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Sunday, July 31, 2016

MANIMAHESH YATRA - मणि महेश यात्रा

वृहत संहिता में तीर्थ का बड़े ही सुंदर शब्‍दों में वर्णन किया गया है। इसके अनुसार, ईश्‍वर वहीं क्रीड़ा करते हैं जहां झीलों की गोद में कमल खिलते हों और सूर्य की किरणें उसके पत्‍तों के बीच से झांकती हो, जहां हंस कमल के फूलों के बीच क्रीड़ा करते हों...जहां प्राकृ‍तिक सौंदर्य की अद्भुत छटा बिखरी पड़ी हो।' हिमालय पर्वत का दृश्‍य इससे भिन्‍न नहीं है। इसलिए इस पर्वत को ईश्‍वर का निवास स्‍थान भी कहा गया है। भगवदगीता में भगवान श्री कृष्‍ण ने कहा है, 'पर्वतों में मैं हिमालय हूं।' यही वजह है कि हिंदू धर्म में हिमालय पर्वत को विशेष स्‍थान प्राप्‍त है। हिंदुओं के पवीत्रतम नदी गंगा का उद्भव भी इसी हिमालय पर्वत से होता है।

मणिमहेश यात्रा


जुलाई-अगस्‍त के दौरान पवित्र मणिमहेश झील हजारों तीर्थयात्रियों से भर जाता है। यहीं पर सात दिनों तक चलने वाले मेला का आयोजन भी किया जाता है। यह मेला जन्‍माष्‍टमी के दिन समाप्‍त होता है। जिस तिथि को यह उत्‍सव समाप्‍त होता है उसी दिन भरमौर के प्रधान पूजारी मणिमहेश डल के लिए यात्रा प्रारंभ करते हैं। यात्रा के दौरान कैलाश चोटि (18,556) झील के निर्मल जल से सराबोर हो जाता है। कैलाश चोटि के ठीक नीचे से मणीमहेश गंगा का उदभव होता है। इस नदी का कुछ अंश झील से होकर एक बहुत ही खूबसूरत झरने के रूप में बाहर निकलती है। पवित्र झील की परिक्रमा (तीन बार) करने से पहले झील में स्‍नान करके संगमरमर से निर्मित भगवान शिव की चौमुख वाले मूर्ति की पूजा अर्चना की जाती है। कैलाश पर्वत की चोटि पर चट्टान के आकार में बने शिवलिंग का इस यात्रा में पूजा की जाती है। अगर मौसम उपयुक्‍त रहता है तो तीर्थयात्री भगवान शिव के इस मूर्ति का दर्शन लाभ लेते हैं।

हमारे जाट देवता संदीप जी मणिमहेश झील के किनारे - साभार चित्र जाट देवता के ब्लॉग से 

स्‍थानीय लोगों के अनुसार कैलाश उनकी अनेक आपदाओं से रक्षा करता है, यही वजह है कि स्‍थानीय लोगों में महान कैलाश के लिए काफी श्रद्धा और विश्‍वास है। यात्रा शुरू होने से पहले गद्दी वाले अपने भेड़ों के साथ पहाड़ों पर चढ़ते हैं और रास्‍ते से अवरोधकों को यात्रियों के लिए हटाते हैं। ताकि यात्रा सुगम और कम कष्‍टप्रद हो। कैलाश चोटि के नीचे एक बहुत बड़ा हिमाच्‍छादित मैदान है जिसको भगवान शिव के क्रीड़ास्‍थल 'शिव का चौगान' के नाम से जाना जाता है। कहा जाता है कि यहीं पर भगवान शिव और देवी पार्वती क्रीड़ा करते हैं। वहीं झील के कुछ पहले जल का दो स्रोत है। इसको शिव क्रोत्रि और गौरि कुंड के नाम से जाना जाता है।
चौरसिया मंदिर, भरमौर



साभार : BHARMOUR.IN 

चौरसिया मंदिर का नाम इसके परिसर में स्थित 84 छोटे-छोटे मंदिरों के आधार पर रखा गया है। यह मंदिर भरमौर या ब्रह्मपुरा नामक स्‍थान में स्थित है। पौराणिक कथाओं के अनुसार 84 योगियों ने ब्रह्मपुरा के राजा साहिल बर्मन के समय में इस जगह भ्रमण करते‍ हुए आए थे। राजा बर्मन के आवभगत से अभिभूत होकर योगियों ने उनको 10 पुत्र रत्‍न प्राप्ति का आशीर्वाद दिया। फलत: राजा बर्मन ने इन 84 योगियों की याद में 84 मंदिरों का निर्माण करा दिया। तभी से इसको चौरसिया मंदिर के नाम से जानते हैं। एक दूसरी धारणा के अनुसार एक बार भगवान शिव 84 योगियों के साथ जब मणिमहेश की यात्रा पर जा रहे थे तो कुछ देर के लिए ब्राह्मणी देवी की वाटिका में रुके। इससे देवी नाराज हो‍ गईं लेकिन भगवान शिव के अनुरोध पर उन्‍होंने योगियों के लिंग रूप में ठहरने की बात मान ली। कहा जाता है इसके बाद यहां पर इन योगियों की याद में चौरसिया मंदिर का निर्माण कराया गया। जबकि एक और मान्‍यता के अनुसार जब 84 योगियों ने देवी के प्रति सम्‍मान प्रकट नहीं किया तो उनको पत्‍थर में तब्‍दील कर दिया गया।

मणिमहेश्‍वर यात्रा मार्ग


मणिमहेश्‍वर 3950 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। इसकी चढ़ाई ज्‍यादा कठिन नहीं तो आसान भी नहीं है। इस मंदिर के दर्शन हेतु मई से अक्‍टूबर का महीना सबसे ज्‍यादा उपयुक्‍त है। लेकिन पहाड़ी चढ़ाई होने के कारण एक दिन में 4 से 5 घंटे तक की चढ़ाई ही संभव हो पाती है। मणिमहेश की यात्रा कम से कम सात दिनों की है। मोटे तौर पर मणिमहेश के लिए मार्ग है


- नई दिल्‍ली - धर्मशाला - हर्दसार - दांचो - मणिमहेश झील - दंचो - धर्मशाला - नई दिल्‍ली.

पहला दिन

नई दिल्‍ली पहुंचकर धर्मशाला के लिए प्रस्‍थान।

दूसरा दिन

(धर्मशाला-हर्दसार-दांचो, 2280 मीटर की ऊंचाई पर स्थित) हर्दसार से दांचो जिसकी दूरी 7 कि॰मी॰ है, लेकिन जाने में 3 घंटे लग जाते हैं। रात भर कैंप में गुजारनी होती है।तीसरा दिन

(दांचो - मणीमहेश झील, 3950 मी. की ऊंचाई पर स्थित) दांचो से मणीमहेश तक की चढ़ाई न केवल लंबी है वरन इस यात्रा का सबसे कठिनतम चरण भी है। इस मार्ग पर लगातार चढ़ाई करनी होती है। रात कैंप में बिताना होता है।चौथा दिन

(मणिमहेश झील-दांचो) वापस आने की प्रक्रिया की शुरूआत। इसके तहत पहला दिन दांचो में गुजारना होता है।पांचवां दिन

(दांचो-धर्मशाला)छठा दिन

(धर्मशाला) यहां पहुंचने के उपरांत तीर्थयात्री अगर चाहें तो विभिन्‍न बौद्धमठों को देखने का लुत्‍फ उठा सकते हैं। इसके बाद शाम में पठानकोट पहुंचा जा सकता है। यहां से ट्रेन या सड़क मार्ग से दिल्‍ली के लिए प्रस्‍थान किया जा सकता है।सातवां दिन

(आरक्षित दिन)

चांबा बेस से जाने पर चढ़ाई कुछ आसान हो जाती है। तीर्थयात्री चाहें तो इस मार्ग का भी इस्‍तेमाल कर सकते हैं।

KHAJJIAR - भारत का मिनी स्विट्रजरलैंड खजियार



हिमाचल प्रदेश के चंबा जिले में स्थित खजियार को भारत का मिनी स्विट्जरलैंड कहा जाता है। खजियार के अलावा, यहां के आस-पास का प्राकृतिक सौंदर्य पर्यटकों को खूब आकर्षित करता है...हिमाचल प्रदेश के चंबा जिले में बेहद खूबसूरत स्थल है खजियार। समुद्र तल से करीब २००० मीटर की ऊंचाई पर स्थित यह स्थल पश्चिम हिमाचल की धौलाधार पर्वत शृंखला के बीच में बसा है। खजियार का नाम यहां स्थित च्खजी नागज् के मंदिर के कारण पड़ा माना जाता है।


इस स्थल की भौगोलिक संरचना के कारण इसे भारत का मिनी स्विट्जरलैंडज् भी कहा जाता है। यहां एक ही स्थान पर झील, चरागाह और वन इन तीनों पारिस्थितिक तंत्र का होना एक दुर्लभ संयोग की तरह है, जो इसकी सुंदरता में और भी निखार लाता है। खजियार और इसके आस-पास अन्य कई सुंदर जगहें भी हैं, जिन्हें घूमे बगैर आपकी यात्रा अधूरी-सी मानी जाएगी। ...तो आइए चलते हैं इन सभी को बारी-बारी से निहारने।

खजियार झील


यह खजियार का मुख्य आकर्षण है। चारों ओर से घने देवदार के जंगल और हरे मैदान के बीचों-बीच स्थित इस

झील और झील के बीच में स्थित छोटेछोटे भूखंड इसकी खूबसूरती में चार चांद लगाते हैं।

खाजीनाग मंदिर

१२वीं शताब्दी में बना खाजीनाग का मंदिर लोगों की धार्मिक आस्था और श्रृद्धा का प्रतीक है। नाग को समर्पित

इस मंदिर में नाग की मूर्तियों के अलावा, मंडप में पांडवों द्वारा कौरवों पर हुई जीत की छवियों को छत की लकड़ी पर देखा जा सकता है, जो इसकी ऐतिहासिकता को और समृद्ध करती है।

खजियार तक सड़क मार्ग होने के कारण आप किसी भी वाहन द्वारा यहां पहुंच सकते हैं। दिल्ली से खजियार की दूरी लगभग ५६५ किमी. और चंडीगढ़ से २१५ किमी. है। नजदीक का रेलवे स्टेशन पठानकोट (८० किमी.) और नजदीक के हवाई अड्डे पठानकोट (८० किमी.), गग्गल (१८० किमी.) और कांगड़ा हैं।

कब जाएं

अप्रैल से अक्टूबर खजियार घूमने का सही मौसम है। उसके बाद के महीनों में यहां बर्फबारी होने लगती है।


Tuesday, November 3, 2015

CHAMBA - चंबा (हिमाचल)

चंबा भारत के हिमाचल प्रदेश प्रान्त का एक नगर है। हिमाचल प्रदेश का चंबा अपने रमणीय मंदिरों और हैंडीक्राफ्ट के लिए सर्वविख्यात है। रवि नदी के किनारे 996 मीटर की ऊंचाई पर स्थित चंबा पहाड़ी राजाओं की प्राचीन राजधानी थी। चंबा को राजा साहिल वर्मन ने 920 ई. में स्थापित किया था। इस नगर का नाम उन्होंने अपनी प्रिय पुत्री चंपावती के नाम पर रखा। चारों ओर से ऊंची पहाड़ियों से घिरे चंबा ने प्राचीन संस्कृति और विरासत को संजो कर रखा है। प्राचीन काल की अनेक निशानियां चंबा में देखी जा सकती हैं।

चंपावती मंदिर


यह मंदिर राजा साहिल वर्मन की पुत्री को समर्पित है। यह मंदिर शहर की पुलिस चौकी और कोषागार भवन के पीछे स्थित है। कहा जाता है कि चंपावती ने अपने पिता को चंबा नगर स्थापित करने के लिए प्रेरित किया था। मंदिर को शिखर शैली में बनाया गया है। मंदिर में पत्थरों पर खूबसूरत नक्काशी की गई है और छत को पहिएनुमा बनाया गया है।

लक्ष्मीनारायण मंदिर


यह मंदिर पांरपरिक वास्तुकारी और मूर्तिकला का उत्कृष्‍ट उदाहरण है। चंबा के 6 प्रमुख मंदिरों में यह मंदिर सबसे विशाल और प्राचीन है। कहा जाता है कि सवसे पहले यह मन्दिर चम्बा के चौगान में स्थित था परन्तु बाद में इस मन्दिर को राजमहल (जो वर्तमान में चम्बा जिले का राजकीय महाविद्यालय है) के साथ स्थापित कर दिया गया। भगवान विष्णु को समर्पित यह मंदिर राजा साहिल वर्मन ने 10 वीं शताब्दी में बनवाया था। यह मंदिर शिखर शैली में निर्मित है। मंदिर में एक विमान और गर्भगृह है। मंदिर का ढांचा मंडप के समान है। मंदिर की छतरियां और पत्थर की छत इसे बर्फबारी से बचाती है।

भूरी सिंह संग्रहालय


यह संग्रहालय 14 सितंबर 1908 ई. को खुला था। 1904-1919 तक यहां शासन करने वाले राजा भूरी सिंह के नाम पर इस संग्रहालय का नाम पड़ा। भूरी सिंह ने अपनी परिवार की पेंटिग्स का संग्रह संग्रहालय को दान कर दिया था। चंबा की सांस्कृतिक विरासत को संजोए इस संग्रहालय में बसहोली और कांगड़ा आर्ट स्कूल की लघु पेंटिग भी रखी गई हैं।

भंडाल घाटी


यह घाटी वन्य जीव प्रेमियों को काफी लुभाती है। यह खूबसूरत घाटी 6006 फीट की ऊंचाई पर स्थित है। यह घाटी चंबा से 22 किमी .दूर सलूनी से जुड़ी हुई है। यहां से ट्रैकिंग करते हुए जम्मू कश्मीर पहुंचा जा सकता है।

भरमौर


चंबा की इस प्राचीन राजधानी को पहले ब्रह्मपुरा नाम से जाना जाता था। 2195 मीटर की ऊंचाई पर स्थित भरमौर घने जंगलों से घिरा है। किवदंतियों के अनुसार 10 वीं शताब्दी में यहां 84 संत आए थे। उन्होंने यहां के राजा को 10 पुत्र और एक पुत्री चंपावती का आशीर्वाद दिया था। यहां बने मंदिर को चौरासी नाम से जाना जाता है। लक्ष्मी देवी, गणेश और नरसिंह मंदिर चौरासी मंदिर के अन्तर्गत ही आतें हैं। भरमौर से कुगती पास और कलीचो पास की ओर जाने के लिए उत्तम ट्रैकिंग रूट है।

चौगान


यह खुला घास का मैदान है। लगभग 1 किमी. लंबा और 75 मीटर चौड़ा यह मैदान चंबा के बीचों बीच स्थित है। चौगान में प्रतिवर्ष मिंजर मेले का आयोजन किया जाता है। एक सप्ताह तक चलने वाले इस मेले में स्थानीय निवासी रंग बिरंगी वेशभूषा में आते हैं। इस अवसर पर यहां बड़ी संख्या में सांस्कृतिक और खेलकूद की गतिविधियां आयोजित की जाती हैं।

वजरेश्वरी मंदिर

यह प्राचीन मंदिर एक हजार साल पुराना माना जाता है। प्रकाश की देवी वजरेश्वरी को समर्पित यह मंदिर नगर के उत्तरी हिस्से में स्थित जनसाली बाजार के अंत में स्थित है। शिखर शैली में निर्मित इस मंदिर का छत लकड़ी से बना है और एक चबूतरे पर स्थित है। मंदिर के शिखर पर बेहतरीन नक्काशी की गई है।

सुई माता मंदिर


चंबा के निवासियों के लिए अपना जीवन त्यागने वाली यहां की राजकुमारी सुई को यह मंदिर समर्पित है। यह मंदिर शाह मदार हिल की चोटी पर स्थित है। यहाँ सुई माता नें कुछ समय के लिए विश्राम किया था। यहाँ सुई माता की याद में यहां हर साल सुई माता का मेला चैत महीने से शुरु होकर बैसाख महीने तक चलता है। यह मेला महिलाओं और बच्चों द्वारा मनाया जाता है। मेले में रानी के गीत गाए जाते हैं और रानी के बलिदान को श्रद्धांजलि‍ देने के लिए लोग सुई मन्दिर से रानी के वलिदान स्थल मलूना तक जाते हैं।

चामुन्डा देवी मंदिर


यह मंदिर पहाड़ की चोटी पर स्थित है जहां से चंबा की स्लेट निर्मित छतों और रावी नदी व उसके आसपास का सुन्दर नजारा देखा जा सकता है। मंदिर एक ऊंचे चबूतरे पर बना हुआ है और देवी दुर्गा को समर्पित है। मंदिर के दरवाजों के ऊपर, स्तम्भों और छत पर खूबसूरत नक्काशी की गई है। मंदिर के पीछे शिव का एक छोटा मंदिर है। मंदिर चंबा से तीन किलोमीटर दूर चंबा-जम्मुहार रोड़ के दायीं ओर है। भारतीय पुरातत्व विभाग मंदिर की देखभाल करता है।

हरीराय मंदिर

भगवान विष्णु का यह मंदिर 11 शताब्दी में बना था। कहा जाता है कि यह मंदिर सालबाहन ने बनवाया था। मंदिर चौगान के उत्तर पश्चिम किनारे पर स्थित है। मंदिर के शिखर पर बेहतरीन नक्काशी की गई है।हरीराय मंदिर में चतुमूर्ति आकार में भगवान विष्णु की कांसे की बनी अदभुत मूर्ति स्थापित है। केसरिया रंग का यह मंदिर चंबा के प्राचीनतम मंदिरों में एक है।

लखाना मंदिर भरमौर 


यह हिमाचल प्रदेश का शिखर शैली में बना बहुत पुराना मंदिर है। देवी लक्ष्मी को यहां महिसासुरमर्दिनी रूप में दिखाया गया है। मंदिर में स्थापित देवी की पीतल की प्रतिमा राजा मेरू वर्मन के उस्ताद कारीगर मुग्गा ने बनाई थी। यह मंदिर हिमाचल प्रदेश का प्रमुख और पवित्र तीर्थ स्थल है। यहां हर साल मणिमहेश यात्रा का आयोजन होता है।

रंगमहल


चंबा के शाही परिवारों का यह निवास स्थल राजा उमेद सिंह ने 1748 से 1764 के बीच बनवाया था। महल का पुनरोद्धार राजा शाम सिंह के कार्यकाल में ब्रिटिश इंजीनियरों की मदद से किया गया। 1879 में कैप्टन मार्शल ने महल में दरबार हॉल बनवाया। बाद में राजा भूरी सिंह के कार्यकाल में इसमें जनाना महल जोड़ा गया। महल की बनावट में ब्रिटिश और मुगलों का स्पष्ट प्रभाव देखा जा सकता है। 1958 में शाही परिवारों के उत्तराधिकारियों ने हिमाचल सरकार को यह महल बेच दिया। बाद में यह महल सरकारी कॉलेज और जिला पुस्तकालय के लिए शिक्षा विभाग को सौंप दिया गया।

चंबा जाने के लिए नजदीकी एयरपोर्ट पंजाब के अमृतसर में है जो चंबा से 240 किमी. दूर है। अमृतसर से चंबा जाने के लिए बस या टैक्सी की सेवाएं ली जा सकती हैं। 

चंबा से 140 किमी. दूर पठानकोट नजदीकी रेलवे स्टेशन है। पठानकोट दिल्ली और मुम्बई से नियमित ट्रैनों के माध्यम से जुड़ा हुआ है। यहां से बस या टैक्सी के द्वारा चंबा पहुंचा जा सकता है। 

चंबा सड़क मार्ग से हिमाचल के प्रमुख शहरों व दिल्ली और चंडीगढ़ से जुड़ा हुआ है। राज्य परिवहन निगम की बसें चंबा के लिए नियमित रूप से चलती हैं।

जाब पर्वतीय प्रदेश चंबा का अरबी नाम है। इसके जाफ, हाब, आब और गाब नाम भी हैं। इसकी प्राचीन राजधानी ब्रह्मपुर (वयराटपट्टन) थी। हुएनत्सांग ने इसका वर्णन करते हुए लिखा है कि यह अलखनंदा और करनाली नदियों के बीच बसा है। कुछ काल बाद इस प्रदेश की राजधानी चंबा हो गई। १५ अप्रैल १९४८ में इसका विलयन भारत सरकार द्वारा शासित हिमाचल प्रदेश में हो गया।

अरब लेखकों ने सामान्यत: चंबा के सूर्यवंशी राजपूत शासकों को 'जाब' की उपाधि के साथ लिखा है। हब्न रुस्ता का मत है कि यह शासन सालुकि वंश के थे परंतु राजवंश की उत्पत्ति के संबंध में विद्वानों में मतभेद है। ८४६ ई. में सर्वप्रथम हब्न खुर्रदद्बी ने 'जाब' का प्रयोग किया, पर ऐसा लगता है कि इस शब्द की उत्पत्ति अरब साहित्य में इससे पूर्व हो चुकी थी। इस प्रकार यह प्रामाणिक माना जाता है कि चंबा नगर ९ वीं शताब्दी के प्रथम दशक में विद्यमान था। इब्न रुस्ता ने लिखा है कि चंबा के शासक प्राय: गुर्जरों और प्रतिहारों से शत्रुता रखते थे।

साभार: विकिपीडिया 

Saturday, March 21, 2015

SIMSA MATA MANDIR - सिमसा माता मंदिर



हिमाचल के मंडी जिला की लड़भडोल तहसील के सिमस गांव में एक देवी का मंदिर ऐसा है जहां पर निसंतान महिलाओं के फर्श पर सोने से संतान की प्राप्ति होती है। नवरात्रों में हिमाचल के पड़ोसी राज्यों पंजाब, हरियाणा और चंडीगढ़ से ऐसी सैकड़ों महिलाएं इस मंदिर की ओर रूख करती हैं जिनकी संतान नहीं होती है। इस मंदिर कैसे निसंतान महिलाएं संतान होने का सुख पाती हैं, नवरात्रि के पावन अवसर पर इस चमत्कारी देवी के बारे में आपको बताने जा रहे हैं। 


मंदिर में सोने पर आते हैं सांकेतिक स्वप्न 

हिमाचल प्रदेश के मंडी जिले के लड़-भड़ोल तहसील के सिमस नामक खूबसूरत स्थान पर स्थित माता सिमसा मंदिर दूर दूर तक प्रसिद्ध है। माता सिमसा या देवी सिमसा को संतान-दात्री के नाम से भी जाना जाता है। हर वर्ष यहां निसंतान दंपति संतान पाने की इच्छा ले कर माता के दरबार में आते हैं। नवरात्रों में होने वाले इस विशेष उत्सव को स्थानीय भाषा में सलिन्दरा कहा जाता है। सलिन्दरा का अर्थ है स्वप्न आना होता है। नवरात्रों में निसंतान महिलायें मंदिर परिसर में डेरा डालती हैं और दिन रात मंदिर के फर्श पर सोती हैं ऐसा माना जाता है कि जो महिलाएं माता सिमसा के प्रति मन में श्रद्धा लेकर से मंदिर में आती हैं माता सिमसा उन्हें स्वप्न में मानव रूप में या प्रतीक रूप में दर्शन देकर संतान का आशीर्वाद प्रदान करती है। 


स्वप्न में लकड़ी या पत्थर दिखने पर नहीं होती है संतान 

मान्यता के अनुसार, यदि कोई महिला स्वप्न में कोई कंद-मूल या फल प्राप्त करती है तो उस महिला को संतान का आशीर्वाद मिल जाता है। देवी सिमसा आने वाली संतान के लिंग-निर्धारण का भी संकेत देती है। जैसे कि, यदि किसी महिला को अमरुद का फल मिलता है तो समझ लें कि लड़का होगा। अगर किसी को स्वप्न में भिन्डी प्राप्त होती है तो समझें कि संतान के रूप में लड़की प्राप्त होगी। यदि किसी को धातु, लकड़ी या पत्थर की बनी कोई वस्तु प्राप्त हो तो समझा जाता है कि उसके संतान नहीं होगी। 

मंदिर के पास पत्थर जो हिलता है एक उंगली से 


कहते हैं कि निसंतान बने रहने स्वप्न प्राप्त होने के बाद भी यदि कोई औरत अपना बिस्तर मंदिर परिसर से नहीं हटाती है तो उसके शरीर में खुजली भरे लाल-लाल दाग उभर आते हैं। उसे मजबूरन वहां से जाना पड़ता है। संतान प्राप्ति के बाद लोग अपना आभार प्रकट करने सगे-सम्बन्धियों और कुटुंब के साथ मंदिर में आते हैं। यह मंदिर बैजनाथ से 25 किलोमीटर तथा जोगिन्दर नगर से लगभग 50 किलोमीटर दूरी पर स्थित है। सिमसा माता मंदिर के पास यह पत्थर बहुत प्रसिद है । इस पत्थर को दोनों हाथों से हिलाना चाहो तो यह नही हिलेगा और आप अपने हाथ की सबसे छोटी ऊँगली से इस पत्थर को हिलाओगे तो यह हिल जायेगा। 

साभार: दैनिक भास्कर

Tuesday, February 17, 2015

अर्धनारीश्वर महादेवजी काठगढ़




हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले में काठगढ़ महादेव का मंदिर स्थित है। इस धार्मिक स्थल पर दो नदियों का संगम होता है।यह विश्व का एकमात्र मंदिर है जहां शिवलिंग ऐसे स्वरुप में विद्यमान हैं जो दो भागों में बंटे हुए हैं! अर्थात मां पार्वती और भगवान शिव के दो विभिन्न रूपों को ग्रहों और नक्षत्रों के परिवर्तित होने के अनुसार इनके भागों के मध्य का अंतर घटता-बढ़ता रहता है।ग्रीष्म ऋतु में यह स्वरूप दो भागों में बंट जाता है और शीत ऋतु में पुन: एक रूप धारण कर लेता है।



शिवलिंग का अर्थ है शिव यानी परमपुरुष का प्रकृति के साथ समन्वित-चिह्न। काठगढ़ महादेव शिवलिंग में भगवान शंकर के अद्र्धनारीश्वर श्री रुप के साक्षात दर्शन होते हैं। यह शिवलिंग अष्टकोणीय काले भूरे रंग रुप का लगभग 7 फुट और पार्वती माता के रुप शिवलिंग का हिस्सा थोड़ा छोटा होकर करीब 6 फुट का है और इनकी गोलाई लगभग 5 फुट है। भगवान शिव का यह स्वरूप जितना विचित्र है, उतना ही आकर्षक भी।

इस सृष्टि के आधार और रचयिता यानी स्त्री-पुरुष शिव और शक्ति के ही स्वरूप हैं। इनके मिलन और सृजन से यह संसार संचालित और संतुलित है। दोनों ही एक-दूसरे के पूरक हैं। नारी प्रकृति है और नर पुरुष। प्रकृति के बिना पुरुष बेकार है और पुरुष के बिना प्रकृति। दोनों का अन्योन्याश्रय संबंध है।अर्धनारीश्वर शिव इसी पारस्परिकता के प्रतीक है।


साभार : देवालय परिचय - Devalaya Parichay

Wednesday, June 18, 2014

Hatkoti Temple



चित्र साभार: (http://incrediblehimachal.net)

“Hatkoti Temple” The Historical Temple of Mata Hateshwari (Shakti of God Shiva) in Himachal Pradesh

“Hatkoti Temple” is located at Jubbal (Hatkoti), 100 K.M. from Shimla the capital of the Himachal Pradesh. Temple is located in village Hatkoti of tehsil Jubbal distt Shimla of Himachal Pradesh. .Hatkoti Mata is regarded as the most powerful goddess among all the goddesses of northern India by the residents of Hatkoti. As we know Himachal Pradesh is a state of god and goddesses. Hartkoti is one of them. Himachal Pradesh is known as a valley of temples. There is no written proof about the history of the temple but as we enter the premises of the temple the history diverts our minds towards itself, as there are a number of historic monuments in the temple which makes us remember about the Mabharata period. There are five stone “Deols” present in the temple premises which makes us remember about the five pandavas. These “Deols” are decreasing in size, first one being the largest in size and then the decreasing ones. In the building it’s a beautiful “Lord Shiva” temple having a large and beautiful shrine inside it, others idols present in the temple are also a proof a great architecture skills. The interior walls and roof of the temple have also been designed using great architecturing skills. The people of Hatkoti believe that the temple was established by Guru Adi Shankracharya. Some people also believe that the temple was built somewhere in the Third era. Three Gupta Age’s Rock Edicts (in scripted stones) have been found at three different places of this ancient and historic place.

The fifth kandh of Bhagvat gita describes about Mata Hateshwari as:-

Hateswari is known as the Shakti of Hateshwar and hence this place is known as Hateswari, one of the main residences of Shiva and Shakti.

In front of the temple of Mata Hateshwari towards the east direction is a small mountain known as a fort of Rambhasur. Rambhasur was the father of Maheshasur whom he has got as a reward of his prayers to Agnidev. He also went through a tough prayer of Lord Shiva and was rewarded by lord Shiva that his son would be un defeatable .Taking the advantage of this he captured the “Triloks” of the gods and betrayed them of all their powers. The defeated gods took shelter in the hard to reach places of pabbar valley and asked Mata Hateshwari to protect them from the devil. On the demand of gods Mata Hateshwari killed Maheshasur and gained the name of “Maheshasurmardini” (destroyer of Maheshasur Devil). 

The idol of Mata in the Temple is unexplainable. The artist has tried imagining the whole universe in this idol. The statue is made up of a mixture of eight valuable metals. The statue is 1.20 meter in height. The idol displays the destroyer expression of Mata. The interesting fact about the idol is that it changes its expression, sometimes it has a smiling face and some time it is in a angry posture, the idol has such effect on the devotee that he take off his eyes from the idol. On both sides of the idol there is something written in Brahmi script.

There is a huge vessel type of a thing present near the entrance of the temple known as “charu” surrounded by chains it attracts the attention of people towards it self following one more story of its existence behind it. There is a huge hall in the temple premises known as “yagyashala” used to perform rituals. In the centre of the hall is a Hawan kund where the rituals are performed. The idols of Lord Brahma,Vishnu,Mahesh And Ganesha can be seen placed here There is a lot of sitting place available for the devotees .there is one more hall in the premises known as Satsang Bhawan which can adjust 350 devotees at a time. Nearby is a rest house where the saints and devotees take rest. There is one more hall known as Dharamshala which is mainly used to store various things of the temple. The whole premise of the temple is covered by a 12foot high wall on all the three sides. It has two main doors one towards the east serving as an entrance to the temple.

Hatkoti

Hatkoti in Shimla is an elegant village, which is located on the royal river bank of Pabbar. The Stones and Temples of Hatkoti make the tourist to experience the real cloud nine among the Himalayan culture and green hayfields. All the people visiting the Hatkoti will cherish the temples of the great heritage which date back to the ancient Gupta Dynasty. Being the meeting point of three channels, Hatkoti provides an outstanding feel of ethereal experience, which makes it a substantial place in pilgrims travel route. The grey waters in the mountain channels and the rippling waters of the everlasting river Pabbar provides a solacing and a serene feeling. These Channels offers enormous chances of excursions such as Trout-Fishing and Angling by which fun wishing tourist can spend their time with some enjoyment.

साभार: http://kotkhaijubbal.com/downloads/temples/jubbal-temple/hatkoti-mata/

Thursday, November 28, 2013

MATA KUNAL PATHRI DHAM - माता कुनाल पत्थरी धाम

जगदम्बे का अद्भुत दर्शन-माता कुनाल पत्थरी धाम


हिमाचल प्रदेश की भूमि के कण- कण में देवी-देवताओं का वास है। इसी कारण यह धरती देव भूमि कहलाती है। यहां के लोग भी शांत व धार्मिक प्रवृत्ति के हैं। प्रकृति से यहां के लोगों की निकटता उनके प्रभु के समीप होने का भी बोध करवाती है। यही कारण है कि यहां के पग पग पर कोई ना कोई आस्था तीर्थ विद्यमान है। सदियों से यह आस्था पुंज हिंदू धर्म की ज्योति को चहूं दिशाओं में फैला रहे हैं। इसी श्रृंखला  में हिमालय की धौलाधार पर्वतमाला का विशेष महत्व है। इस पर्वतमाला के अंचल में हमारे अनेक प्रमुख देवी देवता अनेक रूपों में विराजमान हैं। माता दुर्गा के तो सबसे प्रसिद्घ शक्तिपीठ इस क्षेत्र की विशेष पहचान है। मां चिन्तापूर्णी, मां ज्वाला, श्री वज्रेश्वरी देवी, माता बगुलामुखी, महामाया चामुंडा देवी के अतिरिक्त भगवती के अनेक रूपों में इस क्षेत्र में दर्शन होते हैं। यदि यह कहा जाए कि मातेश्वरी ने अपनी कृपा इस भूमि पर जम कर बरसाई है तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी।

माता अंबे का ही एक रूप इस क्षेत्र में माता कुनाल पत्थरी के नाम से विख्यात है। स्थानीय लोगों में मां कुनाल पत्थरी के प्रति विशेष श्रद्घा है। माता का यह धाम धर्मशाला नगर के समीप विद्यमान है। शहर के हो-हल्ले से दूर भरपूर प्राकृतिक सौंदर्य के मध्य यह देवीपीठ स्थापित है। यंहा  आकर मन को भरपूर शांति की अनुभूति होती है। मुख्य रूप से यह मंदिर माता कपालेश्वरी देवी को समर्पित है। जनश्रुतियों के अनुसार इस धाम का संबंध माता सती की 51 शक्तिपीठों से जोड़ा जाता है। यह माना जाता है कि इस स्थान पर माता सती का कपाल गिरा था। कपाल अर्थात् खोपड़ी का ऊ पर का भाग। इस तथ्य की पुष्टि करता है यंहा  एक शिला पर स्थापित कपाल के आकार का पत्थर का कुंड जो वर्षा के जल से भरा रहता है। मंदिर के गर्भगृह में सतह से लगभग तीन फुट की ऊंचाई पर यह कुंड एक विशाल शिला पर प्राकृतिक अवस्था में  टिका हुआ है। इस शिला की माता कपालेश्वरी की पिंडी के रूप में पूजा होती है। कुंड के ठीक ऊपर गर्भगृह की छत में खुला स्थान रखा गया है जंहा  से वर्षा का जल इस कुंड में टपकता रहता है। वास्तव में यह पत्थर का कुंड एक बड़ी परात जैसा प्रतीत होता है। परात वह बर्तन होता है जो आटा गूंथने के काम आता है। परात को स्थानीय भाषा कांगड़ी में कुनाल कह कर पुकारा जाता है। यही कारण है कि स्थानीय लोग पत्थर की इस परात रूपी आकृति के कारण माता को कुनाल पत्थरी नाम से उच्चारित करते हैं। माता का ऐसा स्वरूप अन्यत्र कहीं देखने को नहीं मिलता।

माता के इस कुंड का जल विशेष प्रभाव वाला माना जाता है। यह जल कभी सूखता या खराब नहीं होता। न ही इस जल में कोई कीड़ा या जाला उत्पन्न होता है। यह देखने में आया है कि लंबे समय तक वर्षा न होने के उपरांत भी इस कुंड का जल समाप्त नहीं होता। किसी भी प्रकार के रोग विशेष तौर पर पत्थरी इत्यादि के इलाज में इस कुंड के जल को रोगी व्यक्ति को पिलाया जाता है। दूर दूर से लोग इस जल को प्राप्त करने के लिए यहां आते हैं। मंदिर का प्रांगण काफी विस्तृत क्षेत्र में फैला हुआ है। यहां राम दरबार के अतिरिक्त भगवान शिव शंकर को समर्पित एक शिवालय भी है। मंदिर में बाहर से आने वाले यात्रियों के लिए धर्मशाला की भी व्यवस्था है। इस पूरे क्षेत्र में विशेष रूप से चाय की पैदावार की जाती है। धर्मशाला नगर से इस मंदिर की दूरी लगभग पांच किलोमीटर है। शहीद स्मारक रोड से इस मंदिर तक आने का मार्ग निकलता है। यह पूरा रास्ता चाय के बागानों के बीच से होकर जाता है। जो यंहा  के सौंदर्य को चार चांद लगा देते हैं। धर्मशाला से पैदल चल कर यंहा  आने का अपना ही आनंद है। पहले इस स्थान पर छोटा सा मंदिर हुआ करता था। अधिकतर ग्वाले यंहा  आया करते थे। परन्तु समय के साथ-साथ माता के नाम की प्रसिद्घि दूर तक फैली। लोग अपनी मनचाही मुरादें माता के आशीर्वाद से पाने लगे। इस प्रकार मंदिर का आकार भी बढ़ता गया। मंदिर के वर्तमान स्वरूप का निर्माण 1965 के आसपास हुआ। जिसमें समय के अनुसार अन्य निर्माण भी जुड़ते चले गए। मंदिर का प्रबन्ध स्थानीय मंदिर कमेटी द्वारा कुशलतापूर्वक चलाया जा रहा है। माता को सकोह, सराह, नगरोटा क्षेत्रों सहित कांगड़ा व धर्मशाला के कई गाँव  में कुलदेवी के रूप में मान्यता प्राप्त है। यंहा  के परिवार अपने हर शुभ कार्य में माता के दरबार में माथा टेकने अवश्य आते हैं। नवरात्रों विशेष रूप से चैत्र मास में यहां मेले का आयोजन होता है। जिसमें दूर-दूर से लोग माता के दर्शन हेतु यंहा  आते हैं। उस समय यंहा  की छटा निराली होती है। सामान्य दिनों में निर्जन व शांत रहने वाला यह क्षेत्र श्रद्घालुओं की चहल पहल व रौनक से गुलजार हो उठता है। पूरे वातावरण में माता कुनाल पत्थरी के जयकारे गूंजने लगते हैं। 

साभार: पाञ्चजन्य, लेखक श्री  अभिनव 

Wednesday, September 25, 2013

YAMRAJ TEMPLE - यमराज जी का मंदिर

मंदिर, जहां मरने के बाद सबसे पहले पहुंचती है आत्मा

यमराज जी का मंदिर - भरमौर 
एक मंदिर ऐसा है जहां मरने के बाद हर किसी को जाना ही पड़ता है चाहे वह आस्तिक हो या नास्तिक। यह मंदिर किसी और दुनिया में नहीं बल्कि भारत की जमीन पर स्थित है। देश की राजधानी दिल्ली से करीब 500 किलोमीटर की दूरी पर हिमाचल के चम्बा जिले में भरमौर नामक स्थान में स्थित इस मंदिर के बारे में कुछ बड़ी अनोखी मान्यताएं प्रचलित हैं।

यहां पर एक ऐसा मंदिर है जो घर की तरह दिखाई देता है। इस मंदिर के पास पहुंच कर भी बहुत से लोग मंदिर में प्रवेश करने का साहस नहीं जुटा पाते हैं। बहुत से लोग मंदिर को बाहर से प्रणाम करके चले आते हैं। इसका कारण यह है कि, इस मंदिर में धर्मराज यानी यमराज रहते हैं। संसार में यह इकलौता मंदिर है जो धर्मराज को समर्पित है।

इस मंदिर में एक खाली कमरा है जिसे चित्रगुप्त का कमरा माना जाता है। चित्रगुप्त यमराज के सचिव हैं जो जीवात्मा के कर्मो का लेखा-जोखा रखते हैं। मान्यता है कि जब किसी प्राणी की मृत्यु होती है तब यमराज के दूत उस व्यक्ति की आत्मा को पकड़कर सबसे पहले इस मंदिर में चित्रगुप्त के सामने प्रस्तुत करते हैं। चित्रगुप्त जीवात्मा को उनके कर्मो का पूरा ब्योरा देते हैं इसके बाद चित्रगुप्त के सामने के कक्ष में आत्मा को ले जाया जाता है। इस कमरे को यमराज की कचहरी कहा जाता है।

कहा जाता है कि यहां पर यमराज कर्मों के अनुसार आत्मा को अपना फैसला सुनाते हैं। यह भी मान्यता है इस मंदिर में चार अदृश्य द्वार हैं जो स्वर्ण, रजत, तांबा और लोहे के बने हैं। यमराज का फैसला आने के बाद यमदूत आत्मा को कर्मों के अनुसार इन्हीं द्वारों से स्वर्ग या नर्क में ले जाते हैं। गरूड़ पुराण में भी यमराज के दरबार में चार दिशाओं में चार द्वार का उल्लेख किया गया है।

साभार: राकेश, अमर उजाला 

Wednesday, March 20, 2013

बिजली महादेव - BIJLI MAHAADEV (KULLU)





कुल्लू से उत्तर-पूर्व में आठ किलोमीटर दूर खराल घाटी में हैं बिजली महादेव। यह मंदिर कितना पुराना है, इसका कोई अंदाजा नहीं है। लोगों की ऐसी मान्यता है कि इस मंदिर का निर्माण सैकड़ों साल पहले हुआ था।

इस मंदिर से लेकर कई कथाएं भी जुड़ी हुई हैं। इनमें से एक का ताल्लुक ऋषि वशिष्ट से है तो दूसरे का कुलंत नाम के एक राक्षस से।

कहा जाता है कि जो भी इस मंदिर में दर्शन के लिए आता है, उसके जीवन भर के पाप खत्म हो जाते हैं। पहाड़ी शैली में बने इस मंदिर को लेकर कई कहानियां कही जाती हैं।

ऋग्वेद में जिक्र है कि, ऋषि वशिष्ठ ने भगवान रूद्र से प्रार्थना की कि वे अपनी अंदर की ऊर्जा को कम करें, ताकि महाविनाश से बचा जा सके। भगवान रूद्र ने मानव कल्या ण के लिए अपनी ऊर्जा अंदर सोख ली। 

यह घटना पार्वती और व्या्स नदी के संगम पर हुई थी, इसलिए यहां भगवान शंकर का मंदिर बनाया गया और नाम रखा गया बिजलेश्वइर महादेव, जिसे आज लोग बिजली महादेव कहते हैं।

एक अन्य कथा के अनुसार, पहाड़ों पर कुलंत राक्षस ने  उत्पात मचा रखा था। ऋषि- मुनियों ने इस राक्षस को मारने के लिए देवताओं से प्रार्थना की। देवताओं ने इस राक्षस की सेना को तो खत्म कर दिया, लेकिन राक्षस भाग खड़ा हुआ।

इसके बाद देवताओं ने इस राक्षस को खत्मे करने के लिए भगवान शंकर से प्रार्थना की। भगवान ने बार-बार आकाशीय बिजली गिराई। 

मानव जीवन को बचाने के लिए भगवान ने शिवलिंग स्थारपित कर खुद बिजली के प्रहार झेलने शुरू किए। तभी से यह शिवलिंग बिजली के प्रहार झेल रहा है। यह प्रतीक है शिव के कल्याणकारी रुप का।

इस मंदिर का संबंध एक और लोककथा से है। लोककथा के अनुसार पुराने समय में जालंधर दैत्य का अस्तित्व था। उसे सागर पुत्र भी कहते हैं। उस राक्षस ने अपने तप से सृष्टि के रचयिता आदि ब्रह्म को जीत लिया था और अपने बल से जग के पालनहार विष्णु को भी बंदी बना लिया था। उसने सभी देवताओं को पराजित कर त्रिलोक में उत्पात मचा रखा था। सभी उससे भयभीत थे। दैत्य त्रिलोक का स्वामी बनना चाहता था। कहते हैं कि इसी स्थान पर उसका शिवजी से भयंकर युद्ध हुआ था।

भोलेनाथ ने उसे खत्म कर सभी देवताओं को उसके चंगुल से मुक्त करवाया था। जिस गदा से शिवजी ने उस दैत्य का वध किया था, वह यहीं रखी गई और पिंडी के रूप में परिवर्तित हो गई। यह आज भी मौजूद है। इस विषयुक्त गदा को निर्विष करने के लिए इंद्रदेव ने आकाशीय बिजली गिराई।

आज भी कुछ वर्षों के अंतराल में जब उक्त पिंडी पर बिजली गिरती है तो यह टुकड़े-टुकड़े हो जाती है। इसे जोड़ने के लिए मक्खन का इस्तेमाल होता है और शायद यह भी एक कारण है कि इसका नाम बिजली महादेव पड़ा है। 

एक अन्य कथा के अनुसार यहां साथ लगते गांव भ्रैण में एक बार एक औरत को भोलेनाथ का दर्शन मोहरे के रूप में हुआ, जिसे उसने माश, स्थानीय भाषा में जिसे माह कहते हैं की तिजोरी में रखा। बाद में इसका नाम महादेव पड़ गया। बिजली महादेव की यात्रा एक रोमांचक अनुभव है।

बिजली महादेव के मंदिर के समीप जो पौराणिक वर्णन लिखा है...

"श्री भगवान शिव का सर्वोत्तम तपस्थान (मथान) 7874 फीट की ऊंचाई पर है। श्री सदा शिव इस स्थान पर तप योग समाधि द्वारा युग-युगांतरों से विराजमान हैं। सृष्टि में वृष्टि को अंकित करता हुआ यह स्थान बिजली महादेव जालंधर असुर के वध से संबंधित है। इसे कुलान्त पीठ भी कहा गया है। सात परोली भेखल के अंदर भोले नाथ दुष्टांत भावी, मदन कथा से नांढे ग्वाले से संबंधित है।

यहां हर वर्ष आकाशीय बिजली गिरती है। कभी ध्वजा पर तो कभी शिवलिंग पर। जब पृथ्वी पर भारी संकट आन पडता है तो भगवान शंकर जीवों का उद्धार करने के लिये पृथ्वी पर आए भारी संकट को अपने ऊपर बिजली प्रारूप द्वारा सहन करते हैं। यही कारण है कि बिजली महादेव यहां विराजमान हैं।"

बिजली महादेव मंदिर ब्यास नदी के किनारे स्थित है। यह कुल्लू का एक लोकप्रिय तीर्थ स्थल है। संहार के देवता, शिव को समर्पित यह मंदिर समुद्र तल से 2450 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। यह मंदिर भारत के उत्तर में हिमालय की तलहटी में रहने वाले लोगों का विशेष आराधना स्थल है। मंदिर स्थापत्य शैली का प्रतिनिधित्व करता है। यह मंदिर 60 फीट लंबे स्तंभ के लिए प्रसिद्ध है।

लोक आस्था के अनुसार, मंदिर के अंदर रखी मूर्ति शिव का प्रतीक 'शिवलिंग', बिजली की वजह से कई टुकड़े में बंट गई थी। बाद में मंदिर के पुजारियों ने टुकड़े एकत्र किये और उन्हें मक्खन की मदद से जोड़ दिया।

शिवलिंग के हिस्से जोड़ने का यह समारोह प्रतिवर्ष मनाया जाता है। इस मंदिर तक पहुंचने का रास्ता कठिन चढ़ाई वाला है। यहां देवदार के पेड़ हैं। मंदिर से पार्वती और कुल्लू घाटी के सुंदर दृश्यों को देखा जा सकता है।

ब्यास और पार्वती नदी के संगम कुल्लू से दस किलोमीटर दूर एक स्थान है भून्तर। यह मंडी की तरफ है। यहां पर एक तरफ से ब्यास नदी आती दिखती है और दूसरी तरफ से पार्वती नदी। दोनों की बीच एक पर्वत है। इसी पर्वत की चोटी पर स्थित है बिजली महादेव।

बिजली महादेव से कुल्लू भी दिखता है और भून्तर भी। दोनों नदियों का शानदार संगम भी दिखता है। दूर तक दोनों नदियां अपनी-अपनी गहरी घाटियों से आती दिखती हैं। दोनों के क्षितिज में हिमालय की बर्फीली चोटियां भी दिखाई देती हैं।

यूं तो इस स्थल पर साल भर स्थानीय लोगों और देशी-विदेशी पर्यटकों का आना-जाना लगा रहता है, लेकिन श्रावण माह में यहां एक विशाल मेले का आयोजन होता है। श्रावण महीने में यहां अच्छी-खासी भीड़ रहती है।

बिजली महादेव मंदिर...

हर साल सावन में शिवलिंग पर बिजली गिरती है। शिवलिंग टूटकर टुकडे-टुकडे होकर बिखर जाता है। फिर उसे मक्खन से जोड़ा जाता है।

बिजली महादेव का मंदिर जिले के प्रमुख देवस्थलों में से एक है। यहां पहुंचकर श्रद्धालुओं को प्रकृति का खूबसूरत नजारा भी देखने को मिलता है। इस नजारे को देखकर कश्मीर का एहसास हो जाता है।

साभार : सफर हैं सुहाना, फेसबुक..

Monday, September 10, 2012

बिजली महादेव मंदिर, कुल्लू-BIJLI MAHADEV, KULLU



देवी-देवताओं का स्थान होने के कारण कुल्लू जिला को देवभूमि माना जाता है। जिला मुख्यालय के साथ लगते पर्वत पर स्थित खराहल घाटी है। घाटी की चोटी पर स्थित भोलेनाथ का मंदिर। इस मंदिर को बिजली महादेव के नाम से जाना जाता है। यह जिला के प्रमुख देवस्थलों में से एक है। यहां पहुंचकर श्रद्धालुओं को प्रकृति का खूबसूरत नजारा भी देखने को मिलता है। इस नजारे को देखकर एकदम कश्मीर का एहसास हो जाता है।

यूं तो इस स्थल पर सालभर स्थानीय लोगों और देशी-विदेशी पर्यटकों का आना-जाना लगा रहता है लेकिन श्रावण माह में यहां एक विशाल मेले का आयोजन होता है। श्रावण महीने में यहां अच्छी खासी भीड़ रहती है। शिवरात्रि को भी यहां विशेष आयोजन होता है। इस दिन भोलेनाथ के साथ बर्फ के भी दर्शन हो जाएं तो दृश्य नयनाभिराम हो जाता है।
लोककथा के अनुसार कालांतर में जालंधर नाम का एक दैत्य था, जिसे सागर पुत्र भी कहते हैं। उस राक्षस ने अपने तप से सृष्टि के रचयिता आदि ब्रहृम को जीत लिया था और अपने बल से जग के पालनहार विष्णु को भी बंदी बना लिया था व सभी देवताओं को पराजित कर त्रिलोक में उत्पात मचा रखा था। सभी उससे भयभीत थे। दैत्य त्रिलोक का स्वामी बनना चाहता था। कहते हैं कि इसी स्थान पर उसका शिवजी से भयंकर युद्ध हुआ था और भोलेनाथ ने उसे खत्म कर सभी देवताओं को उसके चंगुल से मुक्त करवाया था। जिस गदा से शिवजी ने उस दैत्य का वध किया था वह यहीं रखी गई और पिंडी के रूप में परिवर्तित हो गई, जो आज भी मौजूद है। इस विषत गदा को निर्विष करने के लिए इंद्रदेव ने आकाशीय बिजली गिराई। आज भी कुछ वर्षो के अंतराल में जब उक्त पिंडी पर बिजली गिरती है तो यह टुकड़े-टुकड़े हो जाती है। इसे जोड़ने के लिए मक्खन का इस्तेमाल होता है और शायद यह भी कारण है कि इसी वजह से इसका नाम बिजली महादेव पड़ा है।
File:Way to bijli mahadev temple.jpg

 एक अन्य कथा के अनुसार यहां साथ लगते गांव भ्रैण में एक बार एक औरत को भोलेनाथ के दर्शन मोहरे के रूप में हुए, जिसे उसने माश जिसे स्थानीय भाषा में माह कहते हैं, की तिजोरी में रखा और बाद में इसका नाम महादेव पड़ गया।
-बृजभूषण सिंह, कुल्लू, दैनिक जागरण 

Thursday, September 6, 2012

यहां देवी के सिर छत नहीं, माँ शिकारी देवी मंदिर

माँ शिकारी देवी मंदिर 




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जैहली घाटी ने देशी व विदेशी पर्यटकों के लिए एक अच्छा खासा प्लेटफार्म तैयार कर लिया है। रोजाना सैकड़ों पर्यटक घाटी में विचरण करते देखे जा सकते हैं। मण्डी से जंजैहली बस स्टैंड तक की दूरी लगभग 86 किमी है। किसी भी वाहन अथवा बस द्वारा यहां पहुंचा जा सकता है। रास्ते में चैलचौक, काण्ढा, बगस्याड तथा थुनाग आदि छोटे-छोटे कस्बे आते हैं जहां पर आप रुककर इस घाटी के मनोरम दृश्यों से अपनी यात्रा में नया जोश भरते हैं। इन जगहों से आप अपनी जरूरत का सामान भी खरीद सकते हैं। जंजहैली से दो किलोमीटर पीछे पांडवशिला नामक स्थान आता है जहां आप उस भारी-भरकम चत्रन के दर्शन कर पाएंगे जो मात्र आपकी हाथ की सबसे छोटी अंगुली से हिलकर आपको अचंभित कर देगी। इस चत्रन को महाभारत के भीम का चुगल (हुक्के की कटोरी में डाला जाने वाला छोटा-सा पत्थर) माना जाता है और इसकी पूजा की जाती है। ढलानदार खेतों में चारों ओर फैली आलु और मटर के खेतों की हरियाली मन मोह लेती है। जब हम जंजैहली पहुंचते हैं तो हम खुद को एक अलग ही दुनिया में पाते हैं। जंजैहली सुंदर व शहर के शोर-शराबे से दूर एक शांत गांव है। यहां सेब, पलम, नाशपाती, खुमानी आदि फलों की सीजन पर भरमार रहती है। जंजैहली बस स्टैंड के साथ ही ढीमकटारु पंचायत की सीमा शुरू हो जाती है। यह पंचायत प्राकृतिक सौंदर्य का एक अनूठा उदाहरण प्रस्तुत करती है। यदि समय हो तो यहां के सांस्कृतिक कार्यक्रमों में अवश्य शामिल होइए। घाटी में अन्य स्थल हैं जो खूबसूरती और रोमांच से भरे पड़े हैं। भुलाह जंजैहली से 6 किमी की दूरी पर आता है रमणिक स्थल भुलाह जिसे एक बार देख लें तो भुले से भी न भूले। भुलाह तक पक्की सड़क है। कोई भी बस यहां तक ही आती है। भुलाह ट्रैकरों, पर्यटकों व श्रद्धालुओं का पहला पड़ाव स्थल भी माना जा सकता है क्योंकि इसके बाद शिकारी पर्वत की चोटी तक चढ़ाई शुरू हो जाती है। थोड़ा सा मैदानी होने और चारों ओर से देवदार, बान आदि के पेड़ों से घिरा होने के कारण इस स्थान की सुंदरता देखते ही बनती है। भुलाह काफी-कुछ चंबा जिले के खजियार जैसा है जिसे हिमाचल का मिनी स्विट्जरलैंड कहा जाता है। बूढ़ा केदार इस स्थल के लिए पैदल ही जाना पड़ता है। जंजैहली से ही आप इस रास्ते पर हो लेते हैं। पूरा रास्ता चढ़ाई वाला है। यहां पर रहने वाले गुज्जरों के लिए यह रोज का रास्ता है। ये जंजैहली तक दूध, घी व खोया आदि पहुंचाते हैं और बदले में मिलने वाले धन से राशन व जरूरत का अन्य सामान ले जाते हैं। यह गुज्जर समुदाय सर्दी में इन इलाकों को छोड़ कर मैदानी इलाकों में अपने पशुओं के साथ चले जाते हैं और गर्मियों में ये फिर से वापिस अपने-अपने दड़बों को आबाद करते हैं। किवदंती है कि बूढ़ा केदार में भीम से बचने के लिए नंदी बैल एक बड़ी चत्रन में कूदे और सीधे पशुपतिनाथ मंदिर पहुंचे थे। चत्रन में आज भी बड़ा सा सुराख है जिसके अंदर जाकर पूजा-अर्चना की जाती है। यहां स्थित छोटे से झरने के नीचे स्नान करना भी पवित्र माना जाता है। शिकारी देवी पर्वत जंजैहली में इतनी संख्या में पर्यटकों के पहुंचने का प्रमुख कारण यदि माता शिकारी देवी के प्रति अटूट आस्था व भक्ति भावना को माना जाए तो गलत न होगा। इस भक्ति भावना को बल देती है प्राकृतिक सौंदर्य से लबालब यह घाटी। भुलाह से आगे शिकारी देवी मंदिर लगभग 11 किमी की दूरी पर स्थित है। मंदिर तक सड़क सुविधा है। किसी भी छोटी गाड़ी में आप इस दूरी को तय कर सकते हैं लेकिन पैदल चला जाए तो आप रोमांच से भर उठेंगे। शिकारी देवी का मंदिर इस पर्वत पर स्थित होने के कारण इसे शिकारी पर्वत के नाम से भी जाना जाता है। शिकारी मंदिर तक पहुंचने के कई रास्ते हैं। लेकिन जंजैहली से मुख्यतया दो रास्ते मंदिर तक जाते हैं। एक बूढ़ा केदार तीर्थ स्थल से तथा दूसरा भुलाह से होकर। दोनों रास्तों से जाने का अपना ही मजा है। भुलाह से सड़क मार्ग उपलब्ध है जबकि बूढ़ा केदार से आपको पैदल ही खड़ी चढ़ाई तय करनी पड़ती है। यह मार्ग ट्रैकरों के लिए अति उत्तम है। जंजैहली में टै्रकिंग हॉस्टल भी है। प्राकृतिक नजारों का आनंद लेना हो तो ऐसी जगहों पर पैदल चलना ही बेहतर होता है। शिकारी देवी पर्वत के लिए आप सड़क के बजाए भुलाह नाले से होते हुए जाएं तो एक अलग रोमांचकारी अनुभव से सराबोर होंगे। बड़ी-बड़ी चत्रनों से प्रस्फुटित झरने, कल-कल बहते पानी का संगीत और लंबे-लंबे देवदार के वृक्षों से घिरा यह नाला हर किसी को आकर्षित करने में पूर्णतया सक्षम है। नाले वाला रास्ता शार्टकट है। इस नाले पर एक नई चीज जो पहली बार हमने देखी वह था गहरे भूरे रंग का जंगली घोंघा (स्थानीय लोगों के अनुसार) जो बिलकुल ही अलग-सा था। वह आम व्यक्ति के अंगूठे से भी मोटा और लगभग 6 इंच लंबा था। इस नाले से आप लड़वहाच होते हुए सीधे सिंगरयाला पहुंचेंगे। बुजुगरें या पैदल न चल सकने वालों के लिए सड़क मार्ग से जाने का भी अपना मजा है। कल्पना लोक-सा शिकारी देवी मंदिर का यह स्थान अनोखे अहसास से सराबोर कर देता है। आस-पास की चोटियों से सबसे ऊपर होने के कारण ऐसा लगता है जैसे हम आकाश में उड़ रहे हों। समुद्रतल से इस स्थान की ऊंचाई 9000 फुट है। शिकारी देवी मंदिर हिमाचल का एकमात्र ऐसा मंदिर है जिसकी छत नहीं है। कहा जाता है कि देवी अपने ऊपर किसी भी तरह की छत स्वीकार नहीं करती। शिकारी देवी का मंदिर पांडवों द्वारा निर्मित है। वनवास काल के दौरान पांडव यहां रुके थे। कहा जाता है कि माता की मूर्तियों के ऊपर कभी भी बर्फ नहीं टिकती, चाहे जितनी भी बर्फ क्यों न गिर जाए। पर्यटकों के पड़ाव का यह दूसरा स्थान है। चाहें तो माता के दर्शन के उपरांत यहां से लौट भी सकते हैं लेकिन शिकारी देवी मंदिर की दक्षिण-पश्चिम दिशा में जो सौंदर्य बिखरा पड़ा है उसे करीब से देखे बगैर प्रकृति प्रेमियों का जाने का मन नहीं करेगा। पृष्ठ 3 का शेष यहां देवी के सिर छत नहीं शिकारी देवी मंदिर की दक्षिण-पश्चिम दिशा की ओर जब हम उतरते जाते हैं तो हम उस प्राकृतिक खूबसूरती के और करीब होते जाते हैं। कुछ ही समय में शिकारी देवी मंदिर हमारी आंखों से ओझल हो जाता है। आगे का सफर हमें घने जंगल और पथरीले रास्ते से ले जाता है। इस रास्ते पर चलते हुए पश्चिम में नीचे की ओर हमें दीदार होता है एक छोटे से सुंदर इलाके देवीदहड़ का। इस क्षेत्र का असीम सौंदर्य हमें अपने मोहपाश में बांध देता है। इस इलाके के लोगों की कठिन लेकिन शांत जीवनशैली हमें हर मुश्किलों से लड़ने की प्रेरणा देती है। यहां का पांच पेड़ों का एक पेड़ हमें हैरत में डाल देता है। यहां माता मुंडासन का अति सुंदर मंदिर दर्शनीय है। यहां ठहरने के लिए आप वन विभाग का विश्राम गृह बुक करवा कर इस वादी को तसल्ली से निहारने का आनंद ले सकते हैं। देवीदहड़ के लिए दूसरा रास्ता वाया तुना, धंग्यारा होकर है जो चैलचौक से एक किलोमीटर आगे जंजैहली रोड़ से इस दिशा की ओर मुड़ जाता है। इस रास्ते से आप गाड़ी द्वारा यहां आराम से पहुंच सकते हैं। गर्मी के मौसम में यहां की स्थानीय सब्जी लिंगड़ यहां बहुतायत में मिल जाती है। इसका अपना ही एक खास स्वाद होता है। कमरुनाग जहां से हम देवीदहड़ के लिए नीचे उतरते हैं वहीं से ही एक रास्ता हमें सीधा कमरुनाग (पांडवों के आराध्य देव) मंदिर तक ले जाता है। शिकारी मंदिर से कमरुनाग मंदिर तक का रास्ता तय करने में 7 से 8 घंटे (यदि देवीदहड़ न जाएं) का समय लग जाता है। इस रास्ते को पैदल ही तय करना पड़ता है। बेहद थका देने वाले इस रोमांचक सफर में हवा के ठंडे झोंके और हर कदम पर दिखने वाले खूबसूरत नजारे हमें ऊर्जायमान रखते हैं। कमरुनाग मंदिर के साथ एक झील भी है जिसे कमरु झील कहा जाता है। किवदंती के अनुसार कमरुनाग पांडवों के आराध्य देव हैं। आप यदि सरायों में रुकना चाहें तो यहां ठहर भी सकते हैं। आगे 7-8 घंटे का पैदल सफर तय करके सुंदरनगर की ओर सड़क मार्ग पर रोहांडा पहुंच सकते हैं। कब व कैसे वैसे गर्मी का मौसम जंजैहली घाटी को निहारने के लिए अति उत्तम है। लेकिन आप अप्रैल से अक्टूबर तक इस वादी में विचरण कर सकते हैं। चंडीगढ़-मनाली नेशनल हाईवे या पठानकोट-जोगिंदरनगर मार्ग द्वारा सुंदरनगर या मंडी पहुंचकर यहां से आगे जंजैहली के लिए (86 किमी) सफर बस या छोटी गाड़ी से किया जा सकता है। एक अन्य रास्ता मंडी से ही वाया पण्डोह, बाड़ा, कांढा होकर (76 किमी) भी है जो पहले रास्ते से छोटा तो है लेकिन उससे थोड़ा तंग है। इस मार्ग से आप व्यास नदी पर बने पण्डोह बांध की खूबसूरती का मजा ले सकते हैं। हवाई मार्ग से भी जंजैहली पहुंचा जा सकता है लेकिन इसके लिए पहले आपको भुंतर (कुल्लू) एयरपोर्ट जाना पड़ेगा फिर पीछे मंडी की ओर आना पड़ेगा। कहां ठहरें जंजैहली में लोक निर्माण विभाग, वन विभाग का रेस्ट हाउस और अन्य निजी होटल व सराय हैं जो आम तौर पर सस्ते हैं और बुनियादी सुविधाओं से संपन्न हैं। आप इनमें सहज महसूस करेंगे। तो फिर देर किस बात की है। आइए चलें, दुनिया के शोर-शराबे से दूर जंजैहली घाटी की वादियों में, दो पल आस्था व सुकून के बिताने। अब हम जंजैहली की पश्चिम दिशा की तरफ इसके दूसरे छोर अर्थात सुंदरनगर की ओर होते हैं। यह 6 किमी का पूरा रास्ता ही उतराई वाला है। उतर कर हम पहुंचते है रोहांडा। रोहांडा में एक छोटा-सा बस स्टेशन है जो सुंदरनगर-करसोग मार्ग पर स्थित है। इस मार्ग द्वारा करसोग, शिमला, काजा, किन्नौर भी जाया जा सकता है। यहां से चंडीगढ़-मनाली नेशनल हाईवे-21 मात्र 35 किमी दूर है। रोहांडा एक छोटा-सा कस्बा है। यहां से जरूरत की हर वस्तु खरीदी जा सकती है। रोहांडा से बस, जीप व अन्य वाहन द्वारा नेशनल हाईवे तक पहुंचा जा सकता है। यहां पर हमारी यह धार्मिक व रोमांचक यात्रा संपन्न हो जाती है।

साभार : दैनिक जागरण