Thursday, October 11, 2018

HARSIDDH MATA - चमत्कारों की देवीः काशी में चरण, उज्जैन में सिर और भोपाल में होती है धड़ की पूजा


 शारदीय नवरात्र के मौके पर हर दिन आपको बताएगा प्रदेश के अनोखे मंदिरों के बारे में...। पहली कड़ी में आपके ले चलते हैं भोपाल जिले की बैरसिया तहसील, जहां विराजमान हैं हरसिद्धि माता...।

भोपाल। बैरसिया तहसील मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल से 35 किलोमीटर दूर है। यहां के तरावली गांव में माता का अद्भुत स्थान हैं। हरसिद्धि माता के दरबार में जो भी अर्जी लगाता है वो जरूर पूरी हो जाती है। खास बात यह है कि इस मंदिर में सीधे नहीं उलटे फेरे लगाए जाते हैं। मान्यता है कि यहां उलटे फेरे लगाने वालों के बिगड़े काम भी बन जाते हैं।


तरावली स्थित मां हरसिद्धि धाम में वैसे तो सामान्य रूप से सीधी परिक्रमा ही करते हैं लेकिन कुछ श्रद्धालु मां से खास मनोकामना के लिए उलटी परिक्रमा कर अर्जी लगा जाते हैं, बाद में जब मनोकामना पूरी हो जाती है तब सीधी परिक्रमा कर माता को धन्यवाद देने जरूर आते हैं।

कई भक्तों को दिया संतान का आशीर्वाद
मान्यता है कि जिन भक्तों को कोई भी संतान नहीं होती है। वह महिलाएं मंदिर के पीछे नदी में स्नान करने के बाद मां की आराधना करती है। इसके बाद उनकी मनोकामना पूरी हो जाती है।

खप्पर से होती है पूजा

तरावली स्थित मां हरसिद्धि के प्रति लोगों की अगाध श्रद्धा है। यहां माता के धड़ की पूजा होती है, क्योंकि मां के चरण काशी में है और शीश उज्जैन में। इससे जितना महत्व काशी और उज्जैन का है उतना ही महत्व इस तरावली मंदिर का भी है। यहां आज भी मां के दरबार में आरती खप्पर से की जाती है।

राजा विक्रमादित्य लाए थे मूर्ति

तरावली के मंहत मोहन गिरी बताते हैं कि वर्षों पूर्व जब राजा विक्रमादित्य उज्जैन के शासक हुआ करते थे। उस समय विक्रमादित्य काशी गए थे। यहां पर उन्होंनें मां की आराधना कर उन्हें उज्जैन चलने के लिए तैयार किया था। इस पर मां ने कहा था कि एक तो वह उनके चरणों को यहां पर छोड़कर चलेंगी। इसके अलावा जहां सबेरा हो जाएगा। वह वहीं विराजमान हो जाएंगी। इसी दौरान जब वह काशी से चले तो तरावली स्थित जंगल में सुबह हो गई। इससे मां शर्त के अनुसार तरावली में ही विराजमान हो गईं। इसके बाद विक्रमादित्य ने लंबे समय तक तरावली में मां की आराधना की। फिर से जब मां प्रसन्न हुई तो वह केवल शीश को साथ चलने पर तैयार हुई। इससे मां के चरण काशी में है, धड़ तरावली में है और शीश उज्जैन में है। उस समय विक्रमादित्य को स्नान करने के लिए जल की आवश्यकता थी। तब मां ने अपने हाथ से जलधारा दी थी। इससे वाह्य नदी का उद्गम भी तरावली के गांव से ही हुआ है और उसी समय से नदी का नाम वाह्य नदी रखा गया है।

यह भी है मान्यता

-मान्यता है कि दो हजार वर्ष पूर्व काशी नरेश गुजरात की पावागढ़ माता के दर्शन करने गए थे। 
-वे अपने साथ मां दुर्गा की एक मूर्ति लेकर आए और मूर्ति की स्थापना की और सेवा करने लगे।
-उनकी सेवा से प्रसन्न होकर देवी मां काशी नरेश को प्रतिदिन सवा मन सोना देती थीं।
-जिसे वो जनता में बांट दिया करते थे। 
-यह बात उज्जैन तक फैली तो वहां की जनता काशी के लिए पलायन करने लगी। 
-उस समय उज्जैन के राजा विक्रमादित्य थे। जनता के पलायन से चिंतित विक्रमादित्य बेताल के साथ काशी पहुंचे। 
-वहां उन्होंने बेताल की मदद से काशी नरेश को गहरी निद्रा में लीन कर स्वयं मां की पूजा करने लगे।
-तब माता ने प्रसन्न होकर उन्हें भी सवा मन सोना दिया।
-विक्रमादित्य ने वह सोना काशी नरेश को लौटाने की पेशकश की। 
-लेकिन काशी नरेश ने विक्रमादित्य को पहचान लिया और कहा कि तुम क्या चाहते हो। 
-तब विक्रमादित्य ने मां को अपने साथ ले जाने का अनुरोध किया। काशी नरेश के न मानने पर विक्रमादित्य ने 12 वर्ष तक वहीं रहकर तपस्या की। 
-मां के प्रसन्न होने पर उन्होंने दो वरदान मांगे, पहला वह अस्त्र, जिससे मृत व्यक्ति फिर से जीवित हो जाए और दूसरा अपने साथ उज्जैन चलने का। 
-तब माता ने कहा कि वे साथ चलेंगी, लेकिन जहां तारे छिप जाएंगे, वहीं रुक जाएंगी। 
-लेकिन उज्जैन पहुंचने सेे पहले तारे अस्त हो गए। इस तरह जहां पर तारे अस्त हुए मां वहीं पर ठहर गईं। इस तरह वह स्थान तरावली के नाम से प्रसिद्ध हुआ।
-तब विक्रमादित्य ने दोबारा 12 वर्ष तक कड़ी तपस्या की और अपनी बलि मां को चढ़ा दी, लेकिन मां ने विक्रमादित्य को जीवित कर दिया। 
-यही क्रम तीन बार चला और राजा विक्रमादित्य अपनी जिद पर अड़े रहे। 
-ऐसे में तब चौथी बार मां ने अपनी बलि चढ़ाकर सिर विक्रमादित्य को दे दिया और कहा कि इसे उज्जैन में स्थापित करो। 
-तभी से मां के तीनों अंश यानी चरण काशी में अन्नपूर्णा के रूप में, धड़ तरावली में और सिर उज्जैन में हरसिद्धी माता के रूप में पूजे जाते हैं।
साभार: पत्रिका न्यूज़ पेपर 

KANKALI MATA MANDIR - यहां देवी मां की घूमती हुई गर्दन देखने पहुंचते हैं भक्त



भोपाल। मां काली के विभिन्न आकर्षक रूपों से हमारा परिचय है लेकिन भोपाल से सटे रायसेन में एक ऐसा मंदिर है जहां मां काली की मूर्ति एक बार स्वयं अपनी गर्दन सीधी करती है। इस मौके पर माता के दर्शनों के लिए भक्तों का तांता लगा होता है। मान्यता है कि जिस भी भक्त को माता की सीधी गर्दन देखने का मौका मिलता है उसके सारे बिगड़े काम बन जाते हैं।

नवरात्र में होती है विशेष पूजा

राजधानी से महज 15 किमी दूर रायसेन जिले के गुदावल गांव में मां काली का प्रचीन मंदिर है। यहां मां काली की 20 भुजाओं वाली प्रतिमा के साथ भगवान ब्रम्हा, विष्णु और महेश की प्रतिमाए विराजमान है। आमतौर पर यहां पूरे साल माता के भक्तों की भीड़ लगी रहती है, लेकिन नवरात्र ंके बाद वियजदशमी पर श्रद्धालुओं का तांता लगता है। चैत्र नवरात्र में रामनवमी के दिन विशाल भंडारा आयोजित किया जाता है।

सूनी गोद भरती है मां

बताया जाता है कि इस दिन माता की लगभग 45 डिग्री झुगी गदरन कुछ पलों के लिए सीधी होती है जिसे देखने के लिए दूर-दूर से लोग आते हैं। मंदिर के महंत मंगल दास त्यागी बताते हैं कि मंदिर से जुड़ी अलग- अलग मान्यताएं हैं। कहा जाता है कि जिन माता-बहनों की गोद सूनी होती है, वह श्रृद्धाभाव से यहां उल्टे हाथ लगाती हैं उनकी मान्यता अवश्य पूरी होती है।

अनोखी है प्राकृतिक छटा

कंकाली मंदिर रायसेन रोड पर स्थित बिलखिरिया गांव से कुछ ही दूरी पर जंगल के बीच बना हुआ है। मंदिर के चारो लगे हरे-भरे पेड़ पौधे यहां सबसे बड़ा आकर्षण है।

साभार: राजस्थान पत्रिका 

Tuesday, February 13, 2018

PRITHVINATH MANDIR - GONDA - गोंडा के इस मंदिर में है एशिया का सबसे बड़ा शिवलिंग

गोंडा के इस शिव मंदिर में है भीम द्वारा स्थापित एशिया का सबसे बड़ा शिवलिंग

पुरातत्व विभाग की जांच में पता चला कि यह एशिया का सबसे बड़ा शिवलिंग है, जो 5000 वर्ष पूर्व महाभारत काल का है।

खरगूपुर स्थित प्राचीन पृथ्वीनाथ मंदिर शिवभक्तों की आस्था का प्रमुख केंद्र है। दावा किया जाता है कि यह एशिया का सबसे बड़ा शिवलिंग है। किवदंती है कि द्वापर युग में अज्ञातवास के दौरान भीम ने इस शिवलिंग की स्थापना की थी। इसकी ऊंचाई इतनी है कि एड़ी उठाकर ही जलाभिषेक किया जाता है। पुरातत्व विभाग द्वारा संरक्षित मंदिर में महाशिवरात्रि पर देश ही नहीं बल्कि नेपाल तक के श्रद्धालु भी दर्शन-पूजन करने आते हैं।

जिला मुख्यालय से करीब 30 किलोमीटर की दूरी पर पृथ्वीनाथ मंदिर है। मंदिर में स्थापित पांच फीट ऊंचा शिवलिंग काले कसौटी के दुर्लभ पत्थरों से बना हुआ है। टीले पर स्थित इस मंदिर के बारे में जानकारों का कहना है कि मुगल सम्राट के कार्यकाल में उनके किसी सेनापति ने यहां पूजा अर्चना की थी और मंदिर का जीर्णोद्धार कराया था। भीम द्वारा स्थापित यह शिवलिंग धीरे-धीरे जमीन में समा गया। कालांतर में खरगूपुर के राजा मानसिंह की अनुमति से यहां के निवासी पृथ्वीनाथ सिंह ने मकान निर्माण कराने के लिए खोदाई शुरू करा दी।


उसी रात पृथ्वी सिंह को स्वप्न में पता चला कि नीचे सात खंडों का शिवलिंग दबा है। उन्हें एक खंड तक शिवलिंग खोजने का निर्देश हुआ। इसके बाद शिवलिंग खोदवाकर पूजा-अर्चना शुरू करा दी। कालांतर में उनके नाम पर ही पृथ्वीनाथ मंदिर विख्यात हो गया। लगभग चार दशक पूर्व पुरातत्व विभाग की जांच में पता चला कि यह एशिया का सबसे बड़ा शिवलिंग है, जो 5000 वर्ष पूर्व महाभारत काल का है। मंदिर के पुजारी श्याम कुमार गोस्वामी ने बताया कि मंदिर प्राचीन महत्व का है। भक्तों का कहना है कि यहां सच्चे मन से जलाभिषेक तथा दर्शन पूजन करने से मनवांछित फल प्राप्त होता है।

साभार: दैनिक जागरण, अजय सिंह 

Sunday, December 17, 2017

MAINPAT - हिमाचल प्रदेश के शिमला से काफी दूर एक शिमला यह भी


देश को एक और 'शिमला" मिल गया है, इसे न केवल भरपूर संभावनाओं वाला शहर माना जा रहा है।


देश को एक और 'शिमला" मिल गया है, इसे न केवल भरपूर संभावनाओं वाला शहर माना जा रहा है, बल्कि केंद्र सरकार के पर्यटन मंत्रालय ने स्वदेश दर्शन 'ट्रायबल टूरिज्म सर्किट' की परियोजना में शामिल कर लिया है। यह शहर है करीब 3 हजार फीट ऊंचाई पर बसा तिब्बती शरणार्थियों का कैंप और छत्तीसगढ़ के अंबिकापुर जिले का पर्यटन स्थल मैनपाट। इसे छत्तीसगढ़ में शिमला ही कहा जाता है, क्योंकि गर्मी में यहां ठंडक बनी रहती है और ठंड के मौसम में सुबह- सुबह बर्फ की हल्की परत बिछी मिलती है। बड़ी संख्या में यहां तिब्बती निवास कर रहे हैं, इसलिए यहां के बाजार और शहर में शिमला जैसी रौनक दिखती है। लकदक कालीन से लेकर गरम कपड़े बनाने का काम यहां होता है।

खास पर्यटक स्थल का आभास कराता

तिब्बतियों का धर्मस्थल किसी खास पर्यटक स्थल का आभास कराता है। नेशनल पर्यटन सर्किट में शामिल होने से अब नया शिमला देशभर में चमकेगा। पर्यटकों के आने की संभावना को देखते हुए इस परियोजना के तहत मैनपाट में लगभग 27 करोड़ रुपए के पर्यटन विकास के काम युद्ध स्तर पर कराने की तैयारी चल रही है। छत्तीसगढ़ पर्यटन मंडल द्वारा जिला प्रशासन से समन्वय बनाकर इसकी कार्ययोजना तैयार कर ली गई है। इस कार्ययोजना में मैनपाट के ऐसे पर्यटन स्थल जो अबतक अनछुए हैं, वहां तक पर्यटकों की पहुंच बना बेहतर सुविधाएं उपलब्ध कराने की भी होगी। इस कार्ययोजना में मैनपाट के कमलेश्वरपुर में पर्यटन गांव भी प्रमुख है।

सुविधाएं उपलब्ध कराने का प्रस्ताव तैयार

पर्यटन मंत्रालय भारत सरकार द्वारा स्वदेश दर्शन योजनांतर्गत आदिवासी क्षेत्रों के पर्यटन केंद्रों को पर्यटन नक्शे पर स्थापित करने ट्रायबल टूरिज्म सर्किट परियोजना लागू की गई है। इस परियोजना में मैनपाट को भी शामिल कर लिया गया है। वित्तीय वर्ष 2015-16 में पर्यटन मंत्रालय भारत सरकार द्वारा इस परियोजना को लागू करने के बाद छत्तीसगढ़ सरकार को भी पर्यटन स्थलों के विकास के लिए आवश्यक कार्ययोजना तैयार करने के निर्देश दिए गए थे। अधिकारियों के मुताबिक ट्रायबल टूरिज्म सर्किट परियोजना के तहत मैनपाट के साथ बाहर से आने वाले पर्यटकों के लिए अंबिकापुर में भी बेहतर सुविधाएं उपलब्ध कराने प्रस्ताव तैयार किया गया था।

मैनपाट के लिए कार्ययोजना तैयार

अंबिकापुर के लिए 1207.50 लाख तथा मैनपाट के लिए 1498.67 लाख रुपए की कार्ययोजना तैयार की गई थी। पिछले वित्तीय वर्ष में कार्ययोजना के अनुरूप कोई कार्य आरंभ नहीं हो सका था। अंबिकापुर में प्रस्तावित कार्यों के लिए जमीन उपलब्ध कराने की कोशिश हुई थी, लेकिन पर्यटन महत्व को लेकर प्रस्तावित कार्ययोजना को मूर्तरूप देने जमीन की उपलब्धता सुनिश्चित नहीं होने से यहां के कार्यों को भी मैनपाट में ही कराए जाने का अंतिम निर्णय लिया गया है। 

टाइगर प्वाइंट है मशहूर

अब एक साथ लगभग 27 करोड़ रुपए से मैनपाट के कमलेश्वरपुर, मेहता प्वाइंट, टाइगर प्वाइंट, मछली प्वाइंट, जलजली, परपटिया के पहचान स्थापित कर चुके पर्यटन स्थलों के अलावा अनछुए पर्यटन स्थलों तक सुविधाएं पहुंचाने का काम शुरु हो जाएगा। मैनपाट में पर्यटन विकास के लिए जो बड़े काम प्रस्तावित किए गए हैं, उसमें हेरीटेज विलेज प्रमुख है। जहां पर्यटकों को बेहतर सुविधाएं मिल सकेंगी। इसके अलावा जगह-जगह पर टेंट, टूरिस्ट एमिनिटी सेंटर, फेसीलिटेशन सेंटर सहित पानी, बिजली, सड़क व दूसरे बुनियादी जरूरतों के कार्य शामिल हैं। मैनपाट महोत्सव के दौरान मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह द्वारा विकास व निर्माण कार्यों का शिलान्यास, भूमिपूजन किए जाने की तैयारी चल रही है।

भूमि का आवंटन

मैनपाट में विभिन्न पर्यटन विकास कार्यों के लिए जमीन का आवंटन कर दिया गया है। जमीन आबंटन से पहले आम जनता से दावा-आपत्ति भी मांगा गया था। लेकिन किसी प्रकार की कोई दावा आपत्ति प्राप्त नहीं हुई। ग्राम पंचायत ने जमीन आबंटन के लिए सहमति दी। तहसीलदार द्वारा भी जमीन आबंटन को लेकर प्रतिवेदन प्रस्तुत किया गया था। उसी प्रतिवेदन के आधार पर पर्यटन मंडल को पर्यटन विकास के लिए जमीन आबंटित करते हुए तहसीलदार मैनपाट को हस्तांतरित भूमि का राजस्व अभिलेख दूरूस्त करने निर्देश दिया गया है। 

ये कार्य हैं प्रस्तावित

कमलेश्वरपुर में टूरिस्ट फेसिलिटेशन, इंटरपिटेशन सेंटर के अलावा संपवेल, बोरवेल, ओवरहेड टैंक, वाटर सप्लाई पाइप लाइन के कार्य प्रस्तावित हैं। इनमें से कुछ काम मेहता प्वाइंट, टाइगर प्वाइंट, मछली प्वाइंट, जलजली, परपटिया में भी होंगे। टूरिस्ट एमिनिटी सेंटर, डे-शेल्टर, टेंट प्लेटफार्म, पिकनिक स्पॉटों में इको कुकींग स्पॉट विकसित किए जाएंगे। इनके अलावा पर्यटकों की सुविधा के लिए वे सारे कार्य प्रस्तावित किए गए हैं, जो बाहर से आने वाले पर्यटकों के लिए जरूरी होगा। मेहता प्वाइंट में लैंड स्केपिंग की भी व्यवस्था होगी। साहसिक खेलों को बढ़ावा देने के लिए भी आवश्यक व्यवस्था किए जा रहे हैं।

टूरिस्ट विलेज भी होगा विकसित

लगभग 12 करोड़ रुपए की लागत से विकसित होने वाले टूरिस्ट विलेज इको लाग हट्स, क्राफ्ट हाट, कैफेटेरिया, टूरिस्ट रिसेप्शन एंड फेसिलिटेशन सेंटर, ओपन थियेटर, ट्रायबल इंटरप्रिटेशन सेंटर, पगोड़ा, पार्थ-वे सहित गार्डन और दूसरी सुविधाएं स्थापित होंगी। टूरिस्ट विलेज में पर्यटकों को पर्यटन महत्व के स्थलों की जानकारी के अलावा परंपरागत रूप से उपलब्ध रहने वाली सुविधाओं को भी विकसित किया जाएगा। टूरिस्ट विलेज के लिए लगभग दो दर्जन कार्य प्रस्तावित किए गए हैं।

कई स्थल अब भी अछूते

मैनपाट का मेहता प्वाइंट, टाइगर प्वाइंट, मछली प्वाइंट, जलजली, परपटिया कुछ ऐसे स्थल हैं, जहां पर्यटकों की पहुंच है। इन स्थानों तक पर्यटक आसानी से पहुंच जाते हैं। इन पर्यटन स्थलों के अलावा मैनपाट में अब भी कई ऐसे पर्यटन स्थल हैं, जो अपनी पहचान नहीं बना सके हैं। ये पर्यटन स्थल अब भी अनछुए और अछूते हैं। इनमें रोपाखार का भूतहइया झरना, किंग झरना, पातालतोड़ कुआं, सरइकिरचा घाघी, परपटिया सनसेट प्वाइंट, बरिमा का उरंगहा झरना तक पर्यटकों की राह आसान करने का काम ट्रायबल टूरिज्म सर्किट से हो सकेगा।

ऐसे पहुंचें मैनपाट

रायपुर में एयरपोर्ट है, जो दिल्ली, मुंबई, विशाखापट्टनम, अहमदाबाद, इंदौर, भोपाल, बंगलुरु, कोलकाता जैसे शहरों से जुड़ा हुआ है। रायपुर से अंबिकापुर की दूरी 350 किमी ट्रेन से तय की जा सकती है। रायपुर से अंबिकापुर के लिए सीधी ट्रेन है। सड़क मार्ग से यह इलाका रायपुर, बिलासपुर, बनारस और झारखंड के रांची से जुड़ा हुआ है। अंबिकापुर पहुंचने के बाद मैनपाट की दूरी 45 किमी पहाड़ पर है। यह सफर तय करने के लिए अंबिकापुर से टैक्सी मिल जाएगी।

कहां ठहरें

अंबिकापुर में छत्तीसगढ़ पर्यटन विकास निगम के रेस्ट हाउस हैं। इसकी बुकिंग ऑनलाइन या बेवसाइट पर दिए गए टोल फ्री नंबर से की जा सकती है। इसके अलावा कुछ और विभागों ने अपना रेस्टहाउस बना लिया है।

कब जाएं

जून से सितंबर तक बारिश का मौसम छोड़ कर कभी भी जा सकते हैं।


साभार: jagran.com