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Thursday, October 11, 2018

BIJASAN DEVI - विंध्याचल पर्वत पर विराजी हैं यह देवी, सबके लिए करती हैं न्याय

Navratri 2018: विंध्याचल पर्वत पर विराजी हैं यह देवी, सबके लिए करती हैं न्याय
मध्यप्रदेश बिजासन देवी धाम को आज कौन नहीं जानता। कई लोगों की कुलदेवी होने के साथ देश-विदेश में रहने वाले लोगों की आस्था का भी केंद्र है। लोग माता के इस पवित्र स्थान को सलकनपुर देवी धाम के नाम से भी जानते हैं।
नर्मदा नदी के तट से महज 11 किलोमीटर दूर स्थित विंध्याचल पर्वत श्रंखला के अंतिम छोर पर माता स्वयं प्रकट हुई थी। यह स्थान जमीन से एक हजार फीट ऊंचाई पर है। भक्तों कहते हैं कि माता ने पूरे मध्यप्रदे की भलाई के लिए एक हजार फीट की ऊंचाई पर अपना सिंहासन बनाया है, माता वहीं बैठकर दुनियाभर में फैले भक्तों की मनोकामना पूरी कर देती हैं।
salkanpur
मंदिर तक पहुंचने के लिए तीन रास्ते

पहला रास्ता

इस मंदिर पर पहुंचने के लिए भक्तों को 1400 सीढ़ियों का कठिन रास्ता पार करना पड़ता है। रास्ते में ही प्रसाद और फूलों की दुकानें भी लगी रहती है।

दूसरा रास्ता

मंदिर तक पहुंचने के लिए सरकार ने सड़क मार्ग भी बना दिया है। यहां खुद के वाहन से जाया जा सकता है। इसके लिए पहाड को काटकर तीन किलोमीटर लंबा घुमावदार रास्ता बनाया गया है।

तीसरा रास्ता

पहाड़ी पर चढ़ाई के लिए तीसरा रास्ता रोब-वे है। यह स्थान भी सीढ़ियों के पास ही है। जो लोग सीढ़ी से नहीं जा सकते, उनके लिए रोब-वे सुलभ साधन है। उड़नखटोले पर बैठते ही 8-10 मिनट में माता के दरबार में पहुंचा जा सकता है।

salkanpur
रास्ते में लोग करते हैं सेवा

विजयासन देवी धाम के प्रति श्रद्धा ही है कि भोपाल तरफ से जाने वाले मार्ग पर औबेदुल्लागंज में और हरदा तरफ से आने वाले लोगों के लिए रेहटी में लोग श्रद्धालुओं की मदद करते हैं। इनमें अन्य धर्म संप्रदाय के लोग भी शिरकत करते हैं। यहां स्टाल लगाकर श्रद्धालुओं को फलाहार, फल, चाय, पानी का निःशुल्क बंदोबस्त करते हैं।

सबकी कुलदेवी है विजासन देवी
कई कुटुंब परिवार ऐसे हैं जिन्हें अपनी कुलदेवी के बारे में जानकारी नहीं हैं। उन सभी की कुलदेवी विजासन देवी हैं। विजासन देवी को विन्ध्यवासिनी देवी भी कहा जाता है। क्योंकि विंध्याचल पर्वत की देवी है।

भक्तों के शरीर में आ जाती है ऊर्जा

यहां के पुजारी बताते हैं कि यहां आने वाला चाहे मंत्री हो या निर्धन व्यक्ति, सभी पर मां की असीम कृपा बरसती है। विजयासन देवी धाम के परिसर में आते ही भक्त अपना शरीर ऊर्जा और शक्ति से भरा हुआ महसूस करते हैं। इसीलिए कहा जाता है कि यहां आने वाला कोई भी दर्शनार्थी खाली हाथ नहीं जाता।

मां पार्वती का अवतार

शास्त्रों में बताया गया है कि मां विजयासन देवी माता पार्वती का ही अवतार हैं, जिन्होंने देवताओं के आग्रह पर रक्तबीज नामक राक्षस का वध कर सृष्टि की रक्षा की थी।

सूनी गोद भरती हैं देवी

माता कन्याओं को मनचाहा जीवनसाथी का आशीर्वाद देती हैं। भक्तों की सूनी गोद भी भर देती हैं। भक्तों की ही श्रद्धा है कि इस देवीधाम का महत्व किसी शक्तिपीठ से कम नहीं हैं। इस क्षेत्र के ज्यादातर लोग विजयासन देवी को कुलदेवी के रूप में भी पूजते हैं।

यह प्रतिमा है स्वयं-भू

पुजारी बताते हैं कि मां विजयासन देवी की प्रतिमा स्वयं-भू है। यह प्रतिमा माता पार्वती की है, जो वात्सल्य भाव से अपनी गोद में भगवान गणेश को लेकर बैठी है। इस भव्य मंदिर में महालक्ष्मी, महासरस्वती और भैरव की प्रतिमाएं भी स्थापित हैं। भक्त कहते हैं कि एक मंदिर में कई देवी-देवताओं का आशीर्वाद पाने का सभी को सौभाग्य मिलता है।

बाघ भी करता है परिक्रमा

माना जाता है कि विजयासन देवी का मंदिर जिस पहाड़ी पर है वह क्षेत्र रातापानी के जंगल से जुड़ा हुआ है। इसलिए मंदिर तक बाघ का विचरण होता रहता है। भक्तों की आस्था है कि माता का यह वाहन माता के दर्शन करने मंदिर के आसपास आता रहता है। कुछ ग्रामीण बताते हैं कि कई बरसों पहले जब यहां मंदिर का निर्माण नहीं हुआ था तो बाघ मंदिर के पास ही एक गुफा में रहता था। धीरे-धीरे भक्तों की आस्था बढ़ती गई और आज विजयासन देवी धाम देश में जाना-माना तीर्थ बन गया।

साभार: पत्रिका समाचार पत्र 

HARSIDDH MATA - चमत्कारों की देवीः काशी में चरण, उज्जैन में सिर और भोपाल में होती है धड़ की पूजा


 शारदीय नवरात्र के मौके पर हर दिन आपको बताएगा प्रदेश के अनोखे मंदिरों के बारे में...। पहली कड़ी में आपके ले चलते हैं भोपाल जिले की बैरसिया तहसील, जहां विराजमान हैं हरसिद्धि माता...।

भोपाल। बैरसिया तहसील मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल से 35 किलोमीटर दूर है। यहां के तरावली गांव में माता का अद्भुत स्थान हैं। हरसिद्धि माता के दरबार में जो भी अर्जी लगाता है वो जरूर पूरी हो जाती है। खास बात यह है कि इस मंदिर में सीधे नहीं उलटे फेरे लगाए जाते हैं। मान्यता है कि यहां उलटे फेरे लगाने वालों के बिगड़े काम भी बन जाते हैं।


तरावली स्थित मां हरसिद्धि धाम में वैसे तो सामान्य रूप से सीधी परिक्रमा ही करते हैं लेकिन कुछ श्रद्धालु मां से खास मनोकामना के लिए उलटी परिक्रमा कर अर्जी लगा जाते हैं, बाद में जब मनोकामना पूरी हो जाती है तब सीधी परिक्रमा कर माता को धन्यवाद देने जरूर आते हैं।

कई भक्तों को दिया संतान का आशीर्वाद
मान्यता है कि जिन भक्तों को कोई भी संतान नहीं होती है। वह महिलाएं मंदिर के पीछे नदी में स्नान करने के बाद मां की आराधना करती है। इसके बाद उनकी मनोकामना पूरी हो जाती है।

खप्पर से होती है पूजा

तरावली स्थित मां हरसिद्धि के प्रति लोगों की अगाध श्रद्धा है। यहां माता के धड़ की पूजा होती है, क्योंकि मां के चरण काशी में है और शीश उज्जैन में। इससे जितना महत्व काशी और उज्जैन का है उतना ही महत्व इस तरावली मंदिर का भी है। यहां आज भी मां के दरबार में आरती खप्पर से की जाती है।

राजा विक्रमादित्य लाए थे मूर्ति

तरावली के मंहत मोहन गिरी बताते हैं कि वर्षों पूर्व जब राजा विक्रमादित्य उज्जैन के शासक हुआ करते थे। उस समय विक्रमादित्य काशी गए थे। यहां पर उन्होंनें मां की आराधना कर उन्हें उज्जैन चलने के लिए तैयार किया था। इस पर मां ने कहा था कि एक तो वह उनके चरणों को यहां पर छोड़कर चलेंगी। इसके अलावा जहां सबेरा हो जाएगा। वह वहीं विराजमान हो जाएंगी। इसी दौरान जब वह काशी से चले तो तरावली स्थित जंगल में सुबह हो गई। इससे मां शर्त के अनुसार तरावली में ही विराजमान हो गईं। इसके बाद विक्रमादित्य ने लंबे समय तक तरावली में मां की आराधना की। फिर से जब मां प्रसन्न हुई तो वह केवल शीश को साथ चलने पर तैयार हुई। इससे मां के चरण काशी में है, धड़ तरावली में है और शीश उज्जैन में है। उस समय विक्रमादित्य को स्नान करने के लिए जल की आवश्यकता थी। तब मां ने अपने हाथ से जलधारा दी थी। इससे वाह्य नदी का उद्गम भी तरावली के गांव से ही हुआ है और उसी समय से नदी का नाम वाह्य नदी रखा गया है।

यह भी है मान्यता

-मान्यता है कि दो हजार वर्ष पूर्व काशी नरेश गुजरात की पावागढ़ माता के दर्शन करने गए थे। 
-वे अपने साथ मां दुर्गा की एक मूर्ति लेकर आए और मूर्ति की स्थापना की और सेवा करने लगे।
-उनकी सेवा से प्रसन्न होकर देवी मां काशी नरेश को प्रतिदिन सवा मन सोना देती थीं।
-जिसे वो जनता में बांट दिया करते थे। 
-यह बात उज्जैन तक फैली तो वहां की जनता काशी के लिए पलायन करने लगी। 
-उस समय उज्जैन के राजा विक्रमादित्य थे। जनता के पलायन से चिंतित विक्रमादित्य बेताल के साथ काशी पहुंचे। 
-वहां उन्होंने बेताल की मदद से काशी नरेश को गहरी निद्रा में लीन कर स्वयं मां की पूजा करने लगे।
-तब माता ने प्रसन्न होकर उन्हें भी सवा मन सोना दिया।
-विक्रमादित्य ने वह सोना काशी नरेश को लौटाने की पेशकश की। 
-लेकिन काशी नरेश ने विक्रमादित्य को पहचान लिया और कहा कि तुम क्या चाहते हो। 
-तब विक्रमादित्य ने मां को अपने साथ ले जाने का अनुरोध किया। काशी नरेश के न मानने पर विक्रमादित्य ने 12 वर्ष तक वहीं रहकर तपस्या की। 
-मां के प्रसन्न होने पर उन्होंने दो वरदान मांगे, पहला वह अस्त्र, जिससे मृत व्यक्ति फिर से जीवित हो जाए और दूसरा अपने साथ उज्जैन चलने का। 
-तब माता ने कहा कि वे साथ चलेंगी, लेकिन जहां तारे छिप जाएंगे, वहीं रुक जाएंगी। 
-लेकिन उज्जैन पहुंचने सेे पहले तारे अस्त हो गए। इस तरह जहां पर तारे अस्त हुए मां वहीं पर ठहर गईं। इस तरह वह स्थान तरावली के नाम से प्रसिद्ध हुआ।
-तब विक्रमादित्य ने दोबारा 12 वर्ष तक कड़ी तपस्या की और अपनी बलि मां को चढ़ा दी, लेकिन मां ने विक्रमादित्य को जीवित कर दिया। 
-यही क्रम तीन बार चला और राजा विक्रमादित्य अपनी जिद पर अड़े रहे। 
-ऐसे में तब चौथी बार मां ने अपनी बलि चढ़ाकर सिर विक्रमादित्य को दे दिया और कहा कि इसे उज्जैन में स्थापित करो। 
-तभी से मां के तीनों अंश यानी चरण काशी में अन्नपूर्णा के रूप में, धड़ तरावली में और सिर उज्जैन में हरसिद्धी माता के रूप में पूजे जाते हैं।
साभार: पत्रिका न्यूज़ पेपर 

KANKALI MATA MANDIR - यहां देवी मां की घूमती हुई गर्दन देखने पहुंचते हैं भक्त



भोपाल। मां काली के विभिन्न आकर्षक रूपों से हमारा परिचय है लेकिन भोपाल से सटे रायसेन में एक ऐसा मंदिर है जहां मां काली की मूर्ति एक बार स्वयं अपनी गर्दन सीधी करती है। इस मौके पर माता के दर्शनों के लिए भक्तों का तांता लगा होता है। मान्यता है कि जिस भी भक्त को माता की सीधी गर्दन देखने का मौका मिलता है उसके सारे बिगड़े काम बन जाते हैं।

नवरात्र में होती है विशेष पूजा

राजधानी से महज 15 किमी दूर रायसेन जिले के गुदावल गांव में मां काली का प्रचीन मंदिर है। यहां मां काली की 20 भुजाओं वाली प्रतिमा के साथ भगवान ब्रम्हा, विष्णु और महेश की प्रतिमाए विराजमान है। आमतौर पर यहां पूरे साल माता के भक्तों की भीड़ लगी रहती है, लेकिन नवरात्र ंके बाद वियजदशमी पर श्रद्धालुओं का तांता लगता है। चैत्र नवरात्र में रामनवमी के दिन विशाल भंडारा आयोजित किया जाता है।

सूनी गोद भरती है मां

बताया जाता है कि इस दिन माता की लगभग 45 डिग्री झुगी गदरन कुछ पलों के लिए सीधी होती है जिसे देखने के लिए दूर-दूर से लोग आते हैं। मंदिर के महंत मंगल दास त्यागी बताते हैं कि मंदिर से जुड़ी अलग- अलग मान्यताएं हैं। कहा जाता है कि जिन माता-बहनों की गोद सूनी होती है, वह श्रृद्धाभाव से यहां उल्टे हाथ लगाती हैं उनकी मान्यता अवश्य पूरी होती है।

अनोखी है प्राकृतिक छटा

कंकाली मंदिर रायसेन रोड पर स्थित बिलखिरिया गांव से कुछ ही दूरी पर जंगल के बीच बना हुआ है। मंदिर के चारो लगे हरे-भरे पेड़ पौधे यहां सबसे बड़ा आकर्षण है।

साभार: राजस्थान पत्रिका 

Sunday, July 31, 2016

MAA BAGLAMUKHI - माँ बगलामुखी का प्राचीन मंदिर

''ह्मीं बगलामुखी सर्व दुष्टानां वाचं मुखं पदं स्तम्भय जिह्वां कीलम बुद्धिं विनाशय ह्मीं ॐ स्वाहा।''



प्राचीन तंत्र ग्रंथों में दस महाविद्याओं का उल्लेख मिलता है। उनमें से एक है बगलामुखी। माँ भगवती बगलामुखी का महत्व समस्त देवियों में सबसे विशिष्ट है। विश्व में इनके सिर्फ तीन ही महत्वपूर्ण प्राचीन मंदिर हैं, जिन्हें सिद्धपीठ कहा जाता है। उनमें से एक है नलखेड़ा में। तो आइए धर्मयात्रा में इस बार हम अपको ले चलते हैं माँ बगलामुखी के मंदिर।

भारत में माँ बगलामुखी के तीन ही प्रमुख ऐतिहासिक मंदिर माने गए हैं जो क्रमश: दतिया (मध्यप्रदेश), कांगड़ा (हिमाचल) तथा नलखेड़ा जिला शाजापुर (मध्यप्रदेश) में हैं। तीनों का अपना अलग-अलग महत्व है।

मध्यप्रदेश में तीन मुखों वाली त्रिशक्ति माता बगलामुखी का यह मंदिर शाजापुर तहसील नलखेड़ा में लखुंदर नदी के किनारे स्थित है। द्वापर युगीन यह मंदिर अत्यंत चमत्कारिक है। यहाँ देशभर से शैव और शाक्त मार्गी साधु-संत तांत्रिक अनुष्ठान के लिए आते रहते हैं।

इस मंदिर में माता बगलामुखी के अतिरिक्त माता लक्ष्मी, कृष्ण, हनुमान, भैरव तथा सरस्वती भी विराजमान हैं। इस मंदिर की स्थापना महाभारत में विजय पाने के लिए भगवान कृष्ण के निर्देश पर महाराजा युधि‍ष्ठिर ने की थी। मान्यता यह भी है कि यहाँ की बगलामुखी प्रतिमा स्वयंभू है।

यहाँ के पंडितजी कैलाश नारायण शर्मा ने बताया कि यह बहुत ही प्राचीन मंदिर है। यहाँ के पुजारी अपनी दसवीं पीढ़ी से पूजा-पाठ करते आए हैं। 1815 में इस मंदिर का जीर्णोद्धार किया गया था। इस मंदिर में लोग अपनी मनोकामना पूरी करने या किसी भी क्षेत्र में विजय प्राप्त करने के लिए यज्ञ, हवन या पूजन-पाठ कराते हैं।

यहाँ के अन्य पंडित गोपालजी पंडा, मनोहरलाल पंडा आदि ने बताया कि यह मंदिर श्मशान क्षेत्र में स्थित है। बगलामुखी माता मूलत: तंत्र की देवी हैं, इसलिए यहाँ पर तांत्रिक अनुष्ठानों का महत्व अधिक है। यह मंदिर इसलिए महत्व रखता है, क्योंकि यहाँ की मूर्ति स्वयंभू और जाग्रत है तथा इस मंदिर की स्थापना स्वयं महाराज युधिष्ठिर ने की थी।

इस मंदिर में बिल्वपत्र, चंपा, सफेद आँकड़ा, आँवला, नीम एवं पीपल के वृक्ष एक साथ स्थित हैं। इसके आसपास सुंदर और हरा-भरा बगीचा देखते ही बनता है। नवरात्रि में यहाँ पर भक्तों का हुजूम लगा रहता है। मंदिर श्मशान क्षेत्र में होने के कारण वर्षभर यहाँ पर कम ही लोग आते हैं।

कैसे पहुँचें:-

वायु मार्ग: नलखेड़ा के बगलामुखी मंदिर स्थल के सबसे निकटतम इंदौर का एयरपोर्ट है।

रेल मार्ग: ट्रेन द्वारा इंदौर से 30 किमी पर स्थित देवास या लगभग 60 किमी मक्सी पहुँचकर भी शाजापुर जिले के गाँव नलखेड़ा पहुँच सकते हैं।

सड़क मार्ग: इंदौर से लगभग 165 किमी की दूरी पर स्थित नलखेड़ा पहुँचने के लिए देवास या उज्जैन के रास्ते से जाने के लिए बस और टैक्सी उपलब्ध हैं।

- अनिरुद्ध जोशी 'शतायु' , वेब दुनिया

MANDU - मांडू - मध्य प्रदेश में बसा है एक और कश्मीर

मध्य प्रदेश में बसा है एक और कश्मीर



मध्य प्रदेश में स्थित माण्डू का दर्शन वादिये कश्मीर का आभास देता है। यहां हरी-भरी वादियां, नर्मदा का सुरम्य तट ये सब मिलकर माण्डू को मालवा का स्वर्ग बनाते हैं। यहां की माटी के बारे में कहा जाता है कि ‘मालवा माटी गहर-गंभीर। पग-पग रोटी डग-डग नीर।’ अबुल फजल को माण्डू का मायाजाल इतना भ्रमित करता था कि उन्हें लिखना पड़ा कि माण्डू पारस पत्थर की देन है। माण्डू ने मुख्य रूप से चार वंशों का कार्यकाल देखा है-परमार काल, सुल्तान काल, मुगल काल और पॅवार काल।

परमार राजाओं ने बसाया माण्डू

माण्डू को रचने-बसाने का प्रथम श्रेय परमार राजाओं को है। हर्ष, मुंज, सिंधु और राजा भोज इस वंश के महत्वपूर्ण शासक रहें हैं। किंतु इनका ध्यान माण्डू की अपेक्षा धार पर ज्यादा था, जो माण्डू से महज 30 किलोमीटर है। परमार वंश के अंतिम महत्वपूर्ण नरेश राजा भोज का ध्यान वास्तु की अपेक्षा साहित्य पर अधिक था और उनके समय संस्कृत के महत्वपूर्ण ग्रंथ लिखे गए। उनकी मृत्यु पर लेखकों ने यह कहकर विलाप किया कि अब सरस्वती निराश्रित हो गई हैं।

“अद्य धारा निराधारा निरालंबा सरस्वती”

अद्वितीय वास्तुशिल्प

सुल्तानों के काल में यहां महत्वपूर्ण निर्माण हुए। दिलावर खां गोरी ने इसका नाम बदलकर शादियाबाद (आनंद नगरी) रखा। होशंगशाह इस वंश का महत्वपूर्ण शासक था। मुहम्मद खिलजी ने मेवाड़ के राणा कुम्भा पर विजय के उपलक्ष्य में अशर्फी महल से जोड़कर सात मंजिला विजय स्तंभ का निर्माण कराया (अब इसकी केवल एक ही मंजिल सलामत है)। हालांकि यह तथ्य विवादित है क्योंकि राणा कुम्भा ने भी मुहम्मद खिलजी पर विजय की स्मृति में चित्तौड़ के विश्व प्रसिद्ध विजय स्तंभ का निर्माण कराया था। आमतौर पर इतिहासकार मानते हैं कि राणा ने खिलजी को बंदी बनाया था और माफी पर उसे छोड़ा था। फिर भी फरिश्ता जैसे इतिहासकार मुहम्मद खिलजी की वीरता की भूरि-भूरि प्रशंसा करते हैं। वह लिखता है कि खिलजी हमेशा युद्ध में रहता है। अशर्फी महल का निर्माण मदरसे के तौर पर हुआ था और उसके कई कमरे आज भी काफी अच्छी अवस्था में हैं।

गयासुद्दीन इस वंश का अगला शासक था। फरिश्ता के अनुसार उसकी 15000 बेगमें थीं। माण्डू में उसने शाही महल का निर्माण अपनी बेगमों के लिए कराया। 500 अरबी और 500 तुर्की महिलाएं उसकी अंगरक्षक होती थी। जहांगीर के अनुसार उसने संपूर्ण नगर ही बेगमों के लिए सजाया था। अगले शासक नासिरुद्दीन ने रूपमती-बाजबहादुर का महल बनवाकर उनके प्रेम कथानक को अमर बनाया।

जब हिंदुस्तान के तख्तोताज पर अकबर जलवाफरोज हुआ तो उसने माण्डू की ओर विशेष ध्यान दिया। उसने अशर्फी महल का जीर्णोद्वार कराया। जहांगीर को माण्डू की रातें बेहद पसंद थीं। वह कई बार माण्डू आया और उसने जहाज महल का जीर्णोद्वार कराया। सन 1617 में जहांगीर जब माण्डू आया तो नूरजहां उसके साथ थी और उसने जलमहल में एक लड़की को जन्म दिया। सम्राट जहांगीर ने इसी अवसर पर सर टामस को रो को प्रसव चिकित्सा के लिए माण्डू आमंत्रित किया था और इस चिकित्सा से खुश होकर उसने अंग्रेजों को व्यापार की अनुमति दी थी।

शाहजहां 1617 और 1621 में जहांगीर के निमंत्रण पर माण्डू आया था। वह होशंगशाह के मकबरे से बेहद प्रभावित था। 1669 में वह अपने वास्तुकार हामिद के साथ विशेष रूप से इस मकबरे की निर्माण शैली देखने माण्डू आया और यहीं ताजमहल की रूप रेखा बनी। सफेद संगमरमर से बना यह मकबरा शाहजहां को लुभा गया। मकबरे के नीचे जिस प्रकार कब्र पर एक- एक बूंद पानी गिरता है, उसकी भी नकल ताजमहल में की गई। शाहजहां के वास्तुकार हामिद ने इस मकबरे के मुख्य द्वार पर एक पट्टिका लगाई जिससे आज भी पता चलता है कि ताजमहल की प्रेरणा हुंमायू का मकबरा न होकर माण्डू स्थित होशंगशाह का मकबरा है।

रानी रूपमती और बाजबहादुर का अमर प्रेम

आज माण्डू रानी रूपमती और बाजबहादुर के अमर प्रेम के कारण भी याद किया जाता है। बाजबहादुर अपने समय के संगीतज्ञ थे। अबुल फजल तो उन्हें महानतम संगीतज्ञ कहते हैं। फरिश्ता के अनुसार वह राग दीपक के उस्ताद थे। किन्तु उनकी प्रेयसी पर बादशाह की नजर लग गई। इसका परिणाम यह हुआ कि रानी रूपमती को जहर खाकर अपनी जान देनी पड़ी। बाजबहादुर कुछ दिनों तक अकबर के मनसबदार रहे लेकिन रूपमती के वियोग ने उन्हें अधिक दिनों तक जीने नहीं दिया और वह चल बसे। रूपमती खुद एक संगीत विशारदा थीं। बाजबहादुर- रूपमती के महल में आज भी वह भवन सुरक्षित है जिसमें रूपमती ने संगीत सम्राट तानसेन को हराया था।

जहाज महल

जहाज महल माण्डू का सर्वाधिक चर्चित स्मारक है। चारों तरफ पानी से घिरे होने के कारण यह जहाज का दृश्य उपस्थित करता है। इसकी आकृति टी के आकार की है। इसका निर्माण परमार राजा मुंज के समय हुआ किंतु इसके सुदृढ़ीकरण का श्रेय गयासुद्दीन खिलजी को है। माण्डू की सबसे बड़ी विशेषता इसकी अंत: भूगर्भीय संरचना है। माण्डू का फैलाव जितना ऊपर है उतना ही नीचे है। शत्रु के आक्रमण के समय यह भूगर्भीय रचना सुरक्षा का एक साधन भी थी। यह संरचना अपने निर्माण से आज भी विस्मृत करती है। धार व माण्डू के बीच बने 35 भवन एक अन्य आश्चर्यजनक निर्माण हैं। येभवन इको प्वाइंट का काम करते थे। सुल्तान जब माण्डू से धार के लिए निकलता था तो इन्हीं भवनों से उसके आने की खबर दी जाती थी। माण्डू से कुछ दूरी पर बूढ़ी माण्डू स्थित है। इसे ऋषि माण्डव्य या माण्डवी के नाम पर सिद्धक्षेत्र कहा गया है।

‘माण्डू सिटी ऑफ जॉय’ के लेखक गुलाम यजदानी के अनुसार माण्डू के भवन रोमन, ग्रीक ईरानी, यूनानी, गैथिक, अफगान और हिंदू शैली से बने हैं। हिंदू शैली में बने भवन मुख्य हैं- हिण्डोला भवन, जामी मस्जिद, होशंगशाह का मकबरा आदि। पत्तियां, कमल के फूल, त्रिशूल, कलश, बंदनवार आदि इसके गवाह हैं। अफगान शैली में बने भवन हैं- रूपमती मण्डप, बाजबहादुर महल दरिया खां का मकबरा, जहाज महल आदि।

आल्हा-ऊदल के वीरता की कहानी

आल्हा-ऊदल के बिना माण्डू का वर्णन अधूरा माना जाता है। आल्हाखण्ड में महाकवि जगनिक ने 52 लड़ाइयों का जिक्र किया है। उसमें पहली लड़ाई माड़ौगढ़ की मानी जाती है, जिसका साम्य इसी माण्डू से किया जाता है। इसलिए आल्हा गायकों के लिए माण्डू एक तीर्थस्थल सरीखा है। बुंदेलखंड के लोग यहां इस लड़ाई के अवशेष देखने आते हैं। राजा जम्बे का सिंहासन, आल्हा की सांग, सोनगढ़ का किला, जहां आल्हा के पिता और चाचा की खोपडि़यां टांगी गई थी और वह कोल्हू जिसमें दक्षराज-वक्षराज को करिंगा ने पीस दिया था। ये सब आज भी आल्हा के मुरीदों को आकर्षित करते हैं।

पर्यटन का स्थान माण्डव

मांडू का दौरा करने के बाद भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने टिप्पणी करते हुए कहा था की, "मांडू के अवशेष और खंडहर रोम की तुलना में बेहतर हैं और यह स्थान दुनिया भर के पर्यटकों को आकर्षित करने की क्षमता रखता है। मध्य प्रदेश में स्थित माण्डू का दर्शन वादिये कश्मीर का आभास देता है। ‘मालवा की मिटी का अलग ही एहसास है।’ वर्षा ऋतु में पर्यटन नगरी मांडू का नैसर्गिक सौंदर्य खिल उठा है। मांडू की वादियों ने हरियाली की चुनर ओढ़ ली है। चारों ओर फैली घनी धुंध के बीच ऐतिहासिक इमारतों को निहार कर पर्यटक आनंदित हो रहे है।

इस जगह पर वास्तुकला के खंडहर हैं

• होशांग शाह का मकबरा

• मांडू की जामी मस्जिद

• अशर्फी महल

• बाज बहादुर का महल

• रानी रूपमती का मण्डप महल

• नीलकंठ तीर्थ महल

• जहाज महल

• हिंडोला महल

• इको पाइंट

• `काकड़ा खो

•दरिया खां का मकबरा अनेक प्रकार की गुफाएं और मंदिर जुड़े हुए है स्वागत करते प्रवेश द्वार

मांडू में लगभग 12 प्रवेश द्वार है, जो मांडू में 45 किलोमीटर के दायरे में मुंडेर के समान निर्मित है. इन दरवाजों में दिल्ली दरवाजा प्रमुख है. यह मांडू का प्रवेश द्वार है. इसका निर्माण सन् 1405 से 1407 के मध्य में हुआ था. यह खड़ी ढाल के रूप में घुमावदार मार्ग पर बनाया गया है, जहाँ पहुँचने पर हाथियों की गति धीमी हो जाती थी.

इस दरवाजे में प्रवेश करते ही अन्य दरवाजों की शुरुआत के साथ ही मांडू दर्शन का आरंभ हो जाता है. मांडू के प्रमुख दरवाजों में आलमगीर दरवाजा, भंगी दरवाजा, रामपोल दरवाजा, जहाँगीर दरवाजा, तारापुर दरवाजा आदि अनेक दरवाजे हैं.

होशांग शाह का मकबरा

जिसमें संगमरमर की सुन्दर जालियाँ देखते ही बनती हैं। यह मकबरा अफगानी आर्किटेक्चर का एक बेहतरीन नमूना है। उस वक्त भी इसकी इतनी चर्चा थी कि इसके स्टाइल भरे संगमरमर के काम को देखने के लिए शाहजहां ने अपने दरबार के चार नामी आर्किटेक्ट भेजे थे। इनमें से एक उस्ताद हामिद था, जो ताज महल का डिजाइन तैयार करने वालों में से एक था। होशंगशाह की कब्र, जो कि भारत में मार्बल से बनाई हुई ऐसी पहली कब्र है, जिसमें आपको अफगानी शिल्पकला का बेहतर नमूना देखने को मिलता है

जामा मस्जिद

मांडू का मुख्य आकर्षण जामा मस्जिद है यह सन् 1454 में बनवाया गया मस्जिद है, जो इस विशाल मस्जिद का निर्माण कार्य होशंगशाह के शासनकाल में आरंभ किया गया था हालांकि यह मस्जिद बेहद सादगी से बनाई गई है, लेकिन इस मस्जिद की गिनती मांडू की नायाब व शानदार इमारतों में की जाती है. यह भी कहा जाता है कि जामा मस्जिद डेमास्कस (सीरिया देश की राजधानी) की एक प्रसिद्ध मस्जिद का प्रतिरूप है.

बाज बहादुर का महल

बाज बहादुर के महल का निर्माण 16वीं शताब्दी में किया गया था. इस महल में विशाल हॉल बने हुए हैं. यहाँ से हमें मांडू का सुंदर नजारा देखने को मिलता है.

अशर्फी महल

जामा मस्जिद के सामने ही अशरफी महल है. अशरफी का अर्थ होता है सोने के सिक्के. इस महल का निर्माण होशंगशाह खिलजी के उत्तराधिकारी मोहम्मद खिलजी ने इस्लामिक भाषा के विद्यालय (मदरसा) के लिए किया था. यहाँ विद्धार्थियों के रहने के लिए कई कमरों का निर्माण भी किया गया था. वैसे, इस महल में एक सात मंजिला टावर भी बना है, जिसे महमूद ने मेवाड़ के राणा खंबा को हराने के बाद बनवाया था। फिलहाल इस टावर की एक ही मंजिल के अवशेष बाकी हैं

रानी रूपमती का महल

मांडू किले के अन्तिम किनारे पर स्थित इस भवन को बाज बहादुर और रानी रूपमती की प्रेमकथा का प्रतीक कहा जाता है। पहाड़ी की चोटी पर बने इसके गलियारे से रानी रूपमती बाज बहादुर के महल और नीचे बहती नर्मदा नदी के नजारों को निहारा करती थी।

बाजबहादुर ने रानी रूपमती के लिए रेवा कुंड बनवया था रेवा कुंड का निर्माण बादशाह बाजबहादुर ने अपनी रानी रूपमती के महल में पानी की पर्याप्त व्यवस्था के स्त्रोत के रूप में किया था.

नीलकंठ

यहाँ शिवजी का मंदिर है जिसमें जाने के लिए अंदर सीढ़ी उतरकर जाना पड़ता है. इस मंदिर के सौंदर्य को शब्दों में बयाँ नहीं किया सकता. ऊपर पेड़ों से घिरे तालाब से एक धार नीचे शिवजी का अभिषेक करती जाती है.

मंदिर के समीप स्थित इस महल का निर्माण शाह बदगा खान ने अकबर की हिंदू पत्नी के लिए करवाया था. इसकी दीवारों पर अकबर कालीन कला के नमूने देखे जा सकते हैं.

जहाज महल

जहाज महल का निर्माण 1469 से 1500 ईस्वी के मध्य कराया था. यह महल जहाज की आकृति में दो कृत्रिम तालाबों कपूर तालाब व मुंज तालाब दो तालाबों के मध्य में बना हुआ है. लगभग 120 मीटर लंबे इस खूबसूरत महल को दूर से देखने पर ऐसा लगता है मानों तालाब के बीच में कोई सुंदर जहाज तैर रहा हो. संभवत: इसका निर्माण श्रृंगारप्रेमी सुल्तान ग्यासुद्दीन खिलजी ने विशेष तौर पर अंत:पुर (महिलाओं के लिए बनाए गए महल) के रूप में किया था.

हिंडोला महल

हिंडोला महल मांडू के खूबसूरत महलों में से एक है. हिंडोला का अर्थ होता झूला. इस महल की दीवारे कुछ झुकी होने के कारण यह महल हवा में झुलते हिंडोले के समान दिखाई देता है. अत: इसे हिंडोला महल के नाम से जाना जाता है. हिंडोला महल का निर्माण ग्यासुद्दीन खिलजी ने 1469 से 1500 ईस्वी के मध्य सभा भवन के रूप में निर्मित सुंदर महल है. यहाँ के सुंदर कॉलम इसे और भी खूबसूरती प्रदान करते हैं. इस महल के पश्चिम में कई छोटे-बड़े सुंदर महल है. इसके पास में ही चंपा बाबड़ी है.

इको पाइंट

हाथी महल, दरिया खान की मजार, दाई का महल, दाई की छोटी बहन का महल, मस्जिद और जाली महल भी दर्शनीय हैं. यहाँ ईको पॉइंट पर पर्यटकों की भीड़ लगी ही रहती है. लोहानी गुफाएँ और उनके सामने स्थित सनसेट पॉइंट भी पर्यटकों को खींचता है.

काकड़ा खो

पर्यटकों का सबसे पहले प्राकृतिक वातावरण में 'काकड़ा खो' पर ही स्वागत होता है।पर्याप्त बारिश नहीं होने के कारण पर्यटक काकड़ा खो एवं अन्य क्षेत्रों में बहने वाले झरनों के अनुपम दृश्यों से अभी तक वंचित हैं। अगर मौसम में ऐसी ही ठंडक बनी रही तो आने वाले कई रविवारों को यहां भारी संख्या में पर्यटकों का आगमन होने की संभावना है।

दरिया खां का मकबरा

यह मकबरा, ताजमहल की वास्तुकला से मिलती है और होशांग शाह का मकबरा, चार मकबरे के कोने में स्थित है। इसके अलावा, कब्र एक ऊंचे मंच पर बनी हुई है और इसके चारों ओर वर्गाकार रूप में उच्च मेहराब भी बनी हुई है।

"मांडू प्रतिनिधि के अनुसार इस नजारे को देखने के लिए भी पर्यटक यहां रुकते हैं, परंतु यहां पर्याप्त रैलिंग नहीं है। कुछ स्थानों पर है, लेकिन वह टूट चुकी है। करीब एक हजार फुट नीचे गहरी खाई है। पूर्व में यहां हादसे हो चुके हैं।"

इसकी वजह यह है कि यहां पर वर्षा ऋतु में झरना बहने लगता है।जहां सावधानी हटने पर दुर्घटना घट सकती है। यहां सुरक्षा के पर्याप्त इंतजाम नहीं हैं।

मांडू जाने का बेहतर समय

जुलाई से मार्च माह का समय मांडू जाने के लिए बेहतर स्थान है। बेहतर होगा कि आप बरसात के मौसम में मांडू जाएँ क्योंकि इस मौसम में मांडू की खूबसूरती पर होती है।

मांडू से दूरी ; धार से दूरी - लगभग 33 किलोमीटर

इंदौर से दूरी - लगभग 100 किलोमीटर

कैसे, कब, कहां

मध्य प्रदेश में विंध्याचल की पहाडि़यों में 2000 फुट की ऊंचाई पर स्थित माण्डू वायु मार्ग द्वारा इंदौर और भोपाल से जुड़ा है। इंदौर यहां से 99 किलोमीटर दूर है। महू, इंदौर और खंडवा निकटतम रेलवे स्टेशन हैं। दिल्ली-मुंबई रेलमार्ग पर रतलाम यहां से 124 किलोमीटर दूर है। धार से प्रत्येक आधे घंटे पर बस सेवा है। इसके अलावा इंदौर, खंडवा, रतलाम, उज्जैन और भोपाल से भी नियमित बस सेवा है।

यहां जाने का सर्वश्रेष्ठ समय जुलाई से मार्च तक है। माण्डू में रात्रि विश्राम के लिए अनेक प्राइवेट और सरकारी होटल हैं। मध्य प्रदेश पर्यटन के यहां मालवा रिसॉर्ट और मालवा रीट्रीट नाम से दो होटल हैं जहां नौ सौ से लेकर 18 सौ रुपये रोजाना तक किराये पर कमरे उपलब्ध हैं।

SABHAR:  Dainik Jagran

अर्धनारेश्वर मंदिर ज्योतिर्लिंग - मोह्गाव

 अर्धनारेश्वर मंदिर - मोह्गाव 




Monday, March 2, 2015

KARNESHWAR MANDIR - प्राचीन कर्णेश्वर मंदिर

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मालवांचल में कौरवों ने अनेक मंदिर बनाएँ थे जिनमें से एक है सेंधल नदी के किनारे बसा यह कर्णेश्वर महादेव का मंदिर। करनावद (कर्णावत) नगर के राजा कर्ण यहाँ बैठकर ग्रामवासियों को दान दिया करते थे इस कारण इस मंदिर का नाम कर्णेश्वर मंदिर पड़ा।

ऐसी मान्यता है कि कर्ण यहाँ के भी राजा थे और उन्होंने यहाँ देवी की कठिन तपस्या की थी। कर्ण रोज देवी के समक्ष स्वयं की आहूती दे देते थे। देवी उनकी इस भक्ति से प्रसन्न होकर रोज अमृत के छींटें देकर उन्हें जिंदा करने के साथ ही सवा मन सोना देती थी। जिसे कर्ण उक्त मंदिर में बैठककर ग्रामवासियों को दान कर दिया करते थे।
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मालवा और निमाड़ अंचल में कौरवों द्वारा बनाए गए अनेकों मंदिर में से सिर्फ पाँच ही मंदिर को प्रमुख माना गया हैं जिनमें क्रमश: ओंमकारेश्वर में ममलेश्वर, उज्जैन में महांकालेश्वर, नेमावर में सिद्धेश्वर, बिजवाड़ में बिजेश्वर और करनावद में कर्णेश्वर मंदिर। इन पाँचों मंदिर के संबंध में किंवदंति हैं कि पांडवों ने उक्त पाँचों मंदिर को एक ही रात में पूर्वमुखी से पश्चिम मुखी कर दिया गया था।

कर्णेश्वर महादेव मंदिर के पूजारी हेमंत दुबे ने कहा कि ऐसी किंवदंती है कि अज्ञात वास के दौरान माता कुंति रेत के शिवलिंग बनाकर शिवजी की पूजा किया करती थी तब पांडवों ने पूछा कि आप किसी मंदिर में जाकर क्यों नहीं पूजा करती? कुंति ने कहा कि यहाँ जितने भी मंदिर हैं वे सारे कौरवों द्वारा बनाए गए है जहाँ हमें जाने की अनुमति नहीं है। इसलिए रेत के शिवलिंग बनाकर ही पूजा करनी होगी।

कुंति का उक्त उत्तर सुनकर पांडवों को चिंता हो चली और फिर उन्होंने योजनाबद्ध तरीके से उक्त पाँच मंदिर के मुख को बदल दिया गया तत्पश्चात कुंति से कहा की अब आप यहाँ पूजा-अर्चना कर सकती हैं क्योंकि यह मंदिर हमने ही बनाया है।
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कर्णेश्वर मंदिर की भव्यता देखते ही बनती है। बताया जाता हैं कि इस मंदिर में स्थित जो गुफाएँ हैं वे उज्जैन के महांकालेश्वर मंदिर के अलावा अन्य तीर्थ स्थानों तक अंदर ही अंदर निकलती है। गाँव के कुछ लोगों द्वारा उक्त गुफाओं को बंद कर दिया गया है ताकि वह सुरक्षित रहे।

यहाँ प्रतिवर्ष श्रावण मास में उत्सवों का आयोजन होता है और बाबा कर्णेश्वर महादेव की झाँकियाँ निकलती है। धर्म यात्रा की इस बार की कड़ी आपको कैसी लगी हमें जरूर बताएँ।

कैसे पहुँचे:-
वायु मार्ग: कर्णावत स्थल के सबमें नजदीकी इंदौर का एयरपोर्ट है।
रेल मार्ग: इंदौर से 30 किलोमिटर पर स्थित देवास पहुँचकर करनावद अन्य साधनों से जाया जाता है।
सड़क मार्ग: देवास से 45 किलोमिटर दूर चापड़ा जाने के लिए बस और टैक्सी उपलब्ध है जहाँ से कुछ ही दूरी पर कर्णावत गाँव है।
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साभार : अनिरुद्ध जोशी 'शतायु, वेबदुनिया

Wednesday, September 24, 2014

SIDDHNATH MAHADEV - NEMAWAR - नेमावर के प्राचीन सिद्धनाथ महादेव


धर्मयात्रा की इस कड़ी में हम आपको ले चलते हैं पुण्य सलिला नर्मदा के किनारे बसे नगर नेमावर के प्राचीन सिद्धनाथ महादेव के मंदिर। महाभारतकाल में नाभिपुर के नाम से प्रसिद्ध यह नगर व्यापारिक केंद्र हुआ करता था मगर अब यह पर्यटन स्थल का रूप ले रहा है। राज्य शासन के रिकॉर्ड में इसका नाम 'नाभापट्टम' था। यहीं पर नर्मदा नदी का 'नाभि' स्थान है।

किंवदंती है कि सिद्धनाथ मंदिर के शिवलिंग की स्थापना चार सिद्ध ऋषि सनक, सनन्दन, सनातन और सनतकुमार ने सतयुग में की थी। इसी कारण इस मंदिर का नाम सिद्धनाथ है। इसके ऊपरी तल पर ओमकारेश्वर और निचले तल पर महाकालेश्वर स्थित हैं। श्रद्धालुओं का ऐसा भी मानना है कि जब सिद्धेश्वर महादेव शिवलिंग पर जल अर्पण किया जाता है तब ॐ की प्रतिध्‍वनि उत्पन्न होती है।

ऐसी मान्यता है कि इसके शिखर का निर्माण 3094 वर्ष ईसा पूर्व किया गया था। द्वापर युग में कौरवों द्वारा इस मंदिर को पूर्वमुखी बनाया गया था, जिसको पांडव पुत्र भीम ने अपने बाहुबल से पश्चिम मुखी कर दिया था।

एक किंवदंती यह भी है कि सिद्धनाथ मंदिर के पास नर्मदा तट की रेती पर सुबह-सुबह पदचिन्ह नजर आते हैं, जहाँ पर कुष्‍ठ रोगी लोट लगाते हैं। ग्राम के बुजुर्गों का मानना है कि पहाड़ी के अंदर स्थित गुफाओं, कंदराओं में तपलीन साधु प्रात:काल यहाँ नर्मदा स्नान करने के लिए आते हैं। नेमावर के आस-पास प्राचीनकाल के अनेक विशालकाय पुरातात्विक अवशेष मौजूद हैं।

हिंदू और जैन पुराणों में इस स्थान का कई बार उल्लेख हुआ है। इसे सब पापों का नाश कर सिद्धिदाता ‍तीर्थस्थल माना गया है।

नर्मदा के तीर स्थित यह मंदिर हिंदू धर्म की आस्था का प्रमुख केंद्र है। 10वीं और 11वीं सदी के चंदेल और परमार राजाओं ने इस मंदिर का जिर्णोद्धार किया, जो अपने-आप में स्थापत्य कला का बेजोड़ नमूना है। मंदिर को देखने से ही मंदिर की प्राचीनता का पता चलता है। मंदिर के स्तंभों और दीवारों पर शिव, यमराज, भैरव, गणेश, इंद्राणी और चामुंडा की कई सुंदर मूर्तियाँ उत्कीर्ण है।

यहाँ शिवरात्रि, संक्रांति, ग्रहण, अमावस्या आदि पर्व पर श्रद्धालु स्नान-ध्यान करने आते हैं। साधु-महात्मा भी इस पवित्र नर्मदा मैया के दर्शन का लाभ लेते हैं।

कैसे पहुँचे :-
वायु मार्ग : यहाँ से सबसे नजदीकी हवाई अड्डा देवी अहिल्या एयरपोर्ट, इंदौर 130 किमी की दूरी पर स्थित है।
रेल मार्ग : इंदौर से मात्र 130 किमी दूर दक्षिण-पूर्व में हरदा रेलवे स्टेशन से 22 किमी तथा उत्तर दिशा में भोपाल से 170 किमी दूर पूर्व दिशा में स्थित है नेमावर।

सड़क मार्ग : नेमावर पहुँचने के लिए इंदौर से बस या टैक्सी द्वारा भी जाया जा सकता है।

साभार : अनिरुद्ध जोशी शतायु, वेब दुनिया

Monday, September 22, 2014

चार वटों में से एक सिद्धवट - SIDDHVAT



धर्मयात्रा की इस बार की कड़ी में हम आपको लेकर चलते हैं उज्जैन के सिद्धवट स्थान पर। उज्जैन के भैरवगढ़ के पूर्व में शिप्रा के तट पर प्रचीन सिद्धवट का स्थान है। इसे शक्तिभेद तीर्थ के नाम से जाना जाता है। हिंदू पुराणों में इस स्थान की महिमा का वर्णन किया गया है। हिंदू मान्यता अनुसार चार वट वृक्षों का महत्व अधिक है। अक्षयवट, वंशीवट, बौधवट और सिद्धवट के बारे में कहा जाता है कि इनकी प्राचीनता के बारे में कोई नहीं जानता।

*नासिक के पंचववटी क्षेत्र में सीता माता की गुफा के पास पाँच प्राचीन वृक्ष है जिन्हें पंचवट के नाम से जाना जाता है। वनवानस के दौरान राम, लक्ष्मण और सीता ने यहाँ कुछ समय बिताया था। इन वृक्षों का भी धार्मिक महत्व है। उक्त सारे वट वक्षों की रोचक कहानियाँ हैं। मुगल काल में इन वृक्षों को खतम करने के कई प्रयास हुए।

सिद्धवट के पुजारी ने कहा कि स्कंद पुराण अनुसार पार्वती माता द्वारा लगाए गए इस वट की शिव के रूप में पूजा होती है। पार्वती के पुत्र कार्तिक स्वामी को यहीं पर सेनापति नियुक्त किया गया था। यहीं उन्होंने तारकासुर का वध किया था। संसार में केवल चार ही पवित्र वट वृक्ष हैं। प्रयाग (इलाहाबाद) में अक्षयवट, मथुरा-वृंदावन में वंशीवट, गया में गयावट जिसे बौधवट भी कहा जाता है और यहाँ उज्जैन में पवित्र सिद्धवट हैं।



यहाँ तीन तरह की सिद्धि होती है संतति, संपत्ति और सद्‍गति। तीनों की प्राप्ति के लिए यहाँ पूजन किया जाता है। सद्‍गति अर्थात पितरों के लिए अनुष्ठान किया जाता है। संपत्ति अर्थात लक्ष्मी कार्य के लिए वृक्ष पर रक्षा सूत्र बाँधा जाता है और संतति अर्थात पुत्र की प्राप्ति के लिए उल्टा सातिया (स्वस्विक) बनाया जाता है। यह वृक्ष तीनों प्रकार की सिद्धि देता है इसीलिए इसे सिद्धवट कहा जाता है।

पंडित नागेश्वर कन्हैन्यालाल ने कहा कि यहाँ पर नागबलि, नारायण बलि-विधान का विशेष महत्व है। संपत्ति, संतित और सद्‍गति की सिद्धि के कार्य होते हैं। यहाँ पर कालसर्प शांति का विशेष महत्व है, इसीलिए कालसर्प दोष की भी पूजा होती है।

कालसर्प दोष का निदान कराने आईं पुना की श्वेता उपाध्याय ने कहा कि मेरी जन्मकुंडली में कालसर्प दोष था। हमें पता चला कि यहाँ कालसर्प दोष का निदान होता है तो मैं यहाँ पर दोष का निवारण कराने आई हूँ।

वर्तमान में इस सिद्धवट को कर्मकांड, मोक्षकर्म, पिंडदान, कालसर्प दोष पूजा एवं अंत्येष्टि के लिए प्रमुख स्थान माना जाता है। यह यात्रा आपकों कैसी लगी हमें जरूर बताएँ।

साभार : अनिरुद्ध जोशी 'शतायु, वेबदुनिया 


Friday, September 5, 2014

GARH KALIKA MANDIR - UJJAIN - उज्जैन की मां गढ़ कालिका का मंदिर



धर्मयात्रा की इस बार की कड़ी में हम आपको ले चलते हैं उज्जैन के कालीघाट स्थित कालिका माता के प्राचीन मंदिर में, जिसे गढ़ कालिका के नाम से जाना जाता है। देवियों में कालिका को सबसे महत्वपूर्ण माना गया है।

गढ़ कालिका के मंदिर में माँ कालिका के दर्शन के लिए रोज हजारों भक्तों की भीड़ जुटती है। तांत्रिकों की देवी कालिका के इस चमत्कारिक मंदिर की प्राचीनता के विषय में कोई नहीं जानता, फिर भी माना जाता है कि इसकी स्थापना महाभारतकाल में हुई थी, लेकिन मूर्ति सतयुग के काल की है। बाद में इस प्राचीन मंदिर का जीर्णोद्धार सम्राट हर्षवर्धन द्वारा किए जाने का उल्लेख मिलता है। स्टेटकाल में ग्वालियर के महाराजा ने इसका पुनर्निर्माण कराया।


वैसे तो गढ़ कालिका का मंदिर शक्तिपीठ में शामिल नहीं है, किंतु उज्जैन क्षेत्र में माँ हरसिद्धि ‍शक्तिपीठ होने के कारण इस क्षेत्र का महत्व बढ़ जाता है। पुराणों में उल्लेख मिलता है कि उज्जैन में ‍शिप्रा नदी के तट के पास स्थित भैरव पर्वत पर माँ भगवती सती के ओष्ठ गिरे थे।

यहाँ पर नवरा‍त्रि में लगने वाले मेले के अलावा भिन्न-भिन्न मौकों पर उत्सवों और यज्ञों का आयोजन होता रहता है। माँ कालिका के दर्शन के लिए दूर-दूर से लोग आते हैं। धर्मयात्रा की कड़ी में इस बार की यात्रा आपको कैसी लगी, हमें जरूर बताएँ।

कैसे पहुँचें?

वायुमार्ग: उज्जैन से इंदौर एअरपोर्ट लगभग 65 किलोमीटर दूर है।

रेलमार्ग: उज्जैन से मक्सी-भोपाल मार्ग (दिल्ली-नागपुर लाइन), उज्जैन-नागदा-रतलाम मार्ग (मुंबई-दिल्ली लाइन) द्वारा आप आसानी से उज्जैन पहुँच सकते हैं।

सड़क मार्ग: उज्जैन-आगरा-कोटा-जयपुर मार्ग, उज्जैन-बदनावर-रतलाम-चित्तौड़ मार्ग, उज्जैन-मक्सी-शाजापुर-ग्वालियर-दिल्ली मार्ग, उज्जैन-देवास-भोपाल मार्ग आदि देश के किसी भी हिस्से से आप बस या टैक्सी द्वारा यहाँ आसानी से पहुँच सकते हैं।

साभार: अनिरुद्ध जोशी 'शतायु' , वेबदुनिया

Saturday, August 23, 2014

DWARKADHEESH MANDIR ,UJJAIN - उज्जैन का द्वारकाधीश गोपाल मंदिर




धर्मयात्रा की इस बार की कड़ी में हम आपको लेकर चलते हैं उज्जैन के प्रसिद्ध द्वारकाधीश गोपाल मंदिर। गोपाल मंदिर उज्जैन नगर का दूसरा सबसे बड़ा मंदिर है। शहर के मध्य व्यस्ततम क्षेत्र में स्थित इस मंदिर की भव्यता आस-पास बेतरतीब तरीके से बने मकान और दुकानों के कारण दब-सी गई है।

 इस मंदिर का निर्माण दौलत राव सिंधिया की धर्मपत्नी वायजा बाई ने संवत 1901 में कराया था जिसमें मूर्ति की स्थापना संवत 1909 में की गई। इस मान से ईस्वी सन 1844 में निर्माण 1852 में मूर्ति की स्थापना हुई। मंदिर के चाँदी के द्वार यहाँ का एक अन्य आकर्षण हैं।

मंदिर में दाखिल होते ही गहन शांति का अहससास होता है। इसके विशाल स्तंभ और सुंदर नक्काशी देखते ही बनती है। मंदिर के आसपास विशाल प्रांगण में सिंहस्त या अन्य पर्व के दौरान बाहर से आने वाले लोग विश्राम करते हैं। पर्वों के दौरान ट्रस्ट की तरफ से श्रद्धालुओं तथा तीर्थ यात्रियों के लिए कई तरह की सुविधाएँ प्रदान की जाती है।

 कम से कम दो सौ वर्ष पूराना है यह मंदिर। मंदिर में भगवान द्वारकाधीश, शंकर, पार्वतीऔर गरुढ़ भगवान की मूर्तियाँ है ये मूर्तियाँ अचल है और एक कोने में वायजा बाई की भी ‍मूर्ति है। यहाँ जन्माष्टमी के अलावा हरिहर का पर्व बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है। हरिहर के समय भगवान महाकाल की सवारी रात बारह बजे आती है तब यहाँ हरिहर मिलन अर्थात विष्णु और शिव का मिलन होता है। जहाँ पर उस वक्त डेढ़ दो घंटे पूजन चलता है।

कैसे पहुँचे:

सड़क मार्ग: मध्यप्रदेश के इंदौर से लगभग 60 किलोमिटर दूर उज्जैन हिंदुओं का विश्व प्रसिद्ध तीर्थ स्थल हैं। इंदौर बस स्टेंड से बस द्वारा उज्जैन पहुँचा जा सकता है।

रेल मार्ग: तीर्थ स्थल उज्जैन का रेलवे स्टेशन देश के सभी प्रमुख रेलवे स्टेशनों से जुड़ा हुआ है। यहाँ से छोटी और बड़ी लाइन की रेलगाड़ियाँ मुंबई, दिल्ली, चेन्नई और कोलकाता के लिए जाती है।

हवाई मार्ग: उज्जैन का सबसे नि‍कटतम हवाई अड्डा इंदौर है।

साभार : - वेबदुनिया/अनिरुद्ध जोशी 'शतायु'

Saturday, August 31, 2013

जैन सिद्धोदय सिद्धक्षेत्र का मंदिर




धर्मयात्रा की इस बार की कड़ी में हम आपको लेकर चलते हैं नेमावर के जैन सिद्धोदय सिद्ध क्षेत्र में जहाँ भव्य मंदिर खड़ा है नर्मदा के तट पर। इस क्षेत्र का महत्व इसलिए है, क्योंकि यह स्थान प्राचीन काल में जैन संन्यासियों की तपोभूमि हुआ करता था तथा यहाँ कई भव्य मंदिर हुआ करते थे।

रावण के सुत आदि कुमार, मुक्ति गए रेवातट सार।
कोटि पंच अरू लाख पचास, ते बंदों धरि परम हुलास।।

उक्त निर्वाण कांड के श्लोक के अनुसार रावण के पुत्र सहित साढ़े पाँच करोड़ मुनिराज नेमावर के रेवातट से मोक्ष पधारे हैं। रेवा नदी जो कि नर्मदा के नाम से भी जानी जाती है। जैन शास्त्र के अनुसार नेमावर नगरी पर प्रचीन काल में कालसंवर और उनकी रानी कनकमला राज्य करते थे। आगे जाकर यह निमावती और बाद में नेमावर हुआ।

नेमावर नदी के तल से विक्रम संवत 1880 ई.पू. की तीन विशाल जैन प्रतिमाएँ निकली है। पहली 1008 भगवान आदिनाथ की मूर्ति जिन्हें नेमावर जिनालय में, दूसरी 1008 भगवान मुनिसुव्रतनाथ की मूर्ति, जिन्हें खातेगाँव के जिनालय में और 1008 भगवान शांतिनाथ की पद्‍मासनस्त मूर्ति, जिन्हें हरदा में रखा गया है। इसी कारण इस सिद्धक्षेत्र का महत्व और बढ़ गया है।

जैन-तीर्थ संग्रह में मदनकीर्ति ने लिखा है कि 26 जिन तीर्थों का उल्लेख है उनमें रेवा (नर्मदा) के तीर्थ क्षेत्र का महत्व अधिक है उनका कथन है कि रेवा के जल में शांति जिनेश्वर हैं जिनकी पूजा जल देव करते हैं। इसी कारण इस सिद्ध क्षेत्र को महान तीर्थ माना जाता है।

उक्त सिद्ध क्षेत्र पर भव्य निर्माण कार्य प्रगति पर है। यहाँ पर निर्माणाधीन है पंचबालवति एवं त्रिकाल चौबीस जिनालय। लगभग डेढ़ अरब की लागत से उक्त तीर्थ स्थल के निर्माण कार्य की योजना है। लगभग 60 प्रतिशत निर्मित हो चुके यहाँ के मंदिरों की भव्यता देखते ही बनती है।

श्रीदिगंबर जैन रेवातट सिद्धोदय ट्रस्ट नेमावर, सिद्धक्षेत्र द्वारा उक्त निर्माण किया जा रहा है। ट्रस्ट के पास 15 एकड़ जमीन हो गई है जिसमें विश्व के अनूठे 'पंचबालयति त्रिकाल चौबीसी' जिनालय का निर्माण अहमदाबाद के शिल्पज्ञ सत्यप्रकाशजी एवं सी.बी. सोमपुरा के निर्देशन में हो हो रहा है। संपूर्ण मंदिर वं‍शी पहाड़पुर के लाल पत्थर से निर्मित हो रहा है।

पूर्ण मंदिर की लम्बाई 410 फिट, चौड़ाई 325 फिट एवं शिखर की ऊँचाई 121 फिट प्रस्तावित है। जिसमें पंचबालयति जिनालय 55 गुणित 55 लम्बा-चौड़ा है। सभा मंडप 64 गुणित 65 लम्बा-चौड़ा एवं 75 फिट ऊँचा बनना है।

खातेगाँव, नेमावर और हरदा के जैन श्रद्वालुओं के अनुरोध पर श्री 108 विद्यासागरजी महाराज के इस क्षेत्र में आगमन के बाद से ही इस तीर्थ क्षेत्र के विकास कार्य को प्रगति और दिशा मिली। श्रीजी के सानिध्य में ही उक्त क्षेत्र पर निर्माण कार्य का शिलान्यास किया गया।

इंदौर से मात्र 130 कि.मी. दूर दक्षिण-पूर्व में हरदा रेलवे स्टेशन से 22 कि.मी. तथा उत्तर दिशा में खातेगाँव से 15 कि.मी. दूर पूर्व दिक्षा में स्थित है यह मंदिर। यहाँ नर्मदा नदी के जल स्तर की चौड़ाई करीब 700 मीटर है।

कैसे पहुँचे :-

वायु मार्ग : यहाँ से सबसे नजदीकी हवाई अड्डा देवी अहिल्या एयरपोर्ट, इंदौर 130 किमी की दूरी पर स्थित है।

रेल मार्ग : इंदौर से मात्र 130 किमी दूर दक्षिण-पूर्व में हरदा रेलवे स्टेशन से 22 किमी तथा उत्तर दिशा मेंभोपाल से 170 किमी दूर पूर्व दिशा में स्थित है नेमावर।

सड़क मार्ग : नेमावर पहुँचने के लिए इंदौर से बस या टैक्सी द्वारा भी जाया जा सकता है।

साभार:  अनिरुद्ध जोशी 'शतायु' ,वेब दुनिया