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Friday, May 8, 2015

KUNJAPURI DEVI - कुंजापुरी देवी सिद्ध पीठ



स्कन्दपुराण के अनुसार राजा दक्ष की पुत्री, सती का विवाह भगवान शिव से हुआ था। त्रेता युग में असुरों के परास्त होने के बाद दक्ष को सभी देवताओं का प्रजापति चुना गया। उन्होंने इसके उपलक्ष में कनखल में यज्ञ का आयोजन किया। उन्होंने, हालांकि, भगवान शिव को आमंत्रित नहीं किया क्योंकि भगवान शिव ने दक्ष के प्रजापति बनने का विरोध किया था। भगवान शिव और सती ने कैलाश पर्वत, जो भगवान शिव का वास-स्थान है, से सभी देवताओं को गुजरते देखा और यह जाना कि उन्हें निमंत्रित नहीं किया गया है। जब सती ने अपने पति के इस अपमान के बारे में सुना तो वे यज्ञ-स्थल पर गईं और हवन कुंड में अपनी बलि दे दी। जब तक शिव वहां पहुंचते तब तक वे बलि हो चुकी थीं।

भगवान शिव ने क्रोध में आकर तांडव किया और अपनी जटाओं से गण को छोड़ा तथा उसे दक्ष का सर काट कर लाने तथा सभी देवताओं को मार-पीट कर भगाने का आदेश दिया। पश्चातापी देवताओं ने भगवान शिव से क्षमा याचना की और उनसे दक्ष को यज्ञ पूरा करने देने की विनती की। लेकिन, दक्ष की गर्दन तो पहले ही काट दी गई थी। इसलिए, एक भेड़े का गर्दन काटकर दक्ष के शरीर पर रख दिया गया ताकि वे यज्ञ पूरा कर सकें।

भगवान शिव ने हवन कुंड से सती के शरीर को बाहर निकाला तथा शोकमग्न और क्रोधित होकर वर्षों तक इसे अपने कंधों पर ढोते विचरण करते रहें। इस असामान्य घटना पर विचार-विमर्श करने सभी देवतागण एकत्रित हुए क्योंकि वे जानते थे कि क्रोध में भगवान शिव समूची दुनिया को नष्ट कर सकते हैं। आखिरकार, यह निर्णय लिया गया कि भगवान विष्णु अपने सुदर्शन चक्र का उपयोग करेंगे। भगवान शिव के जाने बगैर भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर को 52 टुकड़ों में विभक्त कर दिया। धरती पर जहां कहीं भी सती के शरीर का टुकड़ा गिरा, वे स्थान सिद्ध पीठों या शक्ति पीठों (ज्ञान या शक्ति के केन्द्र) के रूप में जाने गए। उदाहरण के लिए नैना देवी वहां हैं, जहां उनकी आंखें गिरी थीं, ज्वाल्पा देवी वहां हैं, जहां उनकी जिह्वा गिरी थी, सुरकंडा देवी वहां हैं, जहां उनकी गर्दन गिरी थी और चंदबदनी देवी वहां हैं, जहां उनके शरीर का नीचला हिस्सा गिरा था।

उनके शरीर के ऊपरी भाग, यानि कुंजा उस स्थान पर गिरा जो आज कुंजापुरी के नाम से जाना जाता है। इसे शक्तिपीठों में गिना जाता है।

देवी कुंजापुरी मां को समर्पित मां कुंजापुरी देवी मंदिर से दर्शनार्थी गढ़वाल पहाड़ियों के रमणीय दृश्य को देख सकते हैं। आप कई महत्वपूर्ण चोटियों जैसे उत्तर दिशा में स्थित बंदरपंच (6,320 मी.), स्वर्गारोहिणी (6,248 मी.), गंगोत्री (6,672 मी.) और चौखम्भा (7,138 मी.) को देख सकते हैं। दक्षिण दिशा में यहां से ऋषिकेश, हरिद्वार और इन घाटी जैसे क्षेत्रों को देखा जा सकता है।

यह मंदिर उत्तराखंड में अवस्थित 51 सिद्ध पीठों में से एक है। मंदिर का सरल श्वेत प्रवेश द्वार में एक बोर्ड प्रदर्शित किया गया है जिसमें यह लिखा गया है कि यह मंदिर को 197वीं फील्ड रेजीमेंट (कारगिल) द्वारा भेंट दी गई है। मंदिर तक तीन सौ आठ कंक्रीट सीढ़ियां पहुंचती हैं। वास्तविक प्रवेश की पहरेदारी शेर, जो देवी की सवारी हैं और हाथी के मस्तकों द्वारा की जा रही है। कुंजापुरी मंदिर अपने आप में ही श्वेतमय है। हालांकि, इसके कुछ हिस्से चमकीले रंगों में रंगे गए हैं। इस मंदिर का 01 अक्टूबर 1979 से 25 फ़रवरी 1980 तक नवीकरण किया गया था मंदिर के गर्भ गृह में कोई प्रतिमा नहीं है - वहां गड्ढा है - कहा जाता है कि यह वही स्थान है जहां कुंजा गिरा था। यहीं पर पूजा की जाती है, जबकि देवी की एक छोटी सी प्रतिमा एक कोने में रखी है।

मंदिर के परिसर में भगवान शिव की मूर्ति के साथ-साथ भैरों, महाकाली नागराज और नरसिंह की मूर्तियां हैं।

मंदिर में प्रतिदिन प्रातः 6.30 और सायं 5 से 6.30 बजे तक आरती का आयोजन किया जाता है।

कुंजापुरी के पुजारी कुंवर सिंह भंडारी और धरम सिंह भंडारी -- उस वंश से आते हैं जिसने पीढ़ियों से कुंजापुरी मंदिर में पूजा की है। रोचक बात यह है कि गढ़वाल के अन्य मंदिरों, जहां पुजारी सदैव एक ब्राह्मण होता है, के उलट कुंजापुरी पुजारी राजपूत या जजमान होते हैं उन्हें जिस नाम से गढ़वाल में जाना जाता है। उन्हें इस मंदिर में बहुगुणा जाति के ब्राह्मणों के द्वारा शिक्षा दी जाती है।

वर्ष 1972 से प्रतिवर्ष दशहरा पर्व के पहले नवरात्रों के दौरान कुंजापुरी मंदिर में कुंजापुरी पर्यटन एवं विकास मेले का आयोजन किया जाता है।

यह इस क्षेत्र के सबसे बड़े पर्यटक आकर्षण केन्द्रों में से एक है। इसमें पड़ोसी क्षेत्रों के साथ-साथ दुनियाभर के लगभग 50,000 दर्शक भाग लेते हैं। यह मेला पर्यटन एवं विकास को बढ़ावा देने की दोहरी भूमिका निभाता है। कई प्रकार की अंतसांस्कृतिक प्रदर्शनियां और संगीत एवं नृत्य कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं जिसमें देशभर के कलाकार हिस्सा लेते हैं। सरकार भी विकास के एक साधन के तौर पर इस मेले का उपयोग करती है तथा स्थानीय किसानों को फसलों और खेती की तकनीकों के बारे में जानकारी देने के लिए इस अवसर का उपयोग करती है।

Tuesday, November 18, 2014

NAINA DEVI MANDIR - NAINITAL - मां नैना देवी मंदिर-नैनीताल उत्तराखंड









प्रकृति के वरदान से विभूषित देवभूमि उत्तराखंड की हृदयस्थली है नैनीताल शहर और नैनीताल की हृदयस्थली है नैनी झील। इसी नैनी झील के उत्तरी सिरे पर स्थित है मां नैना देवी का मंदिर। स्थानीय विश्वास के अनुसार यह मंदिर शक्तिपीठ है। मान्यता है कि यहां सती के नेत्र गिरे थे, इसलिए इसका नाम नैना देवी प्रसिद्ध हुआ। मंदिर परिसर में प्रवेश करते ही बायीं तरफ एक विशाल पीपल का वृक्ष है और दायीं तरफ हनुमान जी की प्रतिमा। मंदिर के मुख्य परिसर में प्रवेश करने के बाद शेरों की दो प्रतिमाएं हैं। मुख्य परिसर में तीन देवी-देवता विराजमान हैं। बीच में मुख्य देवी नैना देवी हैं, जिन्हें दो नेत्रों द्वारा दर्शाया गया है। उनकी बायीं तरफ मां काली हैं और दायीं तरफ भगवान गणेश।

नैना देवी की प्रतिमा वाले भवन के ठीक सामने काले पत्थर का एक बहुत ही सुंदर शिवलिंग भी स्थापित है। कहा जाता है कि मंदिर का निर्माण 15वीं शताब्दी में हुआ था, लेकिन 1880 में हुए एक भूस्खलन की वजह से यह मंदिर नष्ट हो गया। बाद में 1883 में इस मंदिर का पुनर्निर्माण कराया गया। नैना देवी को नैनीताल शहर की कुल देवी कहा जाता है और इस शहर का नामकरण उन्हीं के नाम पर किया गया है। नैनी झील को ‘लघु मानसरोवर’ भी कहते हैं। ऐसी मान्यता है कि अत्रि ऋषि, पुलस्त्य ऋषि और पुलह ऋषि ने मानसरोवर का जल लाकर इस झील का निर्माण किया था, इसलिए इसका एक नाम ‘त्रिऋषि सरोवर’ भी है। यूं तो नैना देवी मंदिर में वर्ष भर श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है, लेकिन नवरात्रि, सावन मेला और चैत्र मेला के दौरान यहां बाकी समय की अपेक्षा ज्यादा श्रद्धालु आते हैं। मंदिर से आम के आकार वाली नैनी झील का दृश्य अत्यंत मनोरम दिखाई देता है। मंदिर दर्शन के लिए सुबह 6 बजे से रात 10 बजे तक खुला रहता है।

साभार : देवालय परिचय - Devalaya Parichay, फेसबुक. 

Wednesday, August 21, 2013

हिमालय के चार धाम तीर्थाटन ही नहीं, पर्यटन भी




प्राचीन काल से ही भारत के चार धामों का ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व है। हिन्दू समाज भारत केचारों कोनों पर स्थित चार धामों (पूर्व में जगन्नाथपुरी, पश्चिम में द्वारका, उत्तर में बद्रीनाथ औरदक्षिण में रामेश्वरम्) के दर्शन को अपना सौभाग्य मानता है। पर पिछले कुछ दशकों में हिमालय में हीस्थित चार प्रमुख तीर्थस्थलों को चार धाम की मान्यता देकर उसकी यात्रा का प्रचलन तेजी से बढ़ा है।हिमालय क्षेत्र में स्थित उत्तराखण्ड राज्य और उसके भी गढ़वाल मण्डल में स्थित बद्रीनाथ, केदारनाथ,गंगोत्री और यमुनोत्री की यात्रा 'चार धाम यात्रा' के रूप में प्रचलित हो रही है। शीतकाल में इन स्थानों परस्थित इन प्राचीन मंदिरों के कपाट बंद हो जाते हैं और ग्रीष्मकाल में विधि-विधान पूर्वक इन मंदिरों केकपाट खोले जाते हैं और यात्रा शुरू होती है। इस वर्ष गंगोत्री व यमुनोत्री मंदिर के कपाट 13 मई (अक्षयतृतीया के दिन), श्री केदारनाथ के 14 मई एवं श्री बद्रीनाथ के कपाट 16 मई को खुल रहे हैं। यहां प्रस्तुत हैइन मंदिरों के ऐतिहासिकता, प्राचीनता और उनके दर्शन का महत्व-


चार धामों में से एक। भगवान विष्णु के बद्रीनाथ रूप को समर्पित। वर्तमान मंदिर का निर्माण आदिशंकराचार्य ने आठवीं शताब्दी में कराया। समुद्र तल से 3,133 मीटर की ऊंचाई पर स्थित। अलकनंदानदी के तट के दोनों ओर नर और नारायण पर्वत श्रृंखला के बीच स्थित। 27 किमी. दूर स्थित बद्रीनाथशिखर की ऊंचाई 7138 मीटर। वहां स्थित मंदिर में भगवान विष्णु की बेदी है, जो 2,000 वर्ष से अधिकप्राचीन है। अन्य दर्शनीय स्थल- तप्त कुण्ड, ब्रह्म कपाल, शेषनेत्र, चरण पादुका, नीलकण्ठ पर्वत।


द्वादश ज्योर्तिलिंगों में से एक। वर्तमान मंदिर का निर्माण पाण्डव वंशी जनमेजय द्वारा कराया गयामाना जाता है। आदि शंकराचार्य ने आठवीं शताब्दी में जीर्णोद्धार करवाया। केदार पर्वत श्रृंखला के बीचस्थित। मंदाकिनी नदी के समीप, 3562 मीटर की ऊंचाई। माना जाता है कि केदारनाथ के दर्शन किएबिना बद्रीनाथ के दर्शन का भी फल नहीं मिलता है। अन्य दर्शनीय स्थल- गांधी सरोवर, वासुकी ताल,ब्रह्मकुण्ड, हंसकुण्ड, भैरवनाथ, बुराडी ताल

गोमुख से निकली गंगा जी या भागीरथी के दर्शन हेतु सड़क मार्ग का अंतिम स्थान। वर्तमान गंगा मंदिर18वीं शताब्दी में निर्मित हुआ। समुद्र तल से 3,140 मीटर की ऊंचाई पर स्थित। भगवान श्रीरामचन्द्र जीके पूर्वज चक्रवर्ती राजा भगीरथ ने यहीं एक शिला पर बैठकर भगवान शंकर की आराधना की थी।महाभारत युद्ध के पश्चात पाण्डवों ने यहीं आकर अपने परिजनों की आत्मा की शांति के लिए देवयज्ञकिया था। 20 फीट ऊंचे सफेद संगमरमर के पत्थरों से निर्मित है यह मंदिर। यहां से गोमुख 19 किमी.दूरी पर, 3892 मीटर की ऊंचाई पर है। भैरों घाटी अत्यन्त रमणीय है।

देवी यमुना को समर्पित यह स्थल समुद्र तल से 3235 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। यह असित मुनी कानिवास स्थान था। तीर्थस्थल से मात्र 1 किमी. दूरी पर कालिंदी पर्वत के बीच 4421 मी. की ऊंचाई परयमुना नदी का उद्गम स्थल है। हनुमान चट्टी पर उतरकर 14 किमी. की पैदल यात्रा करके यमुनोत्रीपहुंचा जा सकता है। प्राकृतिक आपदाओं के कारण अनेक बार ध्वस्त व पुनर्निमित हुए इस मंदिर कावर्तमान स्वरूप 19वीं शदी में जयपुर की महारानी गुलेरिया द्वारा बनबाया गया माना जाता है।

वैसे तो सम्पूर्ण हिमालय एक तीर्थ क्षेत्र है। इसकी प्रत्येक घाटी तथा छोटी-बड़ी नदियों के तट पर तीर्थ स्थित हैं। किन्तु बद्रीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री तथा यमुनोत्री प्रमुख प्रचलित तीर्थस्थल हैं, जिनकी दुनिया भर में मान्यता है। यहां ऐसे अनेक ज्ञात-अज्ञात आस्था केन्द्र हैं जो सांस्कृतिक दृष्टि से विशेष महत्व रखते हैं। पंचप्रयाग, पंचबद्री, पंचकेदार, नन्दादेवी, बैजनाथ, मायावती, ताड़केश्वर, कण्वाश्रम, कालीकुमाऊं, हनौल, आदिबद्री, पलेठी का सूर्य मन्दिर, बूढ़ाकेदार आदि-आदि। हिमालय में अधिक संख्या में शिवलिंग या शिवालय स्थापित हैं, इसी कारण केदारखण्ड को शिवक्षेत्र भी कहा गया है।

बद्रीनाथ

देश के चारों कोनों पर स्थित चार धामों में से एक है - बद्रीनाथ। इसका सम्बन्ध सतयुग से है, जबकि अन्य धामों का त्रेता, द्वापर तथा कलियुग से। श्री बद्रीनाथ के हर युग में नाम भी अलग-अलग हैं। सतयुग में इसे मुक्तिप्रदा, त्रेता मंे योगसिद्धिदा, द्वापर में विशाला तथा कलियुग में बद्रिकाश्रम के रूप में जाना जाता है। स्कन्धपुराण में इससे सम्बन्धित श्लोक मिलता है-

कृते मुक्तिप्रदा प्रोक्ता,
त्रेतायाम् योगसिद्धिदा।
विशाला द्वापरे प्रोक्ता,
कलौ बद्रिकाश्रमम्।।

मान्यता है कि इस धाम का महत्व तप के कारण से है। भगवान नारायण ने सृष्टि की रचना के पश्चात् जगत को कर्म मार्ग पर अग्रसर करने की भावना से स्वयं यहां तप के पश्चात् विष्णु वाहन होने की पदवी प्राप्त की थी। नारद को काम जीतने की शक्ति यहीं प्राप्त हुई। राम, कृष्ण आदि अवतारी पुरूषों द्वारा भी तप हेतु यहां आने के प्रमाण मिलते हैं। इसी मार्ग पर पाण्डवों का स्वर्गारोहण सर्वविदित है।

केदारनाथ

मन्दाकिनी के पावन तट पर स्थित है, केदारनाथ। द्वादश ज्योतिर्लिंगों में 'हिमालये तु केदारम्' ऐसा उल्लेख है। यहां भगवान आशुतोष शिवशंकर सदा वास करते हैं। मन्दिर के गर्भगृह में भगवान शंकर ज्योतिर्लिंग स्वरूप शिला के रूप में स्थित हैं। इसके अग्रभाग में जगत्जननी पार्वती की सुशोभित प्रतिमा सहित अनेक मूर्तियां हैं तथा समीपवर्ती क्षेत्र में हंसकुण्ड, भैरवनाथ तथा नवदुर्गा आदि। यहीं कुछ दूरी पर बुराड़ी ताल, वासुकी ताल, भृगुपन्त्य तथा ब्रह्मकुण्ड आदि स्थित हैं, जो आध्यात्म तथा पर्यटन की दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं। वासुकी ताल में दुर्लभ पुष्प ब्रह्मकमल पाया जाता है। ये सभी स्थान केदारनाथ से 8 से 10 किलोमीटर की परिधि में हैं। मन्दिर के पार्श्व भाग में आद्यशंकराचार्य की समाधि है। इसे दण्डस्थल भी कहते हैं, जो सनातन धर्म की जीवन्तता का प्रतीक है।

कपाट खुलने का महत्व

कपाट खुलने के दिन का मुख्य आकर्षण उस दीपज्योति का दर्शन होता है, जो शीतकाल के लगभग छ: महीने पूजागृह में ज्योति अनवरत जलती रहती है। बद्रीनाथ तथा केदारनाथ मन्दिर के कपाट (द्वार) खुलने का लोकमान्य विधान आदिकाल से चला आ रहा है। यह मान्यता बनी हुई है कि कपाल बन्द होने पर छ: महीने देवपूजा तथा छ: माह मानव पूजा के लिये मन्दिर के द्वार खुले रहते हैं। वृहद् नारदपुराण में इसका उल्लेख है -

लभन्ते दर्शनं पुण्यं, पापकर्म विवर्जिता
ण्मासे देवते: पूज्या, षण्मासे मानवे।़तथा

लम्बे कालखण्ड तक इस क्षेत्र के चारों तीर्थों-बद्रीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री एवं यमुनोत्री के मन्दिरों की व्यवस्था संरक्षक के रूप में टिहरी नरेश देखते रहे हैं। बसन्त पंचमी के अवसर पर टिहरी दरबार (नरेन्द्र नगर) में रावल (मुख्य पुजारी) की जन्म कुण्डली को ध्यान में रखकर दिशाप्रस्थान तथा कपाट खुलने का मुहूर्त देखा जाता है। गंगोत्री व यमुनोत्री के कपाट सामान्य रूप से अक्षय तृतीया को ही खुलते हैं। कपाट खुलते समय टिहरी नरेश द्वारा रावल का तिलक किया जाता है, इसे तिलपात्र अभिषेक कहा जाता है। मन्दिर में जलने वाले ज्योति स्तम्भ निमित्त तेल की पिराई भी समारोहपूर्वक टिहरी नरेश के यहां से ही की जाती है।

ऐतिहासक यात्रा

पौराणिक काल में तीर्थाटन के लिये पैदल यात्रा की परम्परा थी। आद्यशंकराचार्य, स्वामी विवेकानन्द, स्वामी रामतीर्थ सदृश अनेक सन्त इन्हीं दुर्गम मार्गों से पैदल चलकर हिमालय आये। यातायात साधनों के प्रचलन से पैदल यात्रा की यह विधा धीरे-धीरे लुप्त होती गई। पैदल यात्रा को आधार मानकर ही वर्तमान परिवहन मार्गों का निर्माण हुआ है। पहले इस सम्पूर्ण मार्ग में चट्टी व्यवस्थाएं थीं। हरिद्वार से जहां एक ओर देवप्रयाग होकर केदारनाथ व बद्रीनाथ तक चट्टियों की श्रृंखला थी, वहीं दूसरी ओर हरिद्वार, देहरादून, मसूरी होकर धरासू तथा यमुनोत्री, गंगोत्री तक फैले पड़ाव स्थलों यात्रियों को पैदल मार्ग पर सब प्रकार की सुविधाएं प्रदान करते थे। बद्रीनाथ से कर्णप्रयाग लौटकर वहां से रामनगर की ओर मार्ग जाता था, इसमें आदिबद्री, भिकियासैंण, कोट आदि प्रमुख चटिटयां थीं। इस प्रकार सैकड़ों चटिटयां सम्पूर्ण पर्वतीय क्षेत्र के लोगों को पर्यटन उद्योग से भी जोड़ती थीं। तीर्थयात्रा का पारम्परिक क्रम यमुनोत्री से प्रारम्भ होकर गंगोत्री, केदारनाथ तथा अन्त में बद्रीनाथ है। यमुनोत्री तथा केदारनाथ के मोटर मार्ग से दूर होने के कारण अभी भी पैदल यात्रा ही करनी होती है। इससे यात्रा का वास्तविक आनन्द प्राप्त होता है तथा यहां के नैसर्गिक सौन्दर्य को निकट से देखने व अनुभव करने का अवसर भी प्राप्त होता है।

गत वर्ष 10 लाख देशी-विदेशी पर्यटक यहां आये। देहरादून सहित यात्रा मार्गों पर 50 से अधिक विश्रामगृह बद्री-केदार मंदिर समिति द्वारा स्थापित किये गये हैं। मन्दिर समिति को प्राप्त धन का उपयोग जनसेवा के उपक्रमों में भी किया जाता है, जिनमें संस्कृत विद्यालयों का सहयोग, हिन्दी-भाषी शिक्षण संस्थानों की सहायता, नि:शुल्क भोजनालय आदि प्रमुख हैं। केदारनाथ में मन्दिर समिति का एक औषधालय भी है।

बद्रीनाथ से आने वाली अलकनन्दा तथा गंगोत्री से आ रही भागीरथी दोनों का संगम स्थल है - देवप्रयाग।यहीं इस संयुक्त धारा को गंगा नाम मिला है। पंचप्रयागों का प्रवेश द्वार, यह एक प्रमुख संगमतीर्थ है तथा मर्यादा पुरूषोत्तम भगवान राम के भव्य 2100 वर्ष पुराने मन्दिर से यह नगरी सुशोभित है। बद्रीनाथ के तीर्थपुरोहितों का यह पैतृक स्थान भी है।

सिर्फ पर्यटन नहीं

वर्तमान में पर्यटन के बढ़ते आयाम के साथ तीर्थाटन की आत्मा भी जीवन्त बनी रहे, इसकी सजगता चाहिये। पर्यटन के साथ पनप रहा पाश्चात्य अन्धानुकरण हिमालय के वातावरण के लिये घातक सिद्ध होगा। प्रदूषण के कारण बिगड़ते पर्यावरण तथा मानव के विपरीत व्यवहार के कारण हिमखण्ड (ग्लेशियर) सिमटते जा रहे हैं, गंगा समेत अनेक नदियों का जल कम हो रहा है। बाँध परियोजनाओं ने भी जल की अविरलता तथा निर्मलता को प्रभावित किया है। विकास के नाम पर विकार न आये, इसका ध्यान रखना भी आवश्यक है। यहां के स्थानीय उत्पादनों का लोप होकर विदेशी पदार्थों का प्रवेश भी एक अच्छा लक्षण नहीं है।

सम्पूर्ण हिमालय तीर्थक्षेत्र है। यहां शताब्दियों से व्यक्ति आध्यात्मिक पिपासा को शान्त करने तथा तीर्थाटन के उद्देश्य से आता है। दक्षिण के कालड़ी से चलकर आद्य शंकराचार्य यहां आये, स्वामी विवेकानन्द ने यहां प्रवास किया, स्वामी रामतीर्थ की तो यह कर्मस्थली ही रही, वे बार-बार यहां आये। यही भिलंगना में उन्होंने जलसमाधि ली। यहां के तीर्थ, यहां का नैसर्गिक सौन्दर्य, स्वच्छ वातावरण इस देवभूमि की अमूल्य सम्पदा है।

(वर्तमान में प्राकृतिक आपदा व केदारनाथ में भयंकर जल  सुनामी के कारण से यात्रा बंद है. इसमें बहुत बड़ी जनहानि हुई है, आइये हम उन मृत आत्माओं को श्रद्धांजली अर्पित करे. ॐ शान्ति, ॐ शान्ति, ॐ शांति। )

लेख साभार: पाञ्चजन्य 

Monday, April 15, 2013

कुंजापुरी शक्तिपीठ मंदिर - Kunjapuri Shakti Peeth Temple

माँ कुंजापुरी देवी (चित्र साभार मेरा पहाड़ फोरम)


कुंजापुरी माता के प्रमुख शक्ति एवं सिद्ध पीठों में से एक हैं जहां मां के अंग का एक भाग गिरा था. ओर तभी से एक पवित्र तीर्थ स्थल के रूप में जाना जाने लगा. कुंजापुरी मंदिर उत्तराखंड में स्थित 51 सिद्ध पीठों में से एक माना जाता है. मंदिर का सरल श्वेत प्रवेश द्वार सभी को आकर्षित करता है जो सेना द्वारा मां को अर्पण किया गया है. 

यह मंदिर गढ़वाल के सुंदर रमणीक स्थलों में से भी एक है इसके चारों ओर प्रकृति की सुंदर छ्टा के दर्शन होते हैं. पहाड़ों पर स्थित यह मंदिर भक्तों की आस्था का अटूट केन्द्र है जिसकी डोर माता के दर्शनों से बंधी हुई होती है तथा भक्त यहां खींचा चला आता है. ये मंदिर ऋषिकेश से ३५ किलोमीटर ऊपर नरेन्द्र नगर के पास स्थित हैं.

कुंजापुरी मंदिर बहुत ही सुंदर रूप से निर्मित किया गया है कुंजापुरी मंदिर का निर्माण सन 1979 के समय किया गया था. मंदिर का प्रवेश द्वार ही इतना आकर्षक है की मंदिर की आभा में चार चांद लगा देता है. मंदिर तक पहुँचने के लिए सीढ़ियां का इस्तेमाल किया जाता है जो मंदिर की उँचाई से वाक़िफ़ कराती प्रतीत होती हैं. 

मंदिर परिसर में शिव ,भैरों, महाकाली, तथा नरसिंह की मूर्तियां विराजित हैं. कुंजापुरी मंदिर श्वेत रुप में निर्मित है परंतु फिर भी मंदिर के कुछ भागों में अन्य मनमोहक रंगों का भी उपयोग किया गया है. मंदिर की शिल्प कला बहुत ही उत्कृष्ट है. प्रवेश द्वार के सामने शेर की मूर्ति को देखा जा सकता है.

जो देखने में ऎसा प्रतीत होता है जैसे की यह शेर मां के मंदिर की रखवाली में लगा हो. मंदिर के गर्भ गृह में गड्ढा बना हुआ है मान्यता है कि इसी स्थान पर माता का कुंजा गिरा था इस स्थान को बहुत ही पूजनिय माना जाता है यहीँ माँ की पूजा की जाती है.
कुंजापुरी मंदिर कथा | Kunjapuri Temple Story In Hindi

कुंजापुरी सिद्धपीठ मां के भक्तों का प्रमुख शक्ति स्थल है इस स्थान के बारे में पौराणिक आख्यान भी प्राप्त होते हैं. जिसके अनुसार राजा दक्ष की पुत्री सती का विवाह जब भगवान शिव से हुआ तो दक्ष को यह संबंध पसंद नहीं था इस कारण जब एक बार दक्ष ने अपने प्रजापति बनने के उपलक्ष में एक यज्ञ का आयोजन करवाया तो उसमें उसने अपनी पुत्री सती एवं भगवान शिव को निमंत्रण नहीं दिया

इस पर सती ने पिता के यज्ञ मे जाने के लिए भगवान शिव से आज्ञा मांगी परन्तु भगवान शिव ने उन्हें जाने से रोका किंतु सती के बार बार आग्रह करने पर शिव ने विवश होकर उन्हें यज्ञ में जाने की आज्ञा प्रदान की. जब देवी सती यज्ञ में पहुँची तो देखा की वहां पर शिव का स्थान ही नहीं है तथा दक्ष द्वारा किए अपने पति के इस अपमान को सह न सकीं और उसी समय यज्ञ-स्थल पर बने हवन कुंड में समा गईं.

जब भगवान शिव को इस बात का पता चला तो उन्होंने दक्ष को मारने के लिए अपने गणों को भेजा भगवान के गण ने दक्ष का सर काट कर भगवान के समक्ष प्रस्तुत किया और पूरे यज्ञ को तहस नहस कर दिया भगवान शिव के क्रोध को देखकर सभी देव घबरा गए और भगवान शिव से क्षमा याचना करने लगे.

इस पर भगवान शिव शांत हुए उन्होंने दक्ष को जीवन दान दिया एवं यज्ञ पूरा करने दिया. भगवान शिव हवन कुंड से सती के शरीर को निकाल कर शोकमग्न होकर वहां से चले जाते हैं और सती के शरीर को अपने कंधों पर लेकर आकाश में विचरण करने लगते हैं. इस घटना को देखकर सारी सृष्टि डोलने लगी.

इस विचित्र संकट को देखकर सभी देव भगवान विष्णु के पास जाते हैं. इस समस्या को दूर करने का आग्रह करते हैं इस पर विष्णु भगवान अपने चक्र से सती के निर्जिव शरीर के टुकड़े-टुकड़े कर देते हैं और इस प्रकार जहां-जहां सती के शरीर के अंग गिरते हैं वहां-वहां शक्ति स्थल निर्मित हुए उनमें से एक है कुंजापुरी सिद्ध शक्ति पीठ है. 

कुंजापुरी मंदिर महत्व  

कुंजा पुरी शक्ति पीठ भारत के प्रमुख तीर्थ स्थलों में महत्वपूर्ण है. देवी कुंजापुरी को समर्पित यह धार्मिक स्थल रमणीय दृश्यों से भरपूर है यहां से आप अनेक महत्वपूर्ण स्थलों को देख सकते हैं. यहां से स्वर्गारोहिणी, गंगोत्री, ऋषिकेश, हरिद्वार जैसे क्षेत्रों को देखा जा सकता है.

यहां आने वाले सभी भक्तों की मनोकमनाएं पूर्ण होती हैं माता के इस दरबार में हमेशा मां के जय कारों की गुंज सुनाई पड़ती है. मां के रूप को इस मंत्र द्वारा उल्लेखित किया जा सकता है. 

"या देवी सर्व भूतेशु शक्ति रूपेण संशतः

नमोतस्ये नमोतस्ये नमोतस्ये नमो नमः"

साभार : ASTROBIX.COM

Tuesday, September 11, 2012

कटारमल सूर्य मंदिर-KATARMAL SUN TEMPLE


HISTORY OF KATARMAL MANDIR 





Nestled among the thick deodars of these Kumaon hills is the imposing Surya temple. Located at KATARMAL at an altitude of 2116 mt, this quaint temple, built in the 9th century, is relatively unknown as compared to the world-famous sun temple of Konark. Little over one Kilometre ( 0.6 mile ) beyond Katarmal, is Bikut forest, from where a magnificent view of Almora presents itself. 

This sun temple is one of the most important temples dedicated to the Sun God. It was built by KATARMALLA, a Katyuri Raja, in the 9th century. In the early medieval period, Kumaon was ruled by the Katyuri dynasty. On a hilltop facing east, opposite Almora, is the temple of Katarmal.

The deity of the sun temple in Katarmal is known as Burhadita or Vraddhaditya (the old Sun God). The temple, noted for its magnificent architecture, artistically made stone and metallic sculptures and beautifully carved pillars and wooden doors, has a cluster of 44 small, exquisitely carved temples surrounding it. The present mandapa of the temple as well as many of the shrines within the enclosure have been constructed much later. The image of Surya in the temple dates back to 12th century (presently preserved at the National museum ,Delhi) . The idols of Shiva-Parvati and Lakshmi-Narayana are also found in the temple. However, the intricately carved doors and panels have been removed to the National Museum in Delhi after the 10th-century idol of the presiding deity was stolen.

But due to the sheer neglect of the authorities the temple and complex is in very bad shape. One feels sorry that a monument of such a historical importance had been left to decay like this. But even than it is a place worth visiting.Though now some restoration work has started , and the government is also making road. The temple is now protected and preserved by the Archeological Survey of India. 

Besides Katarmal and Konark, there are three other sun temples in the country - Modhera sun temple in Gujarat, Martand temple in Kashmir and Osia in Rajasthan.



कटारमल का सूर्य मन्दिर अपनी बनावट के लिए विख्यात है। महापंडित राहुल सांकृत्यायन ने इस मन्दिर की भूरि-भूरि प्रशंसा की। उनका मानना है कि यहाँ पर समस्त हिमालय के देवतागण एकत्र होकर पूजा अर्चना करते रहै हैं। उन्होंने यहाँ की मूर्तियों की कला की प्रशंसा की है।

कटारमल के मन्दिर में सूर्य पद्मासन लगाकर बैठे हुए हैं। यह मूर्ति एक मीटर से अधिक लम्बी और पौन मीटर चौड़ी भूरे रंग के पत्थर में बनाई गई है। यह मूर्ती बारहवीं शताब्दी की बतायी जाती है। कोर्णाक के सूर्य मन्दिर के बाद कटारमल का यह सूर्य मन्दिर दर्शनीय है। कोर्णाक के सूर्य मन्दिर के बाहर जो झलक है, वह कटारमल मन्दिर में आंशिक रुप में दिखाई देती है।

कटारमल के सूर्य मन्दिर तक पहुँचने के लिए अल्मोड़ा से रानीखेत मोटरमार्ग के रास्ते से जाना होता है। अल्मोड़ा से १४ कि.मी. जाने के बाद ३ कि.मी. पैदल चलना पड़ता है। मन्दिर १५५४ मीटर की ऊँचाई पर स्थित है। अल्मोड़ा से कटारमल मंदिर १७ कि.मी. की निकलकर जाता है। रानीखेत से सीतलाखेत २६ कि.मी. दूर है। १८२९ मीटर की ऊँचाई पर बसा हुआ है। कुमाऊँ में खुले मैदान के लिए यह स्थान प्रसिद्ध है। कुमाऊँ का यह ऐसा खिला हुआ रमणीय स्थान है यहाँ देश के कोने-कोने से हजारों बालचर तथा एन.सी.सी. के कैडेट अपने-अपने शिविर लगाकर प्रशिक्षण लेते हैं। यहाँ ग्रीष्म ॠतु में रौनक रहती है। प्रशिक्षण के लिए यहाँ पर्याप्त व्यवस्था है। दूर-दूर तक कैडेट अपना कार्यक्रम करते हुए, यहाँ आनन्द मनाते हैं।


साभार : विकी उत्तराखंड., merapahad.com.

गर्जिया देवी मन्दिर-GARJIYA DEVI MANDIR


रामनगर से १० कि०मी० की दूरी पर ढिकाला मार्ग पर गर्जिया नामक स्थान पर देवी गिरिजा माता के नाम से प्रसिद्ध हैं। देवी गिरिजा जो गिरिराज हिमालय की पुत्री तथा संसार के पालनहार भगवान शंकर की अर्द्धागिनी हैं, कोसी (कौशिकी) नदी के मध्य एक टीले पर यह मंदिर स्थित है। वर्ष १९४० तक इस मन्दिर के विषय में कम ही लोगों को ज्ञात था, वर्तमान में गिरिजा माता की कृपा से अनुकम्पित भक्तों की संख्या लाखों में पहुंच गई है। इस मन्दिर का व्यवस्थित तरीके से निर्माण १९७० में किया गया। जिसमें मन्दिर के वर्तमान पुजारी पं० पूर्णचंद्र पाण्डे का महत्वपूर्ण प्रयास रहा है। इस मंदिर के विषय में महत्वपूर्ण जानकारी प्राप्त करने के लिये इसकी ऐतिहासिक और धार्मिक पृष्ठभूमि को भी जानना आवश्यक है।
File:Garjiya.JPG

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

GARJIA MATA at RAMNAGAR
Girja Mata Idol at Ramnagar
पुरातत्ववेत्ताओं का कथन है कि कूर्मांचल की सबसे प्राचीन बस्ती ढिकुली के पास थी, जहां पर वर्तमान रामनगर बसा हुआ है। कोसी के किनारे बसी इसी नगरी का नाम तब वैराट पत्तन या वैराटनगर था। कत्यूरी राजाओं के आने के पूर्व यहां पहले कुरु राजवंश के राजा राज्य करते थे, जो प्राचीन इन्द्रप्रस्थ (आधुनिक दिल्ली) के साम्राज्य की छत्रछाया में रहते थे। ढिकुली, गर्जिया क्षेत्र का लगभग ३००० वर्षों का अपना इतिहास रहा है, प्रख्यात कत्यूरी राजवंश, चंद राजवंश, गोरखा वंश और अंग्रेजी शासकों ने यहां की पवित्र भूमि का सुख भोगा है। गर्जिया नामक शक्तिस्थल सन १९४० से पहले उपेक्षित अवस्था में था, किन्तु सन १९४० से पहले की भी अनेक दन्तश्रुतियां इस स्थान का इतिहास बताती हैं। वर्ष १९४० से पूर्व इस मन्दिर की स्थिति आज की जैसी नहीं थी, कालान्तर में इस देवी को उपटा देवी (उपरद्यौं) के नाम से जाना जाता था। तत्कालीन जनमानस कीदधारणा थी कि वर्तमान गर्जिया मंदिर जिस टीले में स्थित है, वह कोसी नदी की बाढ़ में कहीं ऊपरी क्षेत्र से बहकर आ रहा था। मंदिर को टीले के साथ बहते हुये आता देख भैरव देव द्वारा उसे रोकने के प्रयास से कहा गया- “थि रौ, बैणा थि रौ। (ठहरो, बहन ठहरो), यहां पर मेरे साथ निवास करो, तभी से गर्जिया में देवी उपटा में निवास कर रही है।

धार्मिक पृष्ठभूमि

BHAIRAV MANDIR AT GARJIA MATA
Bhairav Mandir in Garjia Ramnagar
लोक मान्यता है कि वर्ष १९४० से पूर्व यह क्षेत्र भयंकर जंगलों से भरा पड़ा था, सर्वप्रथम जंगलात विभाग के तत्कालीन कर्मचारियों तथा स्थानीय छुट-पुट निवासियों द्वारा टीले पर मूर्तियों को देखा और उन्हें माता जगजननी की इस स्थान पर उपस्थिति का एहसास हुआ। एकान्त सुनसान जंगली क्षेत्र, टीले के नीचे बहते कोसी की प्रबल धारा, घास-फूस की सहायता से ऊपर टीले तक चढ़ना, जंगली जानवरों की भयंकर गर्जना के बावजूद भी भक्तजन इस स्थान पर मां के दर्शनों के लिये आने लगे। जंगलात के तत्कालीन बड़े अधिकारी भी यहां पर आये, कहा जाता है कि टीले के पास मां दुर्गा का वाहन शेर भयंकर गर्जना किया करता था। कई बार शेर को इस टीले की परिक्रमा करते हुये भी लोगों द्वारा देखा गया।



गिरिजा माता महात्म्य

gate for garjiya
Gate of Garjia Mata At Ramnagar
भगवान शिव की अर्धांगिनि मां पार्वती का एक नाम गिरिजा भी है, गिरिराज हिमालय की पुत्री होने के कारण उन्हें इस नाम से भी बुलाया जाता है। इस मन्दिर में मां गिरिजा देवी के सतोगुणी रुप में विद्यमान है। जो सच्ची श्रद्धा से ही प्रसन्न हो जाती हैं, यहां पर जटा नारियल, लाल वस्त्र, सिन्दूर, धूप, दीप आदि चढ़ा कर वन्दना की जाती है। मनोकामना पूर्ण होने पर श्रद्धालु घण्टी या छत्र चढ़ाते हैं।  नव विवाहित स्त्रियां यहां पर आकर अटल सुहाग की कामना करती हैं। निःसंतान दंपत्ति संतान प्राप्ति के लिये माता में चरणों में झोली फैलाते हैं।
वर्तमान में इस मंदिर में गर्जिया माता की ४.५ फिट ऊंची मूर्ति स्थापित है, इसके साथ ही सरस्वती, गणेश जी तथा बटुक भैरव की संगमरमर की मूर्तियां मुख्य मूर्ति के साथ स्थापित हैं।
इसी परिसर में एक लक्ष्मी नारायण मंदिर भी स्थापित है, इस मंदिर में स्थापित मूर्ति यहीं पर हुई खुदाई के दौरान मिली थी।
कार्तिक पूर्णिमा को गंगा स्नान के पावन पर्व पर माता गिरिजा देवी के दर्शनों एवं पतित पावनी कौशिकी (कोसी) नदी में स्नानार्थ भक्तों की भारी संख्या में भीड़ उमड़ती है। इसके अतिरिक्त गंगा दशहरा, नव दुर्गा, शिवरात्रि, उत्तरायणी, बसंत पंचमी में भी काफी संख्या में दर्शनार्थी आते हैं।
पूजा के विधान के अन्तर्गत माता गिरिजा की पूजा करने के उपरान्त बाबा भैरव ( जो माता के मूल में संस्थित है) को चावल और मास (उड़द) की दाल चढ़ाकर पूजा-अर्चना करना आवश्यक माना जाता है, कहा जाता है कि भैरव की पूजा के बाद ही मां गिरिजा देवी की पूजा का सम्पूर्ण फ्ल प्राप्त होता है।

कैसे पहुंचे

रामनगर तक रेल और बस सेवा उपलब्ध है, उससे आगे के लिये टैक्सी आराम से मिल जाती है। रामनगर में रहने और खाने के लिये कई स्तरीय होटल उपलब्ध है। आप यहां से जिम कार्बेट पार्क भी जा सकते हैं।
 इस लेख में श्रीमती हेमा उनियाल द्वारा लिखित पुस्तक कुमाऊं के प्रसिद्ध मन्दिर द्वारा भी सहायता ली गई है।


Monday, July 9, 2012

मृत्युंजय मंदिर: यहीं हुआ था बारह ज्योतिर्लिंगों का उद्गम


जागेश्वर मंदिर (चित्र साभार : Filmapia.com)


देवभूमि हिमालय की पावन कोख में भगवान शिव का प्रथम ज्योतिर्लिंग जागेश्वर में स्थित है. जागेश्वर का प्राचीन मृत्युंजय मंदिर धरती पर स्थित बारह ज्योतिर्लिंगों का उद्‌गम स्थल है. इसके पौराणिक, ऐतिहासिक एवं पुरातात्विक प्रमाण प्रचुर मात्रा में मिलते हैं. यहां का प्राकृतिक वैभव हर पर्यटक-तीर्थयात्री को मंत्रमुग्ध कर लेता है. देवाधिदेव महादेव यहां आज भी वृक्ष के रूप में मां पार्वती सहित विराजते हैं. इस मान्यता के चलते हज़ारों श्रद्धालु यहां हर वर्ष खिंचे चले आते हैं. भगवान शिव-पार्वती के युगल रूप के दर्शन यहां आने वाले श्रद्धालु मंदिर परिसर में स्थित नीचे से एक और ऊपर से दो शाखाओं वाले विशाल देवदारू के वृक्ष में करते हैं, जो 62.80 मीटर लंबा और 8.10 मीटर व्यास का है, जिसे अति प्राचीन बताया जाता है.

भगवान शिव ही एकमात्र देवता हैं, जिन्होंने सदैव मृत्यु पर विजय पाई. मृत्यु ने कभी भी शिव को पराजित नहीं किया. इसी कारण उन्हें मृत्युंजय के नाम से पुकारा गया. जागेश्वर धाम के मंदिर समूह में सबसे विशाल एवं सुंदर मंदिर महामृत्युंजय महादेव जी के नाम से विख्यात है, जिसमें पूजन आदि का कार्य उच्चकुल भट्ट ब्राह्मण सृष्टि दत्त का परिवार करता है.

भारत की सनातन संस्कृति में त्रय देवों में भगवान शिव को महादेव के नाम से पुकारा जाता है. श्वेताश्वर उपनिषद में शिव को उनके विशिष्ट गुणों के कारण महादेव कहा गया है. हमारे वेदों में केवल प्रकृति तत्व जो जीवन के मूल तत्व हैं, जैसे अग्नि, जल और वायु में ही देवत्व की प्रतिष्ठा की गई है, वहां भी शिव को रुद्र नाम से प्रतिस्थापित किया गया है. वैदिक काल से पूर्व भी शिव का अस्तित्व रुद्र रूप से था. शिव कालातीत देवता हैं. वह सदैव लोक मंगल के लिए गतिशील देवता के रूप में जाने जाते हैं. वह किसी विशेष समय किसी विशेष प्रयोजन के लिए अवतार नहीं धारण करते. वह अनादि-अनंत हैं. इसी कारण उनके सगुण और निर्गुण दोनों पक्ष विद्यमान हैं. हिमालय पर्वत श्रंखला में कुमाऊं क्षेत्र अपने नैसर्गिक सौंदर्य के कारण विश्व में प्रसिद्ध है. इस क्षेत्र के अल्मोड़ा नगर से पूर्वोत्तर दिशा में पिथौरागढ़ मार्ग पर 36 किमी की दूरी पर देवताओं का महानगर जागेश्वर स्थित है. इस स्थान की समुद्र तल से ऊंचाई 1870 मीटर है. देवदारू के घने वृक्षों से घिरी यह घाटी एक मनोहारी तीर्थस्थल है. जागेश्वर में 124 मंदिरों का एक समूह है, जो अति प्राचीन है. इसके चार-पांच मंदिरों में आज भी नित्य पूजा-अर्चना होती है. यहां स्थित शिवलिंग भगवान शिव के प्रथम ज्योतिर्लिंग के रूप में विख्यात है. बारह ज्योतिर्लिंग इस प्रकार हैं: प्रथम श्री सोमनाथ, जो सौराष्ट्र के कइयावाड़ में स्थित है. दूसरा श्री शैल पर्वत, जो तमिलनाडु के कृष्णा ज़िले में कृष्णा नदी के तट पर श्री मल्लिकार्जुन के नाम से कैलाश पर्वत पर स्थित है. तीसरा मध्य प्रदेश के उज्जयिनी में श्री महाकाल के नाम से विख्यात है. चौथा ओंकारेश्वर अथवा ममलेश्वर के नाम से जाना जाता है. पांचवा हैदराबाद के परली में वैद्यनाथ के नाम से विख्यात है. छठवां पुणे से उत्तर भीमा नदी के तट पर डाकिनी नामक स्थान पर श्री भीम शंकर के नाम से स्थित है. इसी प्रकार तमिलनाडु के रामनद ज़िले में सेतुबंध श्री रामेश्वरम्‌ के नाम से सातवां ज्योतिर्लिंग है. आठवां दारुकावन अल्मोड़ा से 35 किमी की दूरी पर योगेश्वर अथवा जागेश्वर के नाम से स्थित है. नौंवे ज्योतिर्लिंग के रूप में उत्तर प्रदेश के वाराणसी में बाबा विश्वनाथ की पूजा की जाती है. गोदावरी के तट पर नासिक-पंचवटी के निकट स्थित श्री त्रयंबकेश्वर को दसवां ज्योतिर्लिंग माना जाता है. वहीं देवभूमि हिमालय के केदारखंड में स्थित श्री केदारनाथ ग्यारहवें ज्योतिर्लिंग के रूप में विख्यात हैं. जागेश्वर में इन मंदिर समूहों का निर्माण किसने कराया, इस सवाल का जवाब खोजने पर भी नहीं मिलता, किंतु इन मंदिरों का जीर्णोद्धार राजा शालिवाहन ने अपने शासनकाल में कराया था. पौराणिक काल में भारत में कौशल, मिथिला, पांचाल, मस्त्य, मगध, अंग एवं बंग नामक अनेक राज्यों का उल्लेख मिलता है. कुमाऊं कौशल राज्य का एक भाग था. माधवसेन नामक सेनवंशी राजा देवों के शासनकाल में जागेश्वर आया था. चंद्र राजाओं की जागेश्वर के प्रति अटल श्रद्धा थी. देवचंद्र से लेकर बाजबहादुर चंद्र तक ने जागेश्वर की पूजा-अर्चना की. बौद्ध काल में भगवान बद्री नारायण की मूर्ति गोरी कुंड और जागेश्वर की देव मूर्तियां ब्रह्मकुंड में कुछ दिनों पड़ी रहीं. जगतगुरु आदि शंकराचार्य ने इन मूर्तियों की पुनर्स्थापना की. स्थानीय विश्वास के आधार पर इस मंदिर के शिवलिंग को नागेश लिंग घोषित किया गया.

कहते हैं, दक्ष प्रजापति के यज्ञ का विध्वंस करने के बाद सती के आत्मदाह से दु:खी भगवान शिव ने यज्ञ की भस्म लपेट कर दायक वन के घने जंगलों में दीर्घकाल तक तप किया. इन्हीं जंगलों में वशिष्ठ आदि सप्त ॠषि अपनी पत्नियों सहित कुटिया बनाकर तप करते थे. शिव जी कभी दिगंबर अवस्था में नाचने लगते थे. एक दिन इन ॠषियों की पत्नियां जंगल में कंदमूल, फल एवं लकड़ी आदि के लिए गईं तो उनकी दृष्टि दिगंबर शिव पर पड़ गई. सुगठित स्वस्थ पुरुष शिव को देखकर वे अपनी सुध-बुध खोने लगीं. अरुंधती ने सब को सचेत किया, किंतु इस अवस्था में किसी को अपने ऊपर काबू नहीं रहा. शिव भी अपनी धुन में रमे थे, उन्होंने भी इस पर ध्यान नहीं दिया. ॠषि पत्नियां कामांध होकर मूर्छित हो गईं. वे रात भर अपनी कुटियों में वापस नहीं आईं तो प्रात: ॠषिगण उन्हें ढूंढने निकले. जब उन्होंने यह देखा कि शिव समाधि में लीन हैं और उनकी पत्नियां अस्त-व्यस्त मूर्छित पड़ी हैं तो उन्होंने व्याभिचार किए जाने की आशंका से शिव को शाप दे डाला और कहा कि तुमने हमारी पत्नियों के साथ व्याभिचार किया है, अत: तुम्हारा लिंग तुरंत तुम्हारे शरीर से अलग होकर गिर जाए. शिव ने नेत्र खोला और कहा कि आप लोगों ने मुझे संदेहजनक परिस्थितियों में देखकर अज्ञान के कारण ऐसा किया है, इसलिए मैं इस शाप का विरोध नहीं करूंगा. मेरा लिंग स्वत: गिरकर इस स्थान पर स्थापित हो जाएगा. तुम सप्त ॠषि भी आकाश में तारों के साथ अनंत काल तक लटके रहोगे. लिंग के शिव से अलग होते ही संसार में त्राहि-त्राहि मच गई. ब्रह्मा जी ने संसार को इस प्रकोप से बचाने के लिए ॠषियों को मां पार्वती की उपासना का सुझाव देते हुए कहा कि शिव के इस तेज को पार्वती ही धारण कर सकती हैं. ॠषियों ने पार्वती जी की उपासना की. पार्वती ने योनि रूप में प्रगट होकर शिवलिंग को धारण किया. इस शिवलिंग को योगेश्वर शिवलिंग के नाम से पुकारा गया.

भगवान शिव ही एकमात्र देवता हैं, जिन्होंने सदैव मृत्यु पर विजय पाई. मृत्यु ने कभी भी शिव को पराजित नहीं किया. इसी कारण उन्हें मृत्युंजय के नाम से पुकारा गया. जागेश्वर धाम के मंदिर समूह में सबसे विशाल एवं सुंदर मंदिर महामृत्युंजय महादेव जी के नाम से विख्यात है, जिसमें पूजन आदि का कार्य उच्चकुल भट्ट ब्राह्मण सृष्टि दत्त का परिवार करता है. परिसर में वृद्ध जागेश्वर महादेव, पुष्टि भगवती मां, ऐरावत गुफा एवं होम कुंड आदि दर्शनीय स्थल भी हैं.

साभार : फेसबुक, देवो के देव महादेव 

Wednesday, June 6, 2012

जागेश्वर धाम, अल्मोड़ा




उत्तराखंड के अल्मोड़ा से ३५ किलोमीटर दूर स्थित केंद्र जागेश्वर धाम के प्राचीन मंदिर प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर इस क्षेत्र को सदियों से आध्यात्मिक जीवंतताप्रदान कर रहे हैं। यहां लगभग २५० मंदिर हैं जिनमें से एक ही स्थान पर छोटे-बडे २२४ मंदिर स्थित हैं।

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उत्तर भारत में गुप्त साम्राज्य के दौरान हिमालय की पहाडियों के कुमाऊं क्षेत्र में कत्यूरीराजा थे। जागेश्वर मंदिरों का निर्माण भी उसी काल में हुआ। इसी कारण मंदिरों में गुप्त साम्राज्य की झलक भी दिखलाई पडती है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के अनुसार इन मंदिरों के निर्माण की अवधि को तीन कालों में बांटा गया है। कत्यरीकाल, उत्तर कत्यूरीकाल एवं चंद्र काल। बर्फानी आंचल पर बसे हुए कुमाऊं के इन साहसी राजाओं ने अपनी अनूठी कृतियों से देवदार के घने जंगल के मध्य बसे जागेश्वर में ही नहीं वरन् पूरे अल्मोडा जिले में चार सौ से अधिक मंदिरों का निर्माण किया जिसमें से जागेश्वर में ही लगभग २५० छोटे-बडे मंदिर हैं। मंदिरों का निर्माण लकडी तथा सीमेंट की जगह पत्थर की बडी-बडी shilaon से किया गया है। दरवाजों की चौखटें देवी देवताओं की प्रतिमाओं से अलंकृत हैं। मंदिरों के निर्माण में तांबे की चादरों और देवदार की लकडी का भी प्रयोग किया गया है।


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स्थिति

जागेश्वर धाम के मंदिर।
जागेश्वर को पुराणों में हाटकेश्वरऔर भू-राजस्व लेखा में पट्टी पारूणके नाम से जाना जाता है। पतित पावन जटागंगाके तट पर समुद्रतल से लगभग पांच हजार फुट की ऊंचाई पर स्थित पवित्र जागेश्वर की नैसर्गिक सुंदरता अतुलनीय है। कुदरत ने इस स्थल पर अपने अनमोल खजाने से खूबसूरती जी भर कर लुटाई है। लोक विश्वास और लिंग पुराण के अनुसार जागेश्वर संसार के पालनहारभगवान विष्णु द्वारा स्थापित बारह ज्योतिर्लिगोंमें से एक है।

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पौराणिक संदर्भ

पुराणों के अनुसार शिवजी तथा सप्तऋषियोंने यहां तपस्या की थी। कहा जाता है कि प्राचीन समय में जागेश्वर मंदिर में मांगी गई मन्नतें उसी रूप में स्वीकार हो जाती थीं जिसका भारी दुरुपयोग हो रहा था। आठवीं सदी में आदि शंकराचार्य जागेश्वर आए और उन्होंने महामृत्युंजयमें स्थापित शिवलिंगको कीलित करके इस दुरुपयोग को रोकने की व्यवस्था की। शंकराचार्य जी द्वारा कीलित किए जाने के बाद से अब यहां दूसरों के लिए बुरी कामना करने वालों की मनोकामनाएंपूरी नहीं होती केवल यज्ञ एवं अनुष्ठान से मंगलकारी मनोकामनाएंही पूरी हो सकती हैं।

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संदर्भ विकिपीडिया 

गोलू देवता मंदिर



Golu Devta ,Hawalbagh, near Almora
Idol of Golu Devta at Basulisera, Bagwali pokhar , Almora, Uttarakhand,
Golu Devta ,Ghorakhal, 
Golu Devta , Hawalbagh, 
Golu Devta , Udepur, 
Golu Devta , Chhana, Gagas, 
Golu Devta , Udepur, 
Golu Devta , Udepur, 
Golu Devta , Udepur, 
Golu Devta Temple, near Almora
Golu Devta Temple situated in village Kumour, Pithoragarh
Idol of Golu Devta at Basulisera. It is about 30 Kms from Ranikhet Near Bagwalipokhar , Almora, Uttarakhand, 
Golu Devata ' or Lord Golu (Hindiगॊलू दॆवता) is the legendary mythological and historical God of the Kumaun region of Uttarakhand state ofIndia and is their the much loved deity. The Golu Devta Chitai, temple is about 4 km from the main gate of Binsar wildlife sanctuary & about 10 kms. from Almora. 

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Origin

Golu Devata is thought to be as an incarnation of Gaur Bhairav (Shiva), and is worshipped all over the region and regarded as the dispenser of justice by the devotees with extreme faith.
Historically, he is considered as the brave son and General of Katyuri king, Jhal Rai and his mother was Kalindra, and his grandfather was Hal Rai and great-grandfather was Hal Rai. Historically the origin of Golu Devata is accepted atChampawat. His mother Kalindra is believed to be the sister of two other local deities Harishchand Devjyun (the divine spirit of Raja Harish of the Chands) and Sem Devjyun and both these deities are regarded as uncles of Lord Golu.
Another legend suggests that he was a General in the army of Chand kingBaz Bahadur's (1638–78), and died displaying exemplary valour at war, the temple was erected in his honour, at Chitai, 8 km from Almora city.
Another legend says that Golu Devta was killed by the king ofBinsar due to some false doubt, and he was beheaded by the king and his boy felled at Gairad at Dana Golu and his head felled at Kaparkhan, near modern day Binsar, a few km from Almora.At Dana Golu, there is the original and most ancient temple of Golu Devta is situated.
The most popular story about Gwalla talks of a local king who, while hunting, sent his servants to look for water. The servants disturbed a woman who was praying. The woman, in a fit of anger, taunted the king that he could not separate two fighting bulls and proceeded to do so herself. The king was very impressed by this deed and he married the lady. When this queen got a son, the other queens, who were jealous of her, placed a stone in its place and the child in a cage and put the cage into the river. The child was brought up by a fisherman. When the boy grew up he took a wooden horse to the river and on being questioned by the queens he replied that if women can give birth to stone then wooden horses can drink water. When the king heard about this, he punished the guilty queens and crowned the boy, who went on to be known as Gwalla devata.
Golu Devta is seen in form of Lord Shiva, his brother Kalva Devta is in form on Bhairava and Garh Devi is form of Shakti. Golu Devta is also prayed as key deity(Ista/ Kula Devta) in many villages of Chamoli. Normally three days pooja or 9 days pooja is performed to worship Lord Golu Devta also known as Goreel Devta in Chamoli District. Golu Devta is offered Ghee, Milk, Curd, Halwa, Poori, Pakauri and head of Goat sacrificed. Two Male Goat scarifice ( Bali) is performed. Preferred black in colour. One in the temple of Golu devta and the other outside temple in remote location. The sacrificed goat is received as Prasada of pooja. Golu devta is known as God of justice and prayed with great pride and enthusiasm. Golu Devta is offered with White Cloths, white pagari and white shaal.
There are many temples of Golu Devata in Kumaun, and the most popular are at ChitaiChampawatGhorakhal. It is the popular belief that Golu Devata dispense quick justice to the devotee.
Devotees in turn offers bells and Sacrifice the animals after the fulfillment of their wishes. Thousands of bells of every size can be easily seen hanging over the temple premises. Many devotees file a lot of written petitions daily, which are received by the temple.

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साभार विकिपीडिया