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Sunday, August 21, 2016

New Roadway Towards Vaishnav Devi To Be Started Soon



परंपरागत रास्ते को 16 किमी तक शेड से ढंका जा चुका है। किनारे पर फेंसिंग भी की गई है, ताकि नीचे कोई गिरे नहीं और कचरा न फैलाए।

कटरा. जम्मू से कटरा का रास्ता पहले दो घंटे का होता था। तीन टनल की बदौलत अब यह बमुश्किल 40 मिनट का रह गया है। अभी लोग कम आ रहे हैं। पर महज डेढ़ महीने बाद नवरात्र शुरू हो जाएंगे। इसलिए वैष्णोदेवी तक जाने वाले नए रास्ते पर काम जोर-शोर से चल रहा है। 7 किमी लंबा ये रास्ता बालिनी ब्रिज से अर्द्धकुंवारी को जोड़ेगा। चेकिंग प्वाइंट और शेड का काम होते ही इसे श्रद्धालुओं के लिए खोल दिया जाएगा। हालांकि, पालकी और घोड़े वाले इस नए रूट का विरोध कर रहे हैं। कितना छोटा होगा नया रास्ता...

- वैष्णोदेवी श्राइन बोर्ड के सीईओ अजीत कुमार साहू ने बताया कि श्रद्धालुओं में 80% पैदल यात्रा करते हैं। बाकी 6% हेलिकॉप्टर से और 14% घोड़े-पालकी से। नया रास्ता सिर्फ पैदल यात्रियों के लिए होगा। यहां घोड़े-पालकी बैन रहेंगे।

- पुराने रास्ते की तुलना में नया रास्ता सिर्फ 500 मीटर छोटा होगा, लेकिन सुविधाएं कई हैं। रूट इतना चौड़ा होगा कि इमरजेंसी में एम्बुलेंस भी आसानी से आ-जा सके। 
- सबसे खास बात ये होगी कि रूट शुरू होने के बाद यात्री बाणगंगा से अर्द्धकुंवारी और हाथी मत्था की खड़ी और कठिन चढ़ाई से बच जाएंगे। इतना ही नहीं, जमीन पर एंटी स्किड टाइल्स भी लगाई जा रही हैं।

- साथ ही स्लोप स्टैबेलाइजेशन टेक्नोलॉजी का भी इस्तेमाल किया गया है, ताकि चढ़ाई सरल रहे। अगले साल कटरा से भवन तक सामान ले जाने वाला रोप-वे और भवन से भैरवघाटी तक पैसेंजर ले जाने वाला रोपवे भी शुरू हो जाएगा।

- अभी घोड़े से सामान भेजा जाता है। रोपवे बनने के बाद हर घंटे भवन से 800 लोगों को भैरवघाटी पहुंचाया जा सकेगा।

आईआईटी मुंबई ने डिजाइन की आरामदायक पालकी

- आईआईटी मुंबई ने ऐसी पालकी डिजाइन की है, जिसमें बैठने वाले और उसे उठाने वाले को ज्यादा आराम मिले। पालकी वालों के जूते भी नए बने हैं। 
- 33 खतरनाक जगहों पर लैंडस्लाइड ट्रीटमेंट हो रहा। 5 पर हो चुका है, 7 पर अगले फेज में होगा। बाकी बाद में। स्वीडिश कंपनी ये काम कर रही है। 
- मल्टीपर्पज ऑडियो सिस्टम लगाया जा रहा है। आपात स्थिति में लोगों को मैसेज देने के लिए इस्तेमाल होगा। 
- रास्तों को शेड से ढंका जा रहा है। ये इतने मजबूत हैं कि बारिश-धूप के साथ छोटे-मोटे पत्थरों को भी झेल सके। 
- परंपरागत रास्ते को 16 किमी तक शेड से ढंका जा चुका है। किनारे पर फेंसिंग भी की गई है, ताकि कोई गिरे नहीं और कचरा नहीं फैलाए।

नए रास्ते पर घोड़े और पालकी आने की रोक

- मौजूदा रास्ता बाणगंगा से अर्द्धकुंवारी जाता है। वहां से दो रास्त्ते निकलते हैं। पहला हाथी मत्था होते हुए भवन तक जाता है। यहां खड़ी चढ़ाई है। दूसरा हिमकोटि से भवन जाता है।

- नया रास्ता बालिनी ब्रिज से ताराकोट गांव होते हुए अर्द्धकुंवारी पहुंचाएगा। इस रास्ते से हिमकोटि होते हुए भी भवन तक जाया जा सकता है। इसमें घोड़े-पालकी नहीं चलेंगे।

साभार: दैनिक भास्कर


Friday, June 7, 2013

मार्तण्ड मंदिर - MARTAND MANDIR - KASHMIR







कश्मीर में अशांति के दो दशकों में जिन मंदिरों को सबसे ज्यादा उपेक्षा झेलनी पड़ी, उनमें से एक है अनंतनाग जिले में म˜न स्थित मार्तण्ड मंदिर। यह उत्तर भारत में सूर्य के गिने-चुने मंदिरों में से प्रमुखतम माना जाता है।

कहा जाता है कि म˜न भी मार्तण्ड का ही अपभ्रंश है। सूर्य मार्तण्ड ऋषि कश्यप व अदिति के तेरहवें पुत्र माने जाते हैं। हिंदू मिथकों में कश्मीर का जिक्र भी कई जगहों पर आता है। मिथकों के अनुसार, 2600 ई.पू. में पांडववंशीय रामदेव जी ने यहां मंदिर बनवाया। उसके बाद 742 ई. में राजा ललितादित्य ने मार्तण्ड इलाके में मंदिर बनवाए। उसके बाद नौवीं सदी के अंत में राजा अवंतीवर्मन और दसवीं सदी में राजा कलशक ने मंदिर का विकास कराया। हर काल में इस मंदिर का माहात्म्य बना रहा।

बताया यह भी जाता है कि मुगल शासकों- शाहजहां से लेकर औरंगजेब तक के काल में भी इस इलाके का काफी विकास हुआ। मंदिर का जिक्र कल्हण की राजतरंगिणी में भी आता है। चूंकि यह मंदिर पहलगाम के रास्ते के नजदीक है, इसलिए इसकी मान्यता अमरनाथ यात्रा से भी जुड़ी है। यहां सरोवर में मछलियों को दाना खिलाए बगैर यह यात्रा पूरी नहीं मानी जाती।

साभार : http://sanatan.apnahindustan.com, सनातन धर्म 

Tuesday, June 4, 2013

बाबा अमरनाथ - BABA AMARNATH JI

पवित्र शिवलिंगम 

पवित्र कन्दरा 


कश्मीर की खूबसूरत लिद्दर घाटी के सुदूर किनारे पर एक संकरी खाई में बसे हैं बाबा अमरनाथ। गुफा में बर्फ के लिंग के रूप में स्थित महादेव शिव का यह स्थान समुद्र तल से 3888 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। बर्फ का यह शिवलिंग पूरी तरह प्राकृतिक है और कहा जाता है कि चंद्रमा के घटने-बढ़ने के साथ ही यह शिवलिंग भी घटता-बढ़ता है। मुख्य लिंग के अगल-बगल ही बर्फ के दो और शिवलिंग हैं जो देवी पार्वती और गणेश के प्रतीक हैं। इस गुफा के धार्मिक-पौराणिक इतिहास के बारे में कई कथाएं प्रचलित हैं।

साल के ज्यादातर समय यह जगह बर्फ से घिरी रहती है और लिहाजा यहां पहुंचना लगभग नामुमकिन सा होता है। गर्मियों में बर्फ के पिघलने के बाद यहां जाने का रास्ता खुलता है। हर साल ज्येष्ठ-श्रावण के महीनों में यहां यात्रा होती है। हर साल यात्रा की अवधि भी कम ज्यादा होती रहती है। यात्रा की अवधि, इंतजामों और यात्रियों की मौत को लेकर पिछले कई सालों से यात्रा चर्चा में रही है। वैष्णो देवी की ही तरह अमरनाथ के लिए भी अलग से श्राइन बोर्ड बना हुआ है जो यात्रा के सारे इंतजाम देखता है। इस साल यात्रा 28 जून से शुरू होगी और कुल 55 दिन तक चलेगी। रक्षाबंधन के दिन 21 अगस्त को छड़ी मुबारक के अमरनाथ पहुंचते ही यात्रा संपन्न हो जाएगी। पिछले कुछ सालों में यात्रियों की मौत का मसला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचने के बाद इस बार किसी भी व्यक्ति का हेल्थ सर्टीफिकेट के बगैर यात्रा के लिए रजिस्ट्रेशन नहीं किया जाएगा। यात्रा के लिए हर व्यक्ति को रजिस्ट्रेशन कराना जरूरी है और इस साल के लिए रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया 18 मार्च से पहले ही शुरू हो चुकी है। रजिस्ट्रेशन की एक तय प्रक्रिया है। साथ ही हर रूट पर किसी भी दिन जाने वाले यात्रियों की भी एक तय संख्या है। रजिस्ट्रेशन का जिम्मा देशभर में कई बैंकों के पास है और उनके पास हर रूट व हर तारीख का एक कोटा है। इसके अलावा इस साल यह भी तय किया गया है कि 13 वर्ष से कम और 75 वर्ष से ज्यादा उम्र के किसी भी व्यक्ति को इस साल यात्रा पर जाने की इजाजत नहीं होगी। इसी तरह छह हफ्ते या उससे ज्यादा के गर्भ वाली किसी महिला को भी यात्रा पर नहीं जाने दिया जाएगा।

कैसे जाएं

अमरनाथ यात्रा जाने के दो रास्ते हैं- पहला, पहलगाम से होकर और दूसरा सोनमर्ग से होकर। दोनों ही रास्तों के लिए पहले ट्रेन, बस अथवा हवाई जहाज से जम्मू या श्रीनगर पहुंचना होता है। उसके बाद आप पहलगाम या सोनमर्ग जा सकते हैं। उसके बाद अमरनाथ गुफा तक का आगे का सफर पैदल, खच्चर पर या पालकी में किया जा सकता है। पहलगाम का रास्ता बेस कैंप चंदनवाड़ी, पिस्सू टॉप, शेषनाग व पंजतरणी होते हुए गुफा तकपहुंचता है। जबकि सोनमर्ग का रास्ता बालटाल से सीधा गुफा तक ले जाता है। पहलगाम वाले रास्ते में आने-जाने में पांच दिन का वक्त लग जाता है। वहीं बालटाल से गुफा तक एक दिन में पहुंचा जा सकता है। 14 किलोमीटर का यह रास्ता खड़ी चढ़ाई वाला है। फिट लोग इस रास्ते पर बालटाल से जल्दी चढ़ाई शुरू करके उसी दिन दर्शन करके नीचे लौट आते हैं। इस रास्ते पर बालटाल और पहलगाम वाले रास्ते पर चंदनवाड़ी से आगे किसी भी व्यक्ति को यात्रा परमिट और स्वास्थ्य प्रमाणपत्र के बगैर जाने की इजाजत नहीं है। वहीं यात्रा के लिए हेलीकॉप्टर की सुविधा भी है। यात्रा के दौरान बालटाल और पहलगाम, दोनों ही जगहों से पंजतरणी तक होलीकॉप्टर की उड़ानें उपलब्ध रहेंगी। बालटाल से पंजतरणी तक का इकतरफा किराया 1500 रुपये और पहलगाम से पंजतरणी तक का इकतरफा किराया 2400 रुपये तय किया गया है। हेलीकॉप्टर के टिकट के लिए ऑनलाइन बुकिंग कराई जा सकती है। जो हेलीकॉप्टर से अमरनाथ जाना चाहते हैं, उन्हें अलग से रजिस्ट्रेशन कराके यात्रा परमिट भी लेने की जरूरत नहीं है। हेलीकॉप्टर का टिकट उसके लिए पर्याप्त है।


पहलगाम और सोनमर्ग, दोनों ही स्थानों पर रुकने के लिए कई होटल व रिजॉर्ट हैं। वहीं, आगे यात्रा मार्ग पर यात्रियों के लिए कैंप व खाने-पीने के पर्याप्त इंतजाम होते हैं। मणिगाम, बालताल व पंजतरणी में डेढ़ सौ से लेकर पांच सौ रुपये तक में रुकने की सुविधा मिल जाती है। यात्रा के दौरान खच्चरों व पालकियों के रेट भी तय हैं। आपको बस मौसम व थकावट से जूझने के लिए उत्साह, जीवट, शारीरिक क्षमता और जरूरी कपड़े-दवाइयां चाहिए होते हैं।

साभार : दैनिक जागरण 

Monday, September 3, 2012

अद्भुत और निराली मां बावे वाली


सूर्य पुत्री तविषी (तवी) नदी के पुल से गुजरते हुए हर जम्मूवासी का सिर और पलकें एक पल के लिए झुक जाती हैं। यह पुल से गुजरने का भय नहीं, बल्कि सामने नजर आ रही बावे वाली माता के प्रति श्रद्धा है। उन्हें विश्वास है कि बावे वाली माता हर मुश्किल में उनकी रक्षा करेगी। देवी महाकाली संहार की देवी मानी जाती है, लेकिन जब मानव मात्र द्वारा उनकी आराधना की जाती है तो वे संहारिका से संरक्षिका की भूमिका में आ जाती हैं। ऐसी ही है जम्मू स्थित मां बावे वाली। तविषी नदी के पूर्वी तट पर जम्मू से तकरीबन दो किलोमीटर की दूरी पर बावे इलाके में स्थित होने के कारण इसे बावे वाली माता कहा जाता है। यह मंदिर ऐतिहासिक बाहु किले के भीतर स्थित है। जम्मू राज्य के संस्थापक रहे राजा जम्बूलोचन के बड़े भाई बाहुलोचन के नाम पर इस किले का नाम है। मान्यता है कि जम्मू राज्य को अपनी राजधानी बनाने के बाद जब राजा ने देवी की मूर्ति का मुंह अपने नए महल मुबारक मंडी की ओर करना चाहा, तो वे लगातार नाकाम रहे। अंत में उन्होंने हाथियों की सहायता से देवी शिला को हिलाना चाहा, परंतु जब भी हाथी उस शिला को खींचते तो वे दर्द से चिंघाड़ने लगते। अंत में यह फैसला हुआ कि शक्ति यहीं स्थापित रहेंगी। तब से आज तक शक्तिरूप में यही है जम्मू वासियों की आराध्या। बाहु किले के भीतर इस मंदिर की स्थापना वर्ष 1822 से बताई जाती है। मंदिर के भीतर स्थापित शिला आदि कालीन है, लेकिन इस मंदिर का निर्माण महाराजा गुलाब सिंह के समय का बताया जाता है। मंदिर उत्तरोतर विकास की ओर है। पर्यटकों की सुविधा को देखते हुए अब पूरा ट्रैक पक्का करवा दिया गया है। कई कमरे और नए मंदिर भी मंदिर प्रांगण में बना दिए गए हैं। परंतु विकास की धूल कुछ ऐतिहासिक तथ्यों को ढक भी रही है। आध्यात्मिक महत्व प्राचीन समय में वैष्णो देवी यात्रा केवल तीर्थ के तौर पर ही की जाती थी और इसका एक विशेष सर्किट होता था जिसकी शुरुआत नगरोटा स्थित कौल कंडोली मंदिर से होती थी। उसका अंत यहां बावे वाली माता मंदिर में होता था। वैष्णो देवी में मिलने वाले प्रसाद को जब बावे वाली माता मंदिर के प्रसाद के साथ मिलाया जाता था तभी उसे पूर्ण समझा जाता था। आज भी लोग बच्चों के मुंडन संस्कार और नव विवाहित जोड़ों को आशीर्वाद दिलवाने बावे वाली आते हैं। बलि का निराला अंदाज जम्मू-कश्मीर उन प्रगतिशील राज्यों में से है जो सुधारवादी फैसलों में अग्रणी रहा है। देश के अनेक शक्ति स्थलों की तरह यहां भी बलि प्रथा प्रचलित थी। लेकिन जिस बकरी को एक ही घाट पर शेर के साथ पानी पीते देख राजा जम्बूलोचन को अपनी राजधानी बसाने का ख्याल आया, उसी राज्य में बकरी की हत्या कैसे की जा सकती थी। इसलिए यहां बलि का एक अनूठा अंदाज अपनाया गया। बलि के लिए लाई गई बकरी को मंदिर के सामने निर्मित अहाते में बांध दिया जाता है और उस पर पानी के छींटे मारे जाते हैं। बकरी जब कंपकंपाकर अपने शरीर के बालों को झटकती है तो मान लिया जाता है कि देवी ने बलि स्वीकार कर ली। खास है मावे की बर्फी बावे वाली माता मंदिर के लिए प्रस्थान करते हुए आप देखेंगे कि दोनों और मावे की बर्फी की ढेरों दुकानें हैं। वास्तव में यही है बावे वाली माता के मंदिर का प्रसाद। मावे की यह बर्फी खुले बाजार में मिलने वाली बर्फी से बिल्कुल अलग है। इसे बनाने वाले भी खास है और बेचने वाले भी। शनि और मंगल को मेला बावे वाली माता मंदिर में दिन भर पर्यटकों और स्थानीय लोगों का तांता लगा रहता है, लेकिन यदि मंगलवार या शनिवार हो तब तो यह रौनक सुबह पांच बजे से ही शुरू हो जाती है। शहर के विभिन्न स्थानों से सुबह पांच बजे ही बावे के लिए मिनी बसें चलनी शुरू हो जाती हैं। इन दोनों दिन मंदिर में खास मेला लगता है। जिसमें झूले, खेल-खिलौने और लंगरों का भी आयोजन होता है। नवरात्र में तो यहां की रौनक देखते ही बनती है। माता के मंदिर तक जाने के लिए ड्योढ़ी से लेकर बाहु किले तक लगभग आधा किलोमीटर का पक्का ट्रैक बना हुआ है। जिसके दोनों और छोटी-छोटी दुकानें हैं। इनमें अधिकांश दुकानें प्रसाद की हैं। जबकि हर दस कदम पर आपको मेहंदी वाला और खिलौने वाला भी मिल जाएगा। इसी घुमावदार मिनी बाजार में आप जरूरत की लगभग हर चीज खरीद सकते हैं। स्वाद के चटखारे जम्मू की खास मानी जाने वाली कचालू की चाट यहां भी उपलब्ध है। इसके अलावा कुलचा छोले, कलाड़ी कुलचा, फ्रूट चाट, पूड़ी छोले सहित कई व्यंजनों का स्वाद यहां लिया जा सकता है। माता के दर्शन के बाद ड्योढ़ी से उतरते हुए यदि आप सामने नजर दौड़ाएं तो ढेरों की संख्या में आपको छोटे-छोटे खोमचे और रेहड़ी वाले नजर आ जाएंगें जिनके पास बर्गर, आइसक्रीम से लेकर गोल गप्पे तक का स्वाद मौजूद है। माता के दर्शन के बाद आप यहीं मुगल गार्डन और फिश एक्वेरियम का भी आनंद उठा सकते हैं। माता की ड्योढ़ी से नीचे उतरकर थोड़ी सी दूरी पर बाग-ए-बाहु मौजूद है। यहां आप सीढ़ीनुमा बाग, झरने और फव्वारों का भी आनंद ले सकते हैं। आपकी यादों को कैमरे में कैद करने के लिए फोटोग्राफर खुद आपको ढूंढ लेंगे। वहीं बाग के बिल्कुल साथ में उत्तर भारत का एकमात्र अंडरग्राउंड फिश एक्वेरियम है जहां अलग-अलग रंगों की दर्जनों प्रजाति की मछलियां देखी जा सकती हैं। पहुंचना है आसान बावे वाली माता मंदिर पहुंचने के लिए आपको शहर के किसी भी कोने से आराम से मिनी बस मिल जाएगी। शहर के किसी भी कोने से मंदिर पहुंचने के लिए एक व्यक्ति को मिनी बस में दस रुपये से अधिक नहीं खर्चने पड़ेंगे। लेकिन यदि आप मिनी बस की भीड़ में नहीं फंसना चाहते तो ऑटो रिक्शा और टैक्सी से भी पहुंचा जा सकता है। किले में चलती थी तोप वरिष्ठ लेखक केवल कृष्ण शाकिर कहते हैं पहले जब लोगों के पास घड़ी नहीं होती थी तब उन्हें समय की जानकारी देने के लिए इसी किले से तोप चलाई जाती थी। पहली तोप सुबह छह बजे लोगों को जगाने के लिए, दूसरी दोपहर के ठीक बारह बजे आधा दिन बीत जाने के बाद और तीसरी रात के दस बजे। इस तीसरी तोप के चलने के बाद जम्मू शहर के दरवाजे बंद हो जाया करते थे।

साभार : दैनिक जागरण

Tuesday, August 21, 2012

मचैल यात्रा, माँ चंडी देवी



Bhadarwah and Kishtwar in Jammu province are dotted with a number of famous pilgrimage sites. These sites attract thousands of people every year from all over the country.

यात्रा इस चिनोट मंदिर से शुरू होती हैं.
 
One such place which is thronged by devotees in large numbers is the shrine of Chandi Mata or Machail Wali Mata. “Chandi Mata” the goddess of benevolence showers blessing to all irrespective of caste, creed and colour. According to a legend, the Goddess Chandi appeared at Machail long years ago in the shape of Shila (Pindi). The mother came here from her ancient place Mindhal Battas (HP) to bless the simple, ignorant and helpless people of Paddar area. The Machail Yatra is a unique pilgrimage with unique features. Besides spiritual, its social aspect is more effective and impressive where the Goddess asks her devotees to shun social evils for the welfare of society and mankind as a whole.

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The Chandi Dham Machail has the distinction of the simultaneous appearance of Shiv and Shakti. On the one hand, the Goddess Chandi (Shakti) is blessing her devotees at Machail village while on the other hand God Mahadev Shiva appears on the opposite high mountain in the shape of lingam to provide darshans to the pilgrims on the pious occasion of the Shakti yatra. The mountain is called Shiv Pahad which often remains covered with black clouds. It is a unique union of Shiva and Shakti found at Machail.

मचैल गाव

The holy shrine of the Goddess Chandi is situated at a height of over 8,000 feet above the sea level in Machail village surrounded by high mountains, thick devdar forests and attractive meadows and world famous sapphire mines. The most attractive and historical lion astride idols of the Goddess Chandi and Lakshmi Ji made of pure silver are the rare sight and source of inspiration for the pilgrims who come to seek blessing of Mataji. The most important and impressive aspect of the Machail Yatra is the unique holy mace of the Goddess which leads the then pilgrims and provides strength and inspiration enroute.
 

The miraculous Machail Yatra to the hilly area of Paddar in district Kishtwar, is really a boon for the people who seek blessing of “Mata Chandi”. The pilgrimage has revolutionized the action and thoughts of the general public having faith upon the divine mother. The popular Machail Yatra has its historical, religious importance. To pay obeisance, everyyear devotees participate in annual Machail Yatra which starts from Jammu.

 

In Jammu, she has her origin in Mahalaxmi Mandir at Pacca Danga and thence at Bhaderwah where from her “Chhari or Holy Mace” starts in the month of August every year. The yatra starts with religious procession ” which is taken out from Mahalaxmi Mandir and passes through Jain Bazaar, Link Road, Purani Mandi, City Chowk, Raghunath Bazaar and Indira Chowk in the City of Temples and then joins the main yatra at Chinote.

 

Situated around 306 kms away from Jammu, the Yatra passes through Jammu, Udhampur, Batote, Kishtwar, Atholi and Gulabgarh road and thence on foot to Machail Mata which is about 30 kms. Though the terrain is too tough to trek but with the grace of Mata Chandi, one feels hillbilly joyous in association with enchanting pilgrims echoing “Jai Mata Di, Jai Chandi Maa, Machail Wali Mata Ki Jai, etc.”
 
The main stop over or reception stations over en-route are Bhala, Puddoda, Premnagar, Thathri, Kistwar, Paddar, Massu, Chishoti, Atholi Gulabgarh, Layondee, S Kunderpul, Chishoti, Hamooree and thence Machail Mata’s sacred temple. Through out the route religious congregation and Bhandaras are organized to high ligh the importance of the yatra.



"Earlier, the yatra used to reach its destination Chandi Dham Machail, on the eve of a local festival called 'Naghui' when doors of the historical Chandi temple were thrown open for Darshan of the Goddess after remaining closed throughout the year as per ancient tradition and faith. On the occasion, the local populace including Buddhist Clad in multi colour traditional dresses greet the holymace and the pilgrims with enthusiasm. The devotional songs and holy couplets sung and chanted in local Padhri language surcharge the holy dances throughout the day. Besides Sankirtan, Karsewa, havna are also performed by the devotees for peace and satisfaction of the ultra modern society which is full of tension today.

The temple is open round the year. But Chhadi Yatra is organised in the month of August every year. Thousands of people visit the shrine during this period.
Helicopter service to Machel is available from Jammu and the base camp Gulabgarh during this period.
The best time for pilgrimage is during the Chhadi yatra.
It is advised not to trek in the month of December, January and February due to heavy snowfall.
During Chadi Yatra, the Government of Jammu & Kashmir provides tents, medicines and other basic amenties. Many Langers are also arranged roadside to provide free food for the pilgrims.
Upon reaching the shrine, the pilgrims pray the Maa Durga and have an extraordinary spiritual experience.
Many stories of supernatural happennings are heard from the pilgrims. Maataji blesses the people who come to the shrine with pure heart and devotion.
The Machail Yatra has strengthened the spirit of religious tolerance, bonds of secularism and mutual brotherhood among the masses which is apparent from the fact that even our Muslim brothers greet the Yatra with due respect where-ever it passes, through their habitations.

Machel Mata Shrine
PO Gulabgarh,
Distt. Kishtwar,
Jammu & Kashmir (India)
Directions from Jammu:

Located at 33.42N, 76.34E, this place is towards North-East of the Jammu city. The base camp Gulabgarh can be reached by road from Jammu. Gulabgarh is about 290 KMs from Jammu. From Gulabgrah one has to trek for 32 KMs to reach the Maa Chandi Shrine in Machel. The journey is a nice experience.
Helicopter service is available in the month of August only. जय मचैला वाली माता.



साभार : जय माँ चंडी दर्शनी भवन.

Wednesday, June 20, 2012

माँ वैष्णो देवी धाम


33 करोड़ देवी-देवता भी करते हैं मां वैष्णो की उपासना



33 करोड़ देवी-देवता भी करते हैं मां वैष्णो की उपासना

जम्मू से 45 मील दूर उत्तर-पश्चिम से शतशृंग नामक पर्वत है। कटरा नगर इस पर्वत के चरणों में बसा हुआ है। इस पर्वत के मध्यभाग में माता वैष्णो की पवित्र गुफा है। यह जम्मू के ऊधमपुर मंडल के अंतर्गत चिडि़आई नामक  गांव से लेकर रियासी तक लगभग मीलों तक फैली हुई तहदार चट्टान में बनी हुई है। जब माता वैष्णो आदि कुमारी स्थान से महिषासुर का पीछा करती हुई इस स्थान पर पहुंचीं तो गुफा के बाहर महिषासुर का संहार करने के उपरांत उन्होंने इसी गुफा में तप करने का निर्णय किया था।

प्राकृतिक शिलाखंड पर उभरी तीन पिंडियां हैं, दक्षिण भाग में महासरस्वती की, मध्य में वैष्णवी की तथा वामभाग में महाकाली की। मूल पराशक्ति एक है, अत: यह पिंडी भी मूल से एक ही है और लगभग पांच-छ: फुट लम्बी है। ऊपर आकर इसी पिंडी के तीन अलग-अलग  रूप हो गए हैं। ये तीनों पिंडियां सोने के पत्रों से मण्डित हैं। सबके सिर पर सोने के मुकुट और सोने के छत्र शोभायमान हैं। इन तीन  पिंडियों की पृष्ठभूमि में इन्हीं देवियों की साकार मूर्तियां स्थापित हैं।

मध्यवर्ती पिंडी माता महालक्ष्मी की है। महालक्ष्मी विष्णु की शक्ति है और इनका दूसरा नाम  वैष्णवी है। यह वैष्णवी पराशक्ति हैं।

शास्त्रों के अनुसार जो परमशुद्ध सत्स्वरूपा हैं, उनका नाम महालक्ष्मी है, परम परमात्मा श्रीहरि की वह शक्ति हैं हजार पंखुडिय़ों वाला कमल उनका आसन है। इनके मुख की शोभा तपे हुए स्वर्ण के समान है। इनका रूप करोड़ों चंद्रमाओं की कांति से सम्पन्न है। सम्पत्तियों की ईश्वरी होने के कारण अपने सेवकों को यह धन, ऐश्वर्य, सुख, सिद्धि और मोक्ष प्रदान करती हैं।

यह शक्ति सबकी कारण रूप हैं। सर्वोच्च पतिव्रता हैं और वैकुंठ लोक में अपने स्वामी श्री हरि की सेवा में लीन रहती हैं। गुफा में  दूसरी पिंडी माता महाकाली की है। महाकाली महाशक्ति का प्रधान अंश है। शुंभ और निशुंभ से होने वाले महासमर के समय यह भगवती दुर्गा के ललाट से प्रकट हुई थीं। इन्हें भगवती दुर्गा का आधा अंश माना जाता है। गुण और तेज में यह दुर्गा के समान ही हैं। इनका अत्यंत शक्तिशाली शरीर करोड़ों सूर्यों के समान तेजस्वी है।

सम्पूर्ण शक्तियों में ये प्रमुख हैं।  यह परम योग स्वरूपिणी सम्पूर्ण सिद्धि प्रदान करने वाली हैं। श्री हरि की वह अनन्य भक्त हैं। तेज, पराक्रम और गुण में ये श्री हरि के तुल्य हैं। इनके शरीर का रंग काला है और इतनी शक्तिशाली हैं कि यदि यह चाहें तो एक ही सांस में सारे विश्व को नष्ट कर सकती हैं। जो भी मनुष्य महाकाली भगवती की पूजा करता है उसे धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष तथा अन्य सांसारिक सम्पत्तियां प्राप्त होती हैं। ब्रह्म, देवता, मुनिगण और मानव सब इनकी उपासना करते हैं।

इनका एक प्रसिद्ध नाम चामुंडा है। इन्होंने असुरों के साथ होने वाले युद्ध में चण्ड-मुण्ड  नामक दो महाअसुरों का संहार किया था, अत: इनको  चामुंडा भी कहा जाने लगा। मधु-कैटभ द्वारा संकटग्रस्त होने पर इन्होंने ब्रह्मा और विष्णु को भयमुक्त किया था। इनकी कृपा से मानव निर्भय हो जाता है। युद्ध में उसे कोई पराजित नहीं कर सकता।

गुफा में तीसरी पिंडी महासरस्वती की है। महाशक्ति के तीसरे प्रमुख रूप का नाम महासरस्वती है। पारब्रह्म परमात्मा से संबंध रचाने वाली वाणी की अधिष्ठात्री, कवियों की इष्टदेवी, शुद्ध सत्यस्वरूपा और शांत रूपिणी हैं। वाणी, विद्या, बुद्धि और ज्ञान को प्रदान करने वाली यही देवी हैं। वाणी में श्रेष्ठता, विद्याओं और कलाओं में निपुणता, बुद्धि में विलक्षणता के लिए इनकी कृपा आवश्यक है।मां सरस्वती का शरीर अत्यंत गौर वर्ण का है। वह अत्यंत सुंदर और तेजस्वी हैं। इनका शरीर तेज की आभा से इतना कांतिमान रहता है कि करोड़ों चंद्रमाओं की आभा भी उनके सामने तुच्छ प्रतीत होती है।

इनकी कृपा से शास्त्र और ज्ञान संबंधी सभी भ्रम और संदेह मिट जाते हैं। मानव को स्मरण शक्ति प्रदान करने वाली माता सरस्वती को स्मृति शक्ति, ज्ञान शक्ति और बुद्धि शक्ति कहा गया है। प्रतिभा और कल्पना शक्ति भी यही हैं। इनकी मूर्ति तपोमयी है तपस्या करने वाले अपने भक्त को यह तत्काल फल प्रदान करती हैं। सिद्धि विद्या स्वरूपिणी होने के कारण वह सिद्धि देने वाली हैं।
यात्रा कथा
पवित्र गुफा लगभग 98 फुट लम्बी है। गुफा के भीतर व बाहर कई अन्य सांकेतिक दर्शन भी हैं। मान्यता है कि सभी 33 करोड़ देवी-देवताओं ने इस गुफा में किसी न किसी समय माता की उपासना की है व अपने चिन्ह छोड़े हैं। यह भी माना जाता है कि प्रात: व सायंकालीन पूजन व आरती के समय देवी-देवता पवित्र गुफा में माता की वंदना हेतु आते हैं। गुफा के मुख पर बाएं हाथ की ओर वक्रतुंड श्री गणेश के दर्शन हैं। समीप ही सूर्य व चंद्रदेव के चिन्ह हैं। गुफा में प्रवेश करते ही भैरों नाथ का शिला रूपी धड़ आता है। भैरों नाथ के धड़ के पश्चात श्री हनुमान के दर्शन होते हैं व उसी स्थान पर माता के पावन चरणों से होकर आती चरण गंगा कलकल बहती है।

इस स्थान के बाद यात्री को इसी चरणगंगा के जल में से होकर आगे बढऩा होता है जहां से 23 फुट की दूरी पर बाएं हाथ पर ऊपर की ओर गुफा की छत मानो शेषनाग के असंख्य फनों पर टिकी नजर आती है। शेषनाग के फन के नीचे माता का हवन कुंड व उसके पास माता के शंख, चक्र, गदा व पद्म के चिन्ह हैं। उसके ऊपर गुफा की छत को छूते हुए पांच पांडव, सप्त ऋषि, कामधेनु के थन, ब्रह्मा, विष्णु, महेश व शिव पार्वती के चिन्ह हैं।  

साभार : पंजाब केसरी 

चलो बाबा बर्फानी के द्वार

चलो बाबा बर्फानी के द्वार



आदि देव महादेव स्वयंभू पशुपति नीलकंठ भगवान आशुतोष शंकर भोले भंडारी को सहस्त्रों नामों से स्तुति कर पुकारा जाता है। शास्त्रों में जगह-जगह पर भगवान शिव के महात्म्य का वर्णन मिलता है। ऋग्वेद में भी शिवजी का गुणगान मिलता है।
    
 श्री अमरनाथ धाम एक ऐसा शिव धाम है जिसके संबंध में मान्यता है कि भगवान शिव साक्षात श्री अमरनाथ गुफा में विराजमान रहते हैं। 

धार्मिक व ऐतिहासिक दृष्टिïकोण से अति महत्वपूर्ण श्री अमरनाथ यात्रा को कुछ शिव भक्त स्वर्ग की प्राप्ति का माध्यम बताते हैं तो कुछ लोग मोक्ष प्राप्ति का। श्री अमरनाथ यात्रा हमारी धर्मनिरपेक्षता, राष्टï्रीय एकता व राष्टï्रीय अस्मिता की प्रतीक है। 

पावन गुफा में बर्फीली बूंदों से बनने  वाला हिमशिवलिंग ऐसा दैवी चमत्कार  है जिसे देखने के लिए हर कोई लालायित रहता है। भारत के कोने-कोने से और विदेशों से असंख्य शिव भक्त लगभग 14 हजार फुट की ऊंचाई पर स्थित श्री अमरनाथ की गुफा में प्रकृति के इस चमत्कार के दर्शन करने के लिए अनेकों बाधाएं पार करके भी पहुंचते हैं।

श्री अमरनाथ गुफा में स्थित पार्वती पीठ 51 शक्तिपीठों में से एक है। मान्यता है कि यहां भगवती सती का कंठ भाग गिरा था। कश्मीर घाटी में स्थित पावन श्री अमरनाथ गुफा प्राकृतिक है। यह पावन गुफा लगभग160 फुट लम्बी, 100 फुट चौड़ी और काफी ऊंची है।

कश्मीर में वैसे तो 45 शिव धाम, 60 विष्णु धाम, 3 ब्रह्मïा धाम, 22 शक्ति धाम, 700 नाग धाम तथा असंख्य तीर्थ हैं परन्तु अति उत्तम तीर्थों में श्री अमरनाथ धाम का ही महात्म्य अधिक है। काशी में लिंग दर्शन एवं पूजन से दस गुणा, प्रयाग से सौ गुणा, नैमिषारण्य तथा कुरुक्षेत्र से हजार गुणा फल देने वाला श्री अमरनाथ स्वामी का पूजन है। देवताओं की हजार वर्ष तक स्वर्ण पुष्प मोती एवं पट्टï वस्त्रों से पूजा का जो फल मिलता है, वह श्री अमरनाथ की रसलिंग पूजा से एक ही दिन में प्राप्त हो जाता है। 

श्री अमरनाथ गुफा में शिव भक्त प्राकृतिक हिमशिवलिंग के साथ-साथ बर्फ से ही बनने वाले प्राकृतिक शेषनाग, श्री गणेश पीठ व माता पार्वती पीठ के भी दर्शन करते हैं। प्राकृतिक रूप से प्रति वर्ष बनने वाले हिमशिवलिंग में इतनी अधिक चमक विद्यमान होती है कि देखने वालों की आंखों को चकाचौंध कर देती है। हिमशिवलिंग पक्की बर्फ का बनता है जबकि गुफा के बाहर मीलों तक सर्वत्र कच्ची बर्फ ही देखने को मिलती है। मान्यता यह भी है कि गुफा के ऊपर पर्वत पर श्री राम कुंड है। भगवान शिव ने माता पार्वती को सृष्टिï की रचना इसी अमरनाथ गुफा में सुनाई थी।

गुफा की खोज  

इस गुफा की खोज बूटा मलिक नामक एक बहुत ही नेक और दयालु एक मुसलमान गडरिए ने की थी। वह एक दिन भेड़ें चराते-चराते बहुत दूर निकल गया। एक जंगल में पहुंचकर उसकी एक साधू से भेंट हो गई। साधू ने बूटा मलिक को कोयले से भरी एक कांगड़ी दे दी। घर पहुंचकर उसने कोयले की जगह सोना पाया तो वह बहुत हैरान हुआ। उसी समय वह साधू का धन्यवाद करने के लिए गया परन्तु वहां साधू को न पाकर एक विशाल गुफा को देखा। उसी दिन से यह स्थान एक तीर्थ बन गया।
 

गुफा से जुड़े रहस्य 

एक बार देवर्षि नारद कैलाश पर्वत पर भगवान शंकर के दर्शनार्थ पधारे। भगवान शंकर उस समय वन विहार को गए हुए थे और पार्वती जी वहां विराजमान थीं। पार्वती जी ने देवर्षि के आने का कारण पूछा तो उन्होंने कहा-देवी! भगवान शंकर, जो हम दोनों से बड़े हैं, के गले में मुंडमाला क्यों है? भगवान शंकर के वहां आने पर यही प्रश्र पार्वती जी ने उनसे किया। भगवान शंकर ने कहा-हे पार्वती! जितनी बार तुम्हारा जन्म हुआ है, उतने ही मुंड मैंने धारण किए हैं।

पार्वती जी बोलीं- मेरा शरीर नाशवान है, मृत्यु को प्राप्त होता है परन्तु आप अमर हैं, इसका कारण बताने का कष्ट करें। भगवान शंकर ने कहा -यह सब अमरकथा के कारण है। इस पर पार्वती जी के हृदय में भी अमरत्व प्राप्त करने की भावना पैदा हो गई और वह भगवान से कथा सुनाने का आग्रह करने लगीं। भगवान शंकर ने बहुत वर्षों तक टालने का प्रयत्न किया परन्तु अंतत: उन्हें अमरकथा सुनाने को बाध्य होना पड़ा। अमरकथा सुनाने के लिए समस्या यह थी कि कोई अन्य जीव उस कथा को न सुने। इसलिए शिव जी पांच तत्वों (पृथ्वी, जल, वायु, आकाश और अग्रि) का परित्याग करके इन पर्वत मालाओं में पहुंच गए और श्री अमरनाथ गुफा में पार्वती जी को अमरकथा सुनाई।

श्री अमरकथा गुफा की ओर जाते हुए वह सर्वप्रथम पहलगाम पहुंचे, जहां उन्होंने अपने नंदी (बैल) का परित्याग किया। तत्पश्चात चंदनबाड़ी में अपनी जटा से चंद्रमा को मुक्त किया। शेषनाग नामक झील पर पहुंच कर उन्होंने गले से सर्पों को भी उतार दिया। प्रिय पुत्र श्री गणेश जी को भी उन्होंने महागुणस पर्वत पर छोड़ देने  का निश्चय किया। फिर पंचतरणी नामक स्थान पर पहुंच कर शिव भगवान ने पांचों तत्वों का परित्याग किया।

इसके पश्चात ऐसी मान्यता है कि शिव-पार्वती ने इस पर्वत शृंखला में तांडव किया था। तांडव नृत्य वास्तव में सृष्टिï के त्याग का प्रतीक माना गया। सब कुछ छोड़ अंत में भगवान शिव ने इस गुफा में प्रवेश किया और पार्वती जी को अमरकथा सुनाई।किंवदंती के अनुसार रक्षा बंधन की पूर्णिमा के  दिन जो सामान्यत: अगस्त मास के मध्य में पड़ती है, भगवान शंकर स्वयं श्री अमरनाथ गुफा में पधारते हैं। ऐसा भी ग्रंथों में लिखा मिलता है कि भगवान शिव इस गुफा में पहले पहल श्रावण की पूर्णिमा को आए थे इसलिए उस दिन को श्री अमरनाथ की यात्रा को विशेष महत्व मिला। रक्षा बंधन की पूर्णिमा के दिन ही छड़ी मुबारक भी गुफा में बने हिमशिवलिंग के पास स्थापित कर दी जाती है।

श्री अमरनाथ गुफा में बर्फ से बने शिवलिंग की पूजा होती है। इस सम्बन्ध में अमरेश महादेव की कथा भी मशहूर है। इसके अनुसार आदिकाल में ब्रह्म, प्रकृति, अहंकार, स्थावर (पर्वतादि) जंगल (मनुष्य) संसार की उत्पत्ति हुई। इस क्रमानुसार देवता, ऋषि, पितर, गंधर्व, राक्षस, सर्प, यक्ष, भूतगण, दानव आदि की उत्पत्ति हुई।

इस तरह नए प्रकार के भूतों की सृष्टिï हुई परन्तु इंद्रादि देवता सहित सभी मृत्यु के वश में हुए थे। देवता भगवान सदाशिव के पास आए क्योंकि उन्हें मृत्यु का भय था। भय से त्रस्त सभी देवताओं ने भगवान भोलेनाथ की स्तुति कर मृत्यु बाधा से मुक्ति का उपाय पूछा। भोलेनाथ स्वामी बोले-मैं आप लोगों की मृत्यु के भय से रक्षा करूंगा। कहते हुए सदाशिव ने अपने सिर पर से चंद्रमा की कला को उतार कर निचोड़ा और देवगणों से बोले, यह आप लोगों के मृत्युरोग की औषधि है।

उस चंद्रकला के निचोडऩे से पवित्र अमृत की धारा बह निकली। चंद्रकला को निचोड़ते समय भगवान सदाशिव के शरीर से अमृत बिंबदु पृथ्वी पर गिर कर सूख गए। पावन गुफा में जो भस्म है, वह इसी अमृत ङ्क्षबदु के कण है। सदाशिव भगवान देवताओं पर प्रेम न्यौछावर करते समय स्वयं द्रवीभूत हो गए और देवताओं से कहा-देवताओ! आपने मेरा बर्फ का लिंग शरीर इस गुफा में देखा है। इस कारण मेरी कृपा से आप लोगों को मृत्यु का भय नहीं रहेगा।

अब आप यहीं अमर होकर शिव रूप को प्राप्त हो जाएं। आज से मेरा यह अनादि लिंग शरीर तीनों लोकों में अमरेश के नाम से विख्यात होगा। भगवान सदाशिव देवताओं को ऐसा वर देकर उस दिन से लीन होकर गुफा में रहने लगे। भगवान सदाशिव महाराज ने देवताओं की मृत्यु का नाश किया, इसलिए तभी से उनका नाम अमरेश्वर प्रसिद्ध हुआ है।

मनुष्य श्री अमरनाथ जी की यात्रा करके शुद्धि को प्राप्त करता है तथा शिवलिंग के दर्शनों से भीतर-बाहर से शुद्ध होकर धर्म, अर्थ, काम वचन तथा मोक्ष को प्राप्त करने में समर्थ हो जाता है। अमरनाथ धाम पहुंचना सौभाग्य की बात है। वहां भगवान शिव के दर्शन करने से सर्वसुख की प्राप्ति होती है। बाबा बर्फानी की गुफा में प्रवेश करके भगवान शिव की साक्षात उपस्थिति का एहसास होता है।

साभार : पंजाब केसरी