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Tuesday, April 8, 2014

BAHULA SHAKTI PEETH - बहुला शक्तिपीठ




पश्चिम बंगाल के कटवा जंक्शन के निकट बर्धमान में स्थित बहुला शक्तिपीठ 51 शक्तिपीठों में से एक है। यह पवित्र स्थल मां दुर्गा और भगवान शिव को समर्पित है। यहां की शक्ति बहुला तथा भैरव भीरुक हैं। पश्चिम बंगाल के हावड़ा से यह 145 किलोमीटर दूरी पर स्थित है।

बहुला शक्तिपीठ को भारत के ऐतिहासिक स्थलों में से एक माना जाता है। यहां पर हिंदू भक्तों को देवी शक्ति के रूप में एक अलग ही तरह की ईश्वरीय उर्जा मिलती है। यहां मंदिरों में भक्तजन रोजाना सुबह देवी मां को मिठाई और फल चढ़ाकर पूजा करते हैं।

कथा

पौराणिक कथा के अनुसार ऐसा माना जाता है कि बहुला शक्तिपीठ वह जगह है जहां पर देवी मां की बायीं भुजा गिरी थी। इस मंदिर के निर्माण और उत्थान को लेकर वैसे तो कोई जानकारी नहीं है लेकिन यहां के स्थानीय लोग इसके निर्माण को लेकर अलग-अलग कहानियां रचते हैं।

त्यौहारों में मेले जैसा माहौल

हिंदू त्यौहारों में खासकर महाशिवरात्रि और नवरात्र के समय यहां की रौनक देखते ही बनती है। इस दौरान यहां के बाजारों में मेले जैसा माहौल होता है। नवरात्रि में तो भक्तजन नौ दिन बिना कुछ खाए यहां के मंदिर में मां के दर्शन के लिए चक्कर लगाते हैं।

यहां भी जाएं

अगर आप बधुला शक्तिपीठ जा रहे हैं तो आप टाउन हॉल, डीयर पार्क, क्त्राइस्ट चर्च, दामोदर रिवर, शेर अफगान की क्त्रब, सिख गुरद्वारा, बिजॉय तोरण् जैसे जगहों पर जाना न भूलें। बहुला शक्तिपीठ के नजदीक ही काली और शिवलिंगम मंदिर हैं जो भक्तों के लिए खास आकर्षण है।

कैसे पहुंचें

1. आप देश की किसी भी कोने से बर्धमान रेलवे स्टेशन के लिए ट्रेन पकड़कर बहुला मंदिर पहुंच सकते हैं।

2. अगर आप पश्चिम बंगाल में रहते हैं तो बस के माध्यम से बहुला पहुंच सकते हैं। राज्य में बहुला के लिए डीलक्स बसें चलाई जाती है।

3. यहां का नजदीकी एयरपोर्ट बर्धमान है जबकि यहां का अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट कोलकाता में है।

साभार : दैनिक जागरण 

Saturday, June 16, 2012

कनक दुर्गा मंदिर




पश्चिम बंगाल में खडग़पुर स्टेशन से लगभग 120 किमी.की दूरी पर पश्चिम मेदिनीपुर जिले की झाडग़्राम तहसील के जामबनी प्रखंड अंतर्गत चिल्कीगढ़ स्थित है प्राचीन कनक दुर्गा। इस मंदिर की स्थापना 1749 ई. में टिहार दीपगढ़ रिसायत के राजा गोपीनाथ सिंह मत्तगज ने तत्कालीन जामबनी परगना के चिल्कीगढ़ में अश्रि्वन माह के शुक्ल पक्ष की सप्तमी की थी।
रानी गोविंदमनी के स्वर्ण कंगन से मां की चतुर्भुज प्रतिमा बनाई गई थी। खास बात यह रही की यहां पर अश्व को देवी का वाहन बनाया गया था।
इसके पीछे यह कथा है कि- राजपरिवार की कन्या सुवर्णमनी का धालभूमगढ़ परगना के राजा सप्तम जगन्नाथ देवधवलदेव के साथ विवाह हुआ और उनके पुत्र कमलाकांत देव धवलदेव के वंशज आज भी मंदिर में पूजा का आयोजन करते आ रहे हैं, जबकि मंदिर में पूजा का दायित्व पुजारी रामचंद्र षाडंगी के वंशज निभा रहे हैं।- प्रतिवर्ष नवरात्र के दौरान महानवमी को दुर्गोत्सव को देखने के लिए प. बंगाल के अलावा झारखंड एवं ओडि़शा से भक्त मां के दर्शन को आते हैं। इस दिन मां के चरणों में भैंस की बलि चढ़ाई जाती है। आम दिनों वैसे तो प्रतिदिन लगभग 50-60 भक्त ही दर्शन को आते हैं, लेकिन महानवमी को हजारों की भीड़ उमड़ पड़ती है। ट्रेन अथवा सड़क मार्ग से बस एवं ट्रेकर द्वारा झाडग़्राम जाना होता है, जहां से कनक दुर्गा मंदिर की दूरी 18 किमी. है। झाडग़्राम से बस एवं ट्रेकर की सुविधा है। कनक दुर्गा मंदिर ट्रस्ट द्वारा संचालित यहां तीन गेस्ट हाउस हैं। इसके अलावा झाडग़्राम में स्थित होटलों में भी ठहरा जा सकता है, जिनका टैरिफ 150-500 रु. के बीच प्रतिदिन पड़ता है।

साभार : दैनिक जागरण 

चंद्रकोणा गुरुद्वारा




चंद्रकोणा गुरुद्वारा-खडगपुर से लगभग 97 किमी. दूर पश्चिमी मेदिनीपुर जिला स्थित है चंद्रकोणा गुरुद्वारा।
सिक्खो के प्रथम पातशाह श्रीगुरुनानक देव के कारण आराध्य स्थल है। अपनी दूसरी देशव्यापी धार्मिक यात्रा के क्रम में उत्तर प्रदेश के अयोध्या से होते हुए बाबा विश्वनाथ की पावन नगरी काशी-बनारस के रास्ते हिंदुओं के प्रमुख तीर्थस्थल गया से गुजरते हुए सिक्खो के पहले गुरु नानकदेव 1510 ईसवी में भगवान जगन्नाथ की नगरी पुरी जाने के क्रम में चंद्रकोणा पहुंचे और वहीं अपना डेरा जमाया। यही कारण है कि आज यह स्थल पश्चिम बंगाल के सिक्ख समाज के लिए पाकिस्तान के ननकाना साहिब से कम नहीं है।
कहा जाता है कि प्राकृतिक सौंदर्य के बीच गुरु नानक का मन तो रम गया परंतु वहां के लोग उनकी भाषा नहीं समझ पा रहे थे। इस बीच एक अंधा वहां पहुंचा और उनकी बोली सुनकर ग्रामीणों को बताया कि यह गुरु नानक देव हैं। गुरु के साथ उनके प्रिय शिष्य बाला और मरदाना भी थे। गुरु ने अलौकिक कृपा का चमत्कार दिखाते हुए अंधे को ज्योति प्रदान कर दी, तो बाबा की ख्याति चारों ओर फैलने लगी। ज्योति मिलने के बाद अंधे व्यक्ति ने बाबा का स्वरूप देख अपनी आंखें बंद कर ली और कहा कि जिन नेत्रों से उसने उस अलौलिक स्वरूप को देखा, उससे वह अब कुछ और नहीं देखना चाहता। नानक की महिमा सुन वहां पहुंचे तत्कालीन राजा चंद्रकेतु ने जब अलौकिक आभा वाले नानक देव को प्रणाम किया तो उन्होंने आशीर्वाद दिया परंतु इसके बाद भी राजा उनके चरणों से उठे नहीं तो बाबा ने मन की बात मन में ही समझते हुए पुत्र संतान का वरदान दिया था। राजा ने अपनी संतान का नाम श्रीचंद्र रखा।
नानक देव की महिमा से चंद्रकेतु ने इलाके की सारी भूमि उनको दान कर दी और आज भी वहां की जमीन गुरु ग्रंथ साहिब के नाम पर है। हालांकि वर्तमान समय में 10-12 एकड़ भूमि ही गुरुद्वारा के पास है। गुरुद्वारे के पास ही भगवान विष्णु व शिव के मंदिर स्थित हैं। चंद्रकोणा गुरुद्वारे में यूं तो प्रत्येक माह की पूर्णिमा तिथि को अरदास के लिए भक्तों का जमावड़ा लगता है किंतु दिसंबर की पूर्णिमा को यहां विशेष समारोह होता है। इसमें भाग लेने के लिए प. बंगाल के अलावा झारखंड, बिहार व ओडि़शा से भी लोग पहुंचते हैं। खडग़पुर से दूरी लगभग 97 किमी. उसके बाद ट्रेन अथवा सड़क मार्ग से जाया जा सकता है। चंद्रकोणा रोड से गुरुद्वारे तक की दूरी लगभग 20 किमी. है। गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी की ओर से यहां आने वाले भक्तों के लिए गुरुद्वारा परिसर में ही रहने की व्यवस्था की जाती है।

साभार : दैनिक जागरण