्व और उनका हाल जानें। 

कटासराज मंदिर 



कटास संस्कृत के कटाक्ष शब्द का अपभ्रंश है जिसका अर्थ होता है आंखें, नेत्र। कहा जाता है कि पार्वती जी के वियोग में शिवजी ने जब रूदन किया था तो उनके रूदन से धरती पर दो कुंड बन गये थे। इनमें से एक कुंड पुष्कर में ब्रह्म सरोवर के रूप में मौजूद है, जबकि दूसरा सरोवर कटासराज मंदिर परिसर में मौजूद है। शिवजी की आंख से निकले आंसू से बने इस पवित्र सरोवर में स्नान करने से मनुष्य के रोग और दोष दूर हो जाते हैं। 1947 में देश विभाजन की मार सबसे अधिक इस मंदिर और सरोवर पर भी पड़ी और न तो मंदिर का रखरखाव किया गया और न ही सरोवर का। पिछले साल तो एक रपट आई थी कि सरोवर का पानी एक सीमेन्ट कारखाना को दिया जा रहा है। जाहिर है पाकिस्तान के लिए इस सरोवर का इससे अधिक और कोई महत्व भी नहीं है। लेकिन खुद कटासराज मंदिर परिसर का यह सरोवर कितना महत्वपूर्ण है वह इसके जल से समझा जा सकता है। अहमद बशीर ताहिर ने अपनी 'डाक्युमेन्ट्री' में इस बात का जिक्र किया है कि यहां सरोवर का पानी दो रंग का है। एक हरा, और दूसरा नीला। जहां सरोवर का पानी हरा है वहां सरोवर की गहराई कम है, लेकिन जहां सरोवर बहुत गहरा है वहां पानी गहरा नीला है। लाख उपेक्षा के बाद भी आज भी इस सरोवर का पानी बहुत स्वच्छ है।

कटासराज मंदिर हिन्दुओं के पवित्रम तीथोंर् में से एक है, क्योंकि ऐसा बताया जाता है कि यहीं इसी स्थान पर शिव और पार्वती का विवाह हुआ था। महाभारत काल में अपने निष्कासन के दौरान पांडवों ने 4 वर्ष कटासराज में ही बिताए थे। इसी कटासराज सरोवर के किनारे यक्ष ने युधिष्ठिर से यक्ष प्रश्न किये थे जो इतिहास में अमर सवाल बनकर दर्ज हो गये। पंजाब की राजधानी लाहौर से 270 किलोमीटर की दूरी पर चकवाल जिले में स्थित कटासराज मंदिर परिसर में स्वयंभू शिवलिंग है जिसके बारे में कहा जाता है कि वे आदिकाल से वहां स्थित है। पांडवों ने इसी शिवलिंग का पूजन किया था और वर्तमान समय में भी यह शिवलिंग उपेक्षित अवस्था में ही सही, अपने स्थान पर अडिग है। शिव मंदिर के अलावा कटासराज में राम मंदिर और अन्य देवी-देवताओं के भी मंदिर हैं जिन्हें सात घरा मंदिर परिसर कहा जाता है। मंदिर परिसर में हरि सिंह नलवा की प्रसिद्घ हवेली भी है।

हिंगलाज माता मंदिर





कटासराज मंदिर परिसर के अलावा पाकिस्तान में अनादिकाल से जो धार्मिक स्थल सबसे अधिक मान्यताप्राप्त है वह वह हिंगलाज माता का मंदिर। भारतीय उपमहाद्वीप में क्षत्रियों की कुलदेवी के रूप में विख्यात हिंगलाज भवानी माता का मंदिर 52 शक्तिपीठों में से एक है। ऐसी मान्यता है कि आदि शक्ति का सिर जहां गिरा वहीं पर हिंगलाज माता का मंदिर स्थापित हो गया। हिंगलाज भवानी माता का मंदिर बलोचिस्तान के ल्यारी जिले के हिंगोल नेशनल पार्क में हिंगोल नदी के किनारे स्थित है। क्वेटा-कराची मार्ग पर मुख्य हाइवे से करीब एक घण्टे की पैदल दूरी पर स्थित हिंगलाज माता का मंदिर पाकिस्तान के प्रमुख शहर कराची से 250 किलोमीटर दूर है।

बंटवारे के बाद से ही यहां आनेवाले दर्शनार्थियों की संख्या भले ही बहुत कम हो गई हो लेकिन यह मंदिर आज भी स्थानीय बलोचवासियों के लिए समान रूप से महत्वपूर्ण है। इस मंदिर के सालाना जलसे या मेले में केवल हिन्दू ही नहीं आते बल्कि मुसलमान भी आते हैं जो श्रद्घा से हिंगलाज माता मंदिर को 'नानी का मंदर' या फिर 'नानी का हज' कहते हैं। नानी शब्द संस्कृत के ज्ञानी का अपभ्रंश है जो कि ईरान की एक देवी अनाहिता का भी दूसरा नाम है।

हिंगलाज माता मंदिर के बारे में कहा जाता है कि यहां गुरु नानक देव भी दर्शन के लिए आये थे। हिंगलाज माता मंदिर एक विशाल पहाड़ के नीचे पिंडी के रूप में विद्यमान है जहां माता के मंदिर के साथ-साथ शिवजी का त्रिशूल भी रखा गया है। हिंगलाज माता के लिए हर साल मार्च अप्रैल महीने में लगने वाला मेला न केवल हिन्दुओं में, बल्कि स्थानीय मुसलमानों में भी बहुत लोकप्रिय है। ऐसा कहा जाता है कि दुर्गम पहाड़ी और शुष्क नदी के किनारे स्थित माता हिंगलाज का मंदिर दोनों धर्मावलंबियों के लिए अब समान रूप से महत्वपूर्ण हो गया है।

गोरी मंदिर

पाकिस्तान के सिन्ध प्रांत में थारपारकर जिले में स्थित गोरी मंदिर पाकिस्तान स्थित हिन्दुओं का एक और महत्वपूर्ण तीर्थ स्थल है। पाकिस्तान में सबसे अधिक हिन्दू इसी थारपारकर जिले में ही रहते हैं जो मूल रूप से वनवासी हैं। इन्हें पाकिस्तान में थारी हिन्दू कहा जाता है। थारपारकर में इन थारी हिन्दुओं की आबादी कुल आबादी के करीब 40 फीसदी है। गोरी मंदिर मुख्य रूप से जैन मंदिर है लेकिन अब इस मंदिर में अन्य देवी-देवताओं की मूर्तियां भी स्थापित हैं। जैन धर्म के 23वें तीथंर्कर भगवान पार्श्वनाथ की मुख्य मूर्ति अब वहां से हटाकर मुंबई में स्थापित की जा चुकी है जिन्हें गोदीजी पार्श्वनाथ कहते हैं।

मूल रूप से जैन धर्म को समर्पित यह मंदिर अपने स्थापत्य के लिहाज से बेजोड़ है और समझा जाता है इस मंदिर का स्थापत्य और माउंट आबू मंदिर परिसर का स्थापत्य एक ही शैली का है। इस मंदिर का निर्माण मध्यकाल में किया गया था। हालांकि अब पाकिस्तान में जैन धर्म के अनुयायी नाममात्र के बचे हैं लेकिन इस मंदिर परिसर में स्थानीय भील और थारी हिन्दू पूजा-उपासना करते हैं।

मरी सिन्धु मंदिर


मरी इंडस के नाम से मशहूर यह मंदिर परिसर पहली शताब्दी से पांचवीं शताब्दी के बीच बनाया गया है। मरी उस वक्त गांधार प्रदेश का हिस्सा था और चीनी यात्री ह्वेनसांग ने भी मरी का जिक्र यह कहते हुए किया है कि इस पूरे इलाके में हिन्दू और बौद्घ मंदिर खत्म हो रहे हैं। हालांकि पाकिस्तान और दुनिया के आधुनिक इतिहासकार मानते हैं कि मरी के मंदिर सातवीं शताब्दी के बाद के हो सकते हैं क्योंकि इन मंदिरों के स्थापत्य में कश्मीर की स्थापत्य शैली स्पष्ट रूप से दिखाई देती है जो इस क्षेत्र में इस्लामिक आक्रमण के बाद विकसित हुई है। आधुनिक अन्वेषणशास्त्री इन मंदिर समूहों को साल्ट रेन्ज टेम्पल्स भी कहते हैं।

इतिहासकारों का एक वर्ग यह भी कहता है कि ये मंदिर राजपूतों द्वारा बनवाये गये हो सकते हैं जिन्होंने यहां शासन किया था। मरी के मंदिर न सिर्फ अति प्राचीन हैं बल्कि स्थापत्य की अद्भुत मिसाल भी हैं लेकिन पाकिस्तान में अब उपेक्षा का शिकार होकर ये मंदिर लगभग खंडहर में तब्दील हो चुके हैं। 

शारदा पीठ





महादेवी शारदा के बिना कश्मीर का कोई अस्तित्व नहीं था, लेकिन अब ऐसा नहीं है। अब कश्मीर तो है लेकिन देवी शारदा का ही कोई अस्तित्व नहीं। सनातन धर्म शास्त्र के अनुसार भगवान शंकर ने सती के शव के साथ जो तांडव किया था उसमें सती का दाहिना हाथ इसी पर्वतराज हिमालय की तराई कश्मीर में गिरा था शारदा गांव में। यहां मंदिर कब अस्तित्व में आया इसका कोई इतिहास नहीं है, लेकिन अब भारतीय नियंत्रण रेखा से महज 17 मील दूर पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर के इस शारदा गांव में मंदिर के नाम पर सिर्फ यहां भग्नावशेष बचा है।

शारदा पीठ का महत्व इसलिए भी है कि यह 52 शक्तिपीठों में नहीं, बल्कि 18 महाशक्तिपीठ में से एक है। शारदा पीठ में पूजा और पाठ दोनों होता था। यह श्री विद्या साधना का सबसे उन्नत केन्द्र था। शैव संप्रदाय के जनक कहे जानेवाले शंकराचार्य और वैष्णव संप्रदाय के प्रवर्तक रामानुजाचार्य दोनों ही यहां आये और दोनों ने ही दो महत्वपूर्ण उपलब्धियां हासिल कीं। शंकराचार्य यहीं सर्वज्ञपीठम पर बैठे तो रामानुजाचार्य ने यहीं पर श्रीविद्या का भाष्य प्रवर्तित किया। पंजाबी भाषा की गुरुमुखी लिपि का उद्गम शारदा लिपि से ही होता है। और भी न जाने ऐसे ही कितने अचरज इस मंदिर और विद्याकेन्द्र से जुड़े थे। 

साभार : शैलेन्द्र सिंह, पाञ्चजन्य, http://www.panchjanya.com

Wednesday, September 25, 2013

YAMRAJ TEMPLE - यमराज जी का मंदिर

मंदिर, जहां मरने के बाद सबसे पहले पहुंचती है आत्मा

यमराज जी का मंदिर - भरमौर 
एक मंदिर ऐसा है जहां मरने के बाद हर किसी को जाना ही पड़ता है चाहे वह आस्तिक हो या नास्तिक। यह मंदिर किसी और दुनिया में नहीं बल्कि भारत की जमीन पर स्थित है। देश की राजधानी दिल्ली से करीब 500 किलोमीटर की दूरी पर हिमाचल के चम्बा जिले में भरमौर नामक स्थान में स्थित इस मंदिर के बारे में कुछ बड़ी अनोखी मान्यताएं प्रचलित हैं।

यहां पर एक ऐसा मंदिर है जो घर की तरह दिखाई देता है। इस मंदिर के पास पहुंच कर भी बहुत से लोग मंदिर में प्रवेश करने का साहस नहीं जुटा पाते हैं। बहुत से लोग मंदिर को बाहर से प्रणाम करके चले आते हैं। इसका कारण यह है कि, इस मंदिर में धर्मराज यानी यमराज रहते हैं। संसार में यह इकलौता मंदिर है जो धर्मराज को समर्पित है।

इस मंदिर में एक खाली कमरा है जिसे चित्रगुप्त का कमरा माना जाता है। चित्रगुप्त यमराज के सचिव हैं जो जीवात्मा के कर्मो का लेखा-जोखा रखते हैं। मान्यता है कि जब किसी प्राणी की मृत्यु होती है तब यमराज के दूत उस व्यक्ति की आत्मा को पकड़कर सबसे पहले इस मंदिर में चित्रगुप्त के सामने प्रस्तुत करते हैं। चित्रगुप्त जीवात्मा को उनके कर्मो का पूरा ब्योरा देते हैं इसके बाद चित्रगुप्त के सामने के कक्ष में आत्मा को ले जाया जाता है। इस कमरे को यमराज की कचहरी कहा जाता है।

कहा जाता है कि यहां पर यमराज कर्मों के अनुसार आत्मा को अपना फैसला सुनाते हैं। यह भी मान्यता है इस मंदिर में चार अदृश्य द्वार हैं जो स्वर्ण, रजत, तांबा और लोहे के बने हैं। यमराज का फैसला आने के बाद यमदूत आत्मा को कर्मों के अनुसार इन्हीं द्वारों से स्वर्ग या नर्क में ले जाते हैं। गरूड़ पुराण में भी यमराज के दरबार में चार दिशाओं में चार द्वार का उल्लेख किया गया है।

साभार: राकेश, अमर उजाला