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Monday, March 2, 2015

SHEETLA MATA MANDIR, GURGAO - शीतला माता मन्दिर- गुड़गाँव

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शीतला का मन्दिर गुड़गाँव, हरियाणा में स्थित है। 'नवरात्रि' के पावन दिनों में शीतला माता के मन्दिर में भक्तों की भीड़ काफ़ी बढ़ जाती है। देश के सभी प्रदेशों से श्रद्धालु यहाँ मन्नत माँगने आते हैं। मन्दिर देश भर के श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है। यहाँ वर्ष में दो बार एक-एक माह का मेला लगता है।नवरात्रि में शीतला माता के दर्शन के लिए कई प्रदेशों से लाखों की तादाद में श्रद्धालु गुड़गाँव पहुँचते हैं।

गुड़गाँव के शीतला माता मन्दिर की कहानी महाभारत काल से जुड़ी हुई है। कहा जाता है कि महाभारत काल में यहाँ आचार्य द्रोणाचार्य कौरवों और पाण्डवों को अस्त्र-शस्त्र आदि का प्रशिक्षण देते थे। कहते हैं कि जब गुरु द्रोण महाभारत के युद्ध में द्रुपद पुत्र धृष्टद्युम्न द्वारा वीरगति को प्राप्त हुए, तो उनकी पत्नी कृपि अपने पति के साथ सती होने के लिए तैयार हुई। कृपि महर्षि शरद्वान की पुत्री तथा कृपाचार्य की बहन थी। जब कृपि ने 16 शृंगार कर सती होने की प्रथा निभाने के लिए अपने पति की चिता पर बैठना चाहा, तो लोगों ने उनको सती होने से रोका; लेकिन माता कृपि सती होने का निश्चय करके अपने पति की चिता पर बैठ गईं। उन्होंने लोगों को आशीर्वाद दिया कि मेरे इस सती स्थल पर जो भी अपनी मनोकामना लेकर पहुँचेगा, उसकी मनोकामना अवश्य पूर्ण होगी।

सन 1650 में महाराजा भरतपुर ने गुड़गाँव में जहाँ माता कृपि सती हुई थीं, मन्दिर बनवाया और सवा किलो सोने की माता कृपि की मूर्ति बनवाकर वहाँ स्थापित की। इस मन्दिर में आज भी भारत के कोने-कोने से लाखों की संख्या में भक्त स्त्री-पुरुष अपनी मनोकामना की पूर्ति के लिए आते हैं। चैत्र मास के नवरात्रों, वैशाख और आषाढ़ के सम्पूर्ण मास तथा आश्विन के नवरात्रों में भारी मेला लगता है, जिसमें कम से कम 50 लाख यात्री दर्शनाथ आते है।लगभग 500 सालों से यह मन्दिर लोगों की आस्था का केंद्र बना हुआ है। यहाँ पर देश के कोने-कोने से लोग पूजा-पाठ के लिए आते हैं। लोगों की मान्यता है कि यहाँ पूजा करने से शरीर पर निकलने वाले दाने, जिन्हें स्थानीय बोलचाल की भाषा में 'माता' और विज्ञान में चेचक कहा जाता है, नहीं निकलते हैं। इसके अलावा नवजात शिशुओं के बालों का प्रथम मुंडन भी यहाँ पर कराते है।
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Thursday, July 11, 2013

SINDHUVAN - सिंधुवन में बद्री-केदार की महिमा अपार


सिंधुवन में बद्री-केदार की महिमा अपार





यमुनानगर जिले के कपाल मोचन से करीब 15 किलोमीटर व बिलासपुर गांव से लगभग 20 किलोमीटर की दूरी पर हिमालय की शिवालिक की पहाड़ियों के बीच सिंधुवन में स्थित आदिबद्री नाम से प्रसिद्ध ऐतिहासिक धार्मिक स्थल को भगवान बद्रीनाथ के प्राचीन निवास स्थान और सरस्वती नदी के उद्गम स्थल के रूप में जाना जाता है।

अधिकतर श्रद्धालु मानते हैं कि हिमालय में तपस्या करने से पूर्व भगवान विष्णु ने सिंधुवन में सरस्वती नदी के उद्गम स्थल पर तप किया था। इसीलिए इस स्थान को आदिबद्री नाम से जाना जाता है। यहीं पर भगवान केदारनाथ का मंदिर भी स्थित है जो उत्तराखंड के दुर्गम रास्तों में स्थित बद्रीनाथ और केदारनाथ धाम की यात्रा करने की तरह पुण्य फल प्रदान करते हैं। चार धामों के रूप में माने जाने वाले इस ऐतिहासिक धार्मिक स्थल पर सरस्वती नदी के उत्तरी तट पर श्री आदिबद्री नारायण नाम से भगवान बद्रीनाथ का प्राचीन मंदिर स्थित है तो दक्षिण दिशा में भगवान केदारनाथ का, पूर्व में माता मंत्रा देवी व पश्चिम में मां सरस्वती कुंड है। प्राकृतिक सौंदर्य से सराबोर यह धार्मिक स्थल अनेक वर्षो से श्रद्धालुओं की आस्था व अटूट विश्वास का प्रतीक बना हुआ है। यहां पर स्थित केदारनाथ मंदिर में स्थापित शिवलिंग व मंदिर के बाहर नंदी की प्रतिमा हर श्रद्धालु को आस्थामय कर देते हैं। यहां पर हर रविवार और सावन मास में प्राचीन शिवलिंग के दर्शन कर मन्नतें मांगने के लिए भक्तों का तांता लगा रहता है। यहां कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी से लेकर पूर्णमासी तक और अक्षय तृतीया तक वर्ष में दो बार मेला भी लगता है। हर रविवार को यहां पर भक्तों द्वारा भंडारा भी लगाया जाता है।

यहां पर स्थित केदारनाथ मंदिर के पुजारी कृपा शंकर का कहना है कि इस प्राचीन मंदिर को आदिगुरु शंकराचार्य ने स्थापित किया था। सरस्वती नदी के उत्तरी तट पर स्थित भगवान बद्रीनाथ के श्री आदिबद्री नारायण मंदिर में चार भुजाओं वाली तप की मुद्रा में भगवान विष्णु की प्रतिमा हर श्रद्धालु को सहज ही आकर्षित कर लेती है। आदिबद्री नारायण मंदिर के पुजारी देवकीनंदन शास्त्री का कहना है कि भगवान बद्रीनाथ ने हिमालय प्रस्थान से पहले इसी स्थान पर तप किया था जिस कारण इस स्थान को आदिबद्री नाम से जाना जाता है। पृथ्वी पर भगवान विष्णु के तप करने के दौरान माता लक्ष्मी ने बेरी के पेड़ के रूप में प्रकट रहकर विष्णु को छाया व रक्षा प्रदान की थी। लक्ष्मी बद्री रूप में थी तो यज्ञ की सफलता के लिए उन्होंने मंत्रों से मां मंत्रा को प्रकट किया। श्री आदिबद्री नारायण मंदिर से काफी ऊंचाई पर संपूर्ण विश्व में मंत्रों द्वारा उत्पन्न एकमात्र माता मंत्रा देवी का मंदिर पिंडी रूप में पहाड़ी की चोटी पर स्थित है। पुजारी का कहना है कि आदिबद्री का अर्थ ही प्राचीन बेरी का पेड़ है जिनको इसी स्थान पर पहाड़ी पर स्थापित किया गया है। करीब तीन किलोमीटर की चढ़ाई के बाद हिमाचल के सिरमौर जिले व यमुनानगर की सीमा रेखा पर स्थित मंत्रा देवी के मंदिर में भी हर श्रद्धालु बड़ी आस्था से पहुंचता है। माना जाता है कि इसी स्थान पर भगवान विष्णु ने हिमालय प्रस्थान से पहले तप किया था। इसीलिए यमुनानगर के इस आदिबद्री नामक ऐतिहासिक धार्मिक स्थल को बद्रीनाथ धाम से भी प्राचीन माना जाता है। इसी स्थान के पास बाबा गोरखनाथ की इष्ट रणचंडी के रूप में प्रचलित गोशाला भी है जो भक्तों के कष्टों को हर लेती है। यहां पर अष्टबसु धारा से आठ अलग-अलग स्वादों में जल प्रवाहित होता है। भारतवर्ष में प्रथम प्रयोगात्मक वनस्पति यज्ञशाला भी यहां स्थित है। सरस्वती नदी के उद्गम स्थल के दर्शनों के लिए यहां अनेक श्रद्धालु तो आते ही रहते हैं, पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल कलाम भी यहां पर आ चुके हैं। उद्गम स्थल से निकले पुरातन अवशेष भी यहां पर संग्रहीत किए गए हैं। इस सिंधुवन क्षेत्र में भगवान बद्रीनाथ व केदारनाथ की अपार महिमा दिखाई देती है।

साभार : दैनिक जागरण 

Wednesday, December 19, 2012

श्री गीता जी की जन्मस्थली ज्योतिसर





कुरुक्षेत्र की रणभूमि में जहां पर गोविंद ने अपने मोहग्रस्त सखा पार्थ (अर्जुन) को गीता ज्ञान प्रदान करके अपने विराट रूप के दर्शन करवाए वह स्थान आज भी ज्योतिसर के नाम से जाना जाता है। ज्योतिसर अर्थात् प्रकाश का सरोवर। वह ज्ञान रूपी प्रकाश जो श्री गीता जी के माध्यम से मनुष्य सभ्यता को प्राप्त हुआ। हरियाण प्रदेश के कुरुक्षेत्र नगर से लगभग आठ कि.मी. की दूरी पर पेहवा मार्ग पर विराजमान यह तीर्थ भारत के प्रमुख तीर्थों में सम्मिलित है। शांत व सुरम्य वातावरण से परिपूर्ण इस तीर्थ की परिधि में प्रवेश करते ही अद्भुत मानसिक शांति का अनुभव होता है। उस पवित्र अक्षय वट के दर्शनों से, जिसके नीचे प्रभु ने अर्जुन को कर्म का पाठ पढ़ाया था, ऐसा प्रतीत होता है जैसे हम उन्हीं क्षणों के साक्षी बन गए हों। मूलत: यह स्थान सरस्वती नदी के तट पर स्थित है जो अब यहां लुप्त अवस्था में बहती है। तीर्थ में एक प्राचीन सरोवर के तट पर ही वह स्थान है जहां अक्षय वट के नीचे भगवान ने अर्जुन को गीता जी का ज्ञान प्रदान किया था। यहां के वातावरण में प्रवेश करते ही आध्यात्मिक तरंगें हर जन को पवित्रता के पाश में जैसे बांध लेती हैं। ऐसा आभास होता है कि जैसे आज भी श्री गीता जी का संदेश यहां के वायुमंडल से प्रस्फुटित हो रहा हो। अपने उद्भव के समय से ही यह स्थान भारत वर्ष में पैदा हुए विभिन्न महान संतों , ज्ञानियों व तपस्वियों के आकर्षण का केन्द्र रहा है। अपनी आध्यात्मिक पिपासा को शांत करने के लिए वे विभिन्न कालों में यहां पधारते रहे हैं। आदि शंकराचार्य का भी गीता जी के मनन व चिंतन के लिए यहां आगमन हुआ था। पूर्व में कई शासकों ने यहां श्रद्धापूर्वक निर्माण कार्य करवाए परन्तु विदेशी आक्रमणकारियों की संकुचित सोच के चलते कुछ भी शेष न रहा। वर्तमान में मंदिर प्रांगण में एक शिव मंदिर के अवशेष विद्यमान हैं जिसके संदर्भ में कहा जाता है कि कश्मीर के राजा ने इसका निर्माण करवाया। कांची कामकोटि पीठ के शंकराचार्य के प्रयासों से वर्ष 1967 में अक्षय वृक्ष के निकट एक सुंदर कृष्ण-अर्जुन रथ का निर्माण किया गया तथा साथ ही शंकराचार्य मंदिर का भी निर्माण हुआ। 

आज मंदिर परिसर में कई छोटे-छोटे मंदिर स्थापित हैं जहां विभिन्न देवी-देवताओं के दर्शन किये जा सकते हैं। इसके अतिरिक्त महाभारत के विभिन्न पात्रों को लेकर बनाई गई झांकियां भी दर्शनीय हैं। इस तीर्थ की व्यवस्था कुरुक्षेत्र विकास बोर्ड के हाथों में है जिसने इस तीर्थ के समुचित विकास के लिए पिछले कुछ वर्षों में सराहनीय कार्य किया है। सरोवर को पक्का करवाने के साथ-साथ सुंदर मुख्य द्वार व हरियाली युक्त बगीचों का निर्माण हुआ है। ऐसी व्यवस्था की गई है कि सरोवर को मुख्य बड़ी नहर से ताजा पानी प्राप्त होता रहे। पूरे प्रांगण में संगमरमर तथा अन्य पत्थर लगाकर सफाई व सौंदर्य का उचित प्रबन्ध किया गया है। अक्षय वट के चारों ओर सुंदर चबूतरे का निर्माण करके तीर्थ की गरिमा बनाई रखी गई है। कई अन्य प्राचीन वृक्षों का भी संरक्षण किया गया है। संध्या के समय ध्वनि व प्रकाश कार्यक्रम के माध्यम से गीता उपदेश व महाभारत के प्रसंगों को पूरे प्रांगण में जीवंत किया जाता है। एक घंटे के इस कार्यक्रम का आयोजन रोज होता है जिसे देखने के लिए दूर-दूर से लोग आते हैं। प्रत्येक वर्ष शीत ऋतु के समय मार्गशीर्ष मास में शुक्ल पक्ष की एकादशी अर्थात् श्री गीता जयन्ती के दिन कुरुक्षेत्र उत्सव का आयोजन किया जाता है। यह उत्सव लगभग एक सप्ताह तक चलता है, जिसमें देश के विख्यात कलाकार अपनी-अपनी कला का प्रदर्शन करते हैं। लगभग प्रत्येक प्रदेश के हस्तशिल्पी अपनी-अपनी कृतियों की बिक्री के लिए कुरुक्षेत्र में जुटते हैं। राज्य सरकार ने इस मेले को राज्यस्तरीय दर्जा दे रखा है। कुल मिला कर श्री गीता जी के जन्मोत्सव को यहां धूमधाम से मनाया जाता है। वैसे भी वर्तमान समय में गीता जी की प्रासंगिकता और बढ़ गई है। भौतिक भोग विलास व लोभ की पराकाष्ठा ने हमें आसुरी वृत्तियों से ओतप्रोत कर दिया है। हमारी हर प्रकार से आध्यात्मिक अवनति होती जा रही है। मनुष्य ने स्वयं ही अपने महाविनाश के बीज बो दिये हैं। इस सबके बीच श्री गीता जी ही हमें सही राह दिखा सकती हैं।

साभार : अभिनव, पांचजन्य


Tuesday, May 8, 2012

कुरुक्षेत्र के गाँव हथीरा में, पांडवों की कुलदेवी मां हथीरा देवी



पांडवों द्वारा कुरु भूमि पर धर्मरक्षा और न्याय के लिए महाभारत का भीषण युद्ध लड़ा गया। इस युद्ध में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका सुदर्शन चक्रधारी भगवान श्रीकृष्ण की थी। उन्होंने प्रत्येक विषम परिस्थिति से पांडवों को सचेत करके उनका मार्ग प्रशस्त किया। वे जानते थे कि यह इतिहास का सबसे बड़ा युद्ध होगा। धरती अनेक महारथी योद्धाओं की मृत्यु से रिक्त हो जाएगी। अत: उन्होंने सत्य पर अडिग पांडवों की रक्षा के लिए हर संभव यत्न किया। यही कारण था कि उन्होंने युद्ध से पूर्व पांडवों द्वारा भगवान स्थाणीश्वर की स्थापना करवा कर स्थाणु लिंग की पूजा करवाई।

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माँ हथीरा देवी


शिव के साथ ही शक्ति की अराधना भी महत्वपूर्ण मानी जाती है। यही कारण है कि पांडवों ने माता दुर्गा, जो साक्षात् शक्ति स्वरूपा हैं, की पूजा करने का निर्णय लिया। माता भगवती का बाला सुंदरी रूप पाडंवों की कुल देवी के रूप में जाना जाता था। परन्तु उनका मंदिर हस्तिनापुर,जो पांडवों के शत्रु भाइयों कौरवों की राजधानी थी,में था। युद्धभूमि से दूर व शत्रु क्षेत्र में होने के कारण पांडवों का वहां जाकर आराधना करना संभव नहीं था। इस कारण पांडु पुत्रों ने युद्धभूमि कुरुक्षेत्र में ही माता शक्ति की पूजा करने का निर्णय लिया। उन्होंने कुरुक्षेत्र में माता की पिंडी स्थापित करके उनका आशीर्वाद प्राप्त किया। इस स्थान का नाम उन्होंने हस्तिपुर रखा। तत्पश्चात् देवी बाला सुंदरी के प्रसाद के रूप में पांडवों को विजय प्राप्त हुई। इस बात का उल्लेख महाभारत में भी मिलता है।

समय बीतने के साथ ही वह स्थान जहां पांडवों ने माता की आराधना की थी, इतिहास के पन्नों में खो गया। पांडवों द्वारा स्थापित माता की पिंडी भी एक मिट्टी के टीले के नीचे दब गई। वर्ष 1640 की बात है- माता का एक भक्त, जो महाराष्ट्र के पुणे नगर में रहता था, उसे माता ने स्वप्न में आकर इस स्थान के दर्शन करवाए तथा इस स्थान को प्रकाश में लाने की प्रेरणा दी। कहा जाता है कि वह भक्त उसी समय पुणे से कुरुक्षेत्र के लिए चल पड़ा। उसने गांव हस्तिपुर, अब हथीरा नाम से जाना जाता है, आकर उस टीले को खोज लिया जहां मां भवानी की पिंडी दबी हुई थी। गांव वालों की सहायता से उस स्थान की खुदाई आरंभ हुई। अंतत: लोगों को सदियों उपरांत मां की पावन पिंडी के दर्शन प्राप्त हुए। गांव के नंबरदार की सहायता से उसी स्थान पर माता के मंदिर का निर्माण किया गया।

वर्तमान में यह हथीरा गांव कुरुक्षेत्र के प्रसिद्ध ब्रह्मसरोवर से किरमिच जाने वाली सड़क पर किरमिच गांव से दो किलोमीटर आगे बसा हुआ है। आज भी पांडवों द्वारा स्थापित माता की पिंडी यहां शोभायमान है। पुणे के उसी भक्त परिवार के वंशज आज भी माता के मंदिर का प्रबंध देखते हैं। आज यहां माता का भव्य मंदिर विराजमान है। माता को अब हथीरा देवी के नाम से भी जाना जाता है। वर्ष में आने वाले दोनों नवरात्रों में यहां श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ती है। इस दौरान गांव में मेले का आयोजन किया जाता है। मंदिर में भगवान गणेश, भैरोंनाथ सहित शिवालय में शिव परिवार भी स्थापित किया गया है। यहां बने विशाल हवन-कुंड में समय-समय पर यज्ञ का आयोजन किया जाता है। हालांकि यह मंदिर कुरुक्षेत्र विकास बोर्ड के अधीन नहीं है परन्तु फिर भी गांव वालों ने इसका विकास भली-भांति किया है। कुरुक्षेत्र तथा आसपास के क्षेत्र के कई परिवारों में मां हथीरा को कुलदेवी के रूप में मान्यता प्राप्त है। इन परिवारों में जब भी कोई शुभ कार्य होता है तो सर्वप्रथम माता के द्वार पर आकर माथा टेका जाता है। जन सामान्य का विश्वास है कि जिस प्रकार माता बाला सुन्दरी ने पांडवों की रक्षा करके उन्हें विजय दिलाई वे अपने सभी भक्तों का कल्याण करती हैं।

By : अभिनव

Source : Panchjanya